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खूंटी जिले के हर 18 वें व्यक्ति को सरकार देशद्रोही मानती है!  पत्थलगड़ी को लेकर जिला प्रशासन ने धारा 124 ए के तहत देशद्रोह का आरोपी  बनाया

जिले की कुल आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार  5,31,885 है. 30,000 से अधिक आदिवासियों पर देशद्रोह का मामला बनाते हुए प्राथमिकी दर्ज की गयी है.

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Pravin kumar

Ranchi/Khunti : 2611 Sq. Km में फैला खूंटी जिला आजाद भारत के इतिहास में शायद पहला जिला है जहां थोक भाव में देशद्राह के मामले दर्ज किये गये हैं . जिले का हर 18 वें व्यक्ति को सरकार देशद्रोही मानती है. जिले की कुल आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार  5,31,885 है. 30,000 से अधिक आदिवासियों पर देशद्रोह का मामला बनाते हुए प्राथमिकी दर्ज की गयी है. खूंटी जिले में 2016 से 18 के बीच 23 प्राथमिकियां पत्थलगड़ी के मामले में दर्ज की गयी. जिसमें करीब 250 लोगों को प्राथमिकी में नामजद अभियुक्त बनया गया और तीस हजार से अधिक लोगो पर  अज्ञात के रूप में एफआईआर दर्ज हुआ. इन एफआईआर में धारा 124 ए के तहत देशद्रोह जैसे संगीन आरोप लगाये गये हैं.

इसके साथ  मिली सूचना के अनुसार  45 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. जिसमें 19 गांव के हातू मुंडा (ग्राम प्रधान )भी शामिल हैं. कई एफआईआर में पूरे गांव के महिला और पुरुषों पर  अज्ञात के रूप में देशद्रोह के मामले दर्ज किय गये. पत्थलगड़ी को लेकर देशद्रोह के साथ के साथ-साथ आर्मस एक्ट एवं धारा -147, 148, 149, 341, 342, 323, 324, 325,  307, 109, 114, 124-अ,  153-अ, 153-इ, 295-अ, 186, 353, 290, 120इ, 302 की धाराएं लगायी गयी हैं.

पत्थलगड़ी और देशद्रोह के मामले में अनेक व्यक्ति जेल में हैं और कई अन्य के खिलाफ  गिरफतारी वारंट जारी किया गया है. इतना ही नहीं इलाके में जो नामदज लोग गिरफतार नही किये गये,  उनके धर की कुर्की जब्ती भी की जा रही है. देशद्रोह के मामले में खूंटी जिला प्रशासन ने  सोशल मीडिया में पत्थलगडी पर लिखने के  कारण भी 20 लोगों पर मामले दर्ज किये   जो पत्थलगड़ी के किसी भी कार्यक्रम में शरीक नही हुए थे.

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क्यों मुंडाओं पर दर्ज हुआ देशद्रोह का मुकदमा

खूंटी जिले में पांचवीं अनुसूची की रक्षा को लेकर और भूमि अधिग्रहण कानून, लैंड बैंक के विरोध में मुंडा समुदाय ने जिले के लगभग 86 गांवों में पत्थलगड़ी की थी. इसके बाद कई बार जिला प्रशासन और पत्थलगड़ी समर्थक आमने-सामने भी हुए थे. पत्थलगड़ी में तेजी आने की एक मुख्य वजह  मुंडा इलाके का मुंडारी खूंटकटटी गांवों का विकास योजना से वंचित रहना भी रहा था.

जब राज्य सरकार ने लैंड बैक में इलाके की जमीन को डाल दिया तो मुंडाओ में सरकार के खिलाफ रोष चरम पर पहुंच गया. ठीक इससे पहले खूंटी के मुंडा अंचल में रघुवर सरकार के द्वारा सीएनटी-एसपीटी एक्ट में किये जा रहे संशोधन के विरोध में भी जोरदार आंदोलन हुआ था. इस दौरान सायको गोलीकंड की घटना में कई मुंडा आदिवासी गंभीर रूप से घायल हुए थे और अब्राहम मुंडू की गोलीकंड में मौत हो गयी थी.

