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पांचवीं अनुसूची को लेकर विशेषज्ञ समूह की बैठक चुनावी एजेंडा : जेएमएम 

राज्यपाल की अध्यक्षता में पांचवीं अनुसूची से संबंधित मामलों के लिए गठित विशेषज्ञ समूह की गुरुवार की पहली बैठक को जेएमएम ने चुनावी एजेंडा बताया है. 19 वर्ष बीतने के बाद भी राज्य में नहीं बनी पेसा नियमवाली,दिया जा रहा सुझाव, राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने गुरूवार को राजभवन में बुलायी थी बैठक

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Ranchi : राज्यपाल की अध्यक्षता में पांचवीं अनुसूची से संबंधित मामलों के लिए गठित विशेषज्ञ समूह की गुरुवार की पहली बैठक को जेएमएम ने चुनावी एजेंडा बताया है. पार्टी महासचिव सह प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने शुक्रवार को प्रेस वार्ता में कहा कि दिसम्बर 1996 को पारित पेसा कानून में प्रावधान था कि जो भी अऩुसूचित राज्य हैं, उसे एक वर्ष के अंदर ही पेसा से जुड़ी नियमावली बना लेना है. अगर किसी कारणवश इस अवधि में यह एक्ट नहीं बनता है, तो 1996 के ही पेसा एक्ट को  राज्य सरकार स्वीकार करेगी. लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि राज्य गठन को 19 वर्ष बीत गये है, लेकिन अभी भी यहां पेसा नियमावली बनने की बात की जा रही है.  उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ समूह की बैठक केवल एक चुनावी एजेंडा है. चुनाव नजदीक है, ऐसे में राज्य सरकार एक बार फिर मूलवासी-आदिवासी को धोखे में रखने का काम कर रही है.

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पहले भी पार्टी कर चुकी है मांग

पार्टी महासचिव ने बताया कि राज्य के गठन के दौरान पार्टी विपक्ष में थी. तब नेता प्रतिपक्ष स्टीफन मरांडी ने पेसा कानून को लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति और राज्यपाल से मुलाकात कर कहा था कि झारखंड राज्य पांचवीं अनुसूची का राज्य है, आदिवासी-मूलवासी के हितों को देखते हुए अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून लागू करना जरूरी है. कुछ वर्ष पहले हेमंत सोरेन के नेतृत्व में भी पार्टी विधायकों ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और वर्तमान राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर राज्य में पेसा नियमावली बनाने की मांग की थी. उस दौरान नेताओं ने कहा था कि ऐसा नहीं होने राज्य की संपूर्ण सामाजिक संरचना प्रभावित होना तय है.

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 पेसा की मूल आत्मा के खिलाफ है भूमि अधिग्रहण

उन्होंने कहा कि रघुवर सरकार में पेसा कानून की आत्मा के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. आज जिस प्रकार ग्राम सभा को दरकिनार कर भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है, यह संपूर्ण पेसा के मूल आत्मा के खिलाफ है. लेकिन सरकार के कानों में जू तक नहीं रेंगी. स्थिति यह है कि पांचवी अनुसूची के क्षेत्र में पारम्परिक सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना प्रभावित हो रही है. मानकी मुंडा, पाहन, माझी परगना प्रधान जैसी तमाम व्यवस्था समाज को एक संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करती है. लेकिन पेसा कानून लागू नहीं कर सरकार ने इन्हें भी तोड़ने का काम किया है.यह केवल सामाजिक संरचना के ही खिलाफ ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत सम्मान के भी खिलाफ है.

धोखे में रख सत्ता पाना है मुख्य उद्देश्य

रोजगार के मुद्दों पर उठे सवालों पर  सरकार को घेरते हुए पार्टी महासचिव ने कहा कि आज रोजगार को लेकर सरकार ने जो नीतियां बनायी है, वह राज्य के छात्र-छात्राओं के हित में नहीं है. स्थानीयता को परिभाषित करते हुए सरकार ने जो कट ऑफ डेट (वर्ष-1985) रखी है, वह भी पेसा कानून के खिलाफ है. दरअसल इन सब के पीछे का कारण आगामी विधानसभा चुनाव है. सरकार की नीतियों से राज्य के युवाओं में जैसी नाराजगी है, उसे ही देखते हुए पेसा कानून की उक्त बैठक बुलायी गयी,ताकि जनजाति-मूलवासी को धोखे में रख कर सत्ता पायी जा सके.

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