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आदिवासियों को वन भूमि से बेदखल करना दुर्भाग्यपूर्ण, केंद्र सरकार की नजरअंदाजी के कारण आया एकपक्षीय फैसला : सुधीर पाल

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Ranchi : सुप्रीम कोर्ट का आदिवासियों को वन भूमि से हटाने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है. भारत के इतिहास में ऐसा दूसरी बार हो रहा है, जब आदिवासियों के खिलाफ ऐसा निर्णय आया हो, जिनकी जिंदगी ही जंगलों पर निर्भर रहती है. उक्त बातें झारखंड वनाधिकार मंच की संयोजक मंडली के सदस्य सुधीर पाल ने कहीं. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि 27 जुलाई तक जंगलों से आदिवासियों को हटाया जाये. इस निर्णय में आदिवासियों को अतिक्रमणकारियों की तरह पेश किया गया है, जो गलत है. आदिवासी कभी अतिक्रमणकारी नहीं हो सकते. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की नजरअंदाजी के कारण ऐसा एकपक्षीय निर्णय आया है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 11 लाख परिवारों को देश भर में जंगल से हटाया जायेगा. राज्य में इनकी संख्या लगभग 30 हजार होगी. ऐसे में एक बड़ी आबादी इससे प्रभावित होगी.

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केंद्र सरकार नहीं शामिल हुई सुनवाई में

इस दौरान संयोजक मंडली के सदस्य फादर जॉर्ज मोनोपल्ली ने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से केंद्र सरकार को भी इसमें शामिल किया गया, लेकिन चार सुनवाई में केंद्र सरकार इसमें शामिल नहीं हुई. अपने किसी वकील को सरकार ने भेज दिया. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने एकपक्षीय निर्णय सुना दिया. केंद्र सरकार की ओर से यह नहीं बताया गया कि जंगल में रहनेवालों को कई सालों से उनका दावा नहीं दिया जा रहा. राज्य के विभाग और मंत्रालय में इनके मामले लंबित हैं,  सरकार अगर इस पर जवाब दे देती, तो सुप्रीम कोर्ट का ऐसा फैसला नहीं आता.

वनाधिकार कानून से सरकार को खतरा

संजय बासू मल्लिक ने कहा कि सरकार कोर्ट में जवाब देने इसलिए नहीं गयी, क्योंकि सरकार को वनाधिकार कानून से खतरा है. सरकार के कोर्ट में उपस्थित नहीं होने से कोर्ट ने ऐसा फैसला दिया, जिससे सरकार को लाभ मिलेगा. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नौवीं अनुसूची का उल्लंघन है.

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सरकार सुप्रीम कोर्ट में दायर करे एफिडेविट

इस दौरान वक्ताओं ने अपनी मांग रखते हुए कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में फैसला वापस लेने के लिए याचिका दे. साथ ही केंद्र सरकार एफिडेविट करके बताये कि आदिवासियों के दावों को निरस्त नहीं किया जायेगा. वक्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार पर भी दबाव बनाया जायेगा कि दावा निरस्त करने की बात नहीं माने. साथ ही, राजनीतिक पार्टियों से इस संदर्भ में समर्थन मांगते हुए जन आंदोलन की अपील की जायेगी.

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