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EXCLUSIVE : जैंतगढ़ के रास्ते निकल रहा ओडिशा से टपाया गया लौह अयस्क, जमशेदपुर, रामगढ़  और हल्दिया तक फैला है बाजार  

Aman Verma

Chaibasa  :  ओडिशा सीमा पर जगन्नाथपुर ब्लॉक में स्थित जैंतगढ़ के आसपास का क्षेत्र 12 वर्ष पूर्व लौह अयस्क की डंपिंग और वैध-अवैध धंधे के लिए मशहूर था.  फिर लौह अयस्क की कीमत में आयी भारी गिरावट ने क्षेत्र से धंधे का नामोनिशान मिटा दिया. एक ऐसा भी समय था, जब यहां के बच्चे-बच्चे की जुबान पर फाइंस, ब्लू डस्ट, साइज ओर, लंप्स आदि का नाम रहता था. मैंगनीज और फेरो तक को लोग हजम कर जाते थे. अब इस क्षेत्र से आयरन ओर का धंधा तो उजड़ गया, लेकिन अब खनन क्षेत्र से जुड़े लोग सीधे इस गोरखधंधे को चलाने लगे हैं. सूत्र बताते हैं कि आयरन ओर की चोरी का सारा खेल माल की रिसीविंग पर निर्भर करता है. पिछले दिनों सियालजोड़ा में लौह अयस्क से भरे ट्रक की चोरी को की घटना को भी इसी गोरखधंधे से जोड़ कर देखा जा रहा है. जानकारी के अनुसार जैंतगढ़ के रास्ते हर रोज दर्जन भर से अधिक दो नंबरी वाहनों के जरिये खनिज की चोरी हो रही है. आयरन ओर माफिया इन वाहनों से एकांत जगहों पर माल गिरवा लेते हैं, फिर उसे फर्जी कागज के सहारे बाजार में बेच दिया जाता है. यह माल जमशेदपुर और रामगढ़ की कंपनियों के अलावा हल्दिया पोर्ट के रास्ते विदेश तक भेजा जाता है.

क्या है लोडिंग-अनलोडिंग का सिस्टम

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ओडिशा की लौह अयस्क खदानों से निकले माल (खनिज) को शिपिंग यार्ड या प्लांट तक पहुंचाते हैं ट्रांसपोर्टर. वाहन चालक इन ट्रांसपोर्टरों से डीओ लेते हैं. खदान या क्रशर जहां से माल उठाना है, वहां गेट पर डीओ टैग किया जाता है, फिर खाली गाड़ी का वजन होता है. तब उसे लोडिंग के लिए भेजा जाता है. लोड करने के बाद वाहन का फिर से वजन किया जाता है. यहां ट्रांसपोर्टर और खदान के कर्मचारी वाहन चालकों को वे बिल, माइनिंग चालान, कांटा स्लिप आदि देते हैं. उसके बाद गाड़ी चालक माल लेकर संबंधित प्लांट या स्टॉक यार्ड पहुंचता है. वहां वजन करने के बाद माल अनलोड कर चालक को रिसिविंग दे दी जाती है. ड्राइवर इस रिसीविंग को ट्रांसपोर्टर के पास जमा करता है. इसी के आधार पर उसे भाड़ा का भुगतान मिलता है.

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खदान से ऐसे होती है खनिज की चोरी

ट्रांसपोर्टर के स्टाफ, कांटा के स्टाफ और गेटकीपर की मिलीभगत से चोरी होती है. ट्रक चालक डीओ लेकर जाता है. फिर कांटा कराकर बिना टैग कराये खदान के अंदर चला जाता है. वहां से माल लेकर कभी कांटा करता है, तो कभी पिछले दरवाजे से बिना वजन कराये निकल जाता है. गाड़ी निकल जाने के बाद कांटा, गेट और ट्रांसपोर्ट स्टाफ की मिलीभगत से डीओ कैंसिल कर दिया जाता है. डीओ टैग नहीं होने के कारण यह काम काफी आसान होता है. गौरतलब है कि दिन में यह खेल नहीं होता. यह काम रात के अंधेरे में ही होता है. एक बार गाड़ी माल लोड कर बाहर निकल जाती है, तो बिचौलिये ड्राइवर को फर्जी वे बिल, कांटा स्लिप, माइनिंग चालान आदि थमा कर रवाना कर देते हैं. वाहनों के हुजूम में ये दोनंबरी वाहन आराम से निकल जाते हैं. इन कागजात को आसानी से पकड़ा भी नहीं जा सकता. फिर इस खनिज को झारखंड के जमशेदपुर और रामगढ़,  बंगाल के हल्दिया आदि में बेच दिया जाता है.

पारादीप, हल्दिया में होती है रिसीविंग

खदान से माल पारादीप के लिए निकलता है, मगर पहुंचता चोरबाजार में है. माफिया सिर्फ चालान लेकर पारादीप पहुंचते हैं. आधे-आधे पैसे में बात होती है और चालान रिसीव हो जाता है. इधर चोरबाजार वाला माल झारखंड-ओडिशा सीमा में कांडे नाला के आस-पास ट्रक से खाली किया जाता है. इसके बाद मजदूर लगा कर माल को तुड़वाया जाता है. फिर उसे जमा कर दो नंबरी कागजात के साथ बेचा जाता है. जोड़ा, कोयड़ा और  नलदा सेक्टर में भी कई स्थानों पर चोरी का माल जमा कर उसे फर्जी कागज की मदद से झारखंड भेजा जाता है. इस काम में क्षेत्र के कई युवा भी लगे हुए हैं.

न टास्क फोर्स बना, न चोरी रुकी

गौरतलब है कि ओडिशा के केंदुझर जिला अंतर्गत जोड़ा खनिज अंचल से अवैध और नये-नये तरीके से तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए चंपुआ के उपजिलापाल की अध्यक्षता में बैठक हुई थी. बैठक में सिडिकेट के माध्यम से जारी अयस्क चोरी पर अकुंश लगाने के लिए टास्क फोर्स गठित करने पर सहमति बनी थी. तस्करी हो रहे लौह अयस्क का निर्यात सड़क मार्ग से विभिन्न बंदरगाहों तथा राज्यों में किये जाने पर चर्चा करते हुए खदानों से चोरी और बंद क्रशर में रखे लौह अयस्क के स्टाक  की जांच की बात कही गयी थी, लेकिन अभी तक इस चोरी पर अंकुश लगाने में सफलता नहीं मिल सकी है.

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