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 राज्य सरकार ने पत्थलगड़ी में लिखे संविधान की बातों का नहीं किया विश्लेषण

खूंटी जिले के तीन प्रखंडों खूंटी, अड़की एवं मुरहू के अनेक गावों में पिछले दो सालों में मुंडा आदिवासियों ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों और पेसा कानून के आधार और अपने पारंपरिक रीति-रिवाज अनुसार पत्थलगड़ी की है. इसके तहत गांव के सीमाने में एक पत्थर की स्थापना की है, जिसमें विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या एवं ग्रामसभा द्वारा तय कुछ नियम लिखे हैं. अधिकतर पत्थरों पर कुछ मूल बातें लिखी हुई हैं, जैसे जल, जंगल, ज़मीन पर आदिवासियों का अधिकार, ग्राम सभा की सर्वोच्चता, गांव में बाहरियों के घुसने पर रोक एवं आदिवासी ही मूल निवासी हैं.

पत्थलों में कई प्रावधानों व निर्णयों की जिस रूप से व्याख्या की गयी है, वह असाधारण जरूर हैं. कई व्याख्याएं शायद व्यावहारिक भी नहीं हैं. लेकिन इन व्याख्याओं पर लोगों के साथ चर्चा व विमर्श करने के बजाय राज्य सरकार आदिवासियों की मूल मांगों व मुद्दों को दरकिनार कर पुलिस के द्वारा कार्रवाई की जा रही है.

पत्थलगड़ी के मामले में राजभवन ने की पहल,  फिर भी स्थिति में बदलाव नहीं

खूंटी जिले के गांवों में पत्थलगड़ी के मामलों को देखते हुए राज्यपाल ने संवाद की पहल की.अप्रैल 2018 में  गवर्नर द्रौपदी मुर्मू ने जिले के छह ब्लॉक के ग्राम प्रधानों और परंपरागत पड़हा के साथ इस मामले पर बात कर की.  ग्राम प्रधानों को बाकायदा गाड़ियों से रांची बुलाया गया था. 16 बसों में सवार होकर सभी ग्राम प्रधान और गांव कीपारंपरिक वेशभूषा में रांची स्थित राजभवन पहुंचे.

राजभवन में खूंटी जिले  में की गयी पत्थलगड़ी के अलावे गांव की  विकास योजनाओं और शिक्षा समेत कई मुद्दों पर घंटों चर्चा की. लेकिन राजभवन में हुई चर्चा के बाद भी इलाके में पत्थलगड़ी के नाम पर की गयी पुलिसिया कार्यवाई को रोका नहीं जा रहा. अब तो गांवों में स्थिति ऐसी हो गयी है कि लोग अपनी संवैधानिक अधिकारो को लेकर सरकार से बातचीत की पहल नहीं करना चाहते.

खूंटी में पुलिसिया कार्रवाई की जगह संवाद से कायम हो सकती है शांति

आज खूंटी के खूंटकटी इलाके में जहां पत्थलगड़ी हुई है , एक-दो गांव में ही संवाद प्रकिया जिला प्रशासन ने स्थापित की. जहां बेहतर नतीजे भी सामने आये. लेकिन जिला प्रशासन ने जहां संवाद स्थापित किया,  वहां पत्थलगड़ी में लिखे गये संविधान के कुछ अंशों को मिटा कर नयी बात लिखी जा रही है. प्रशासनिक अदूरदर्शिता कई इलाको के मुंडा गांवों में अक्रोश का कारण बन रही है. वहीं  लोकसभा चुनाव के बाद खूंटी के राजनीतिक हालात ऐसे दिख रहे हैं.मानो राजनीतिक दलों के नेता जानबूझकर इलाके में संवाद प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते. आखिर क्यूं ? ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या संवाद प्रक्रिया को कायम करने में राजनीतिक दलों के स्वार्थ आड़े आ रहे हैं.

नुकसान तो ग्रामीणों का है

खूंटी में पुलिस पत्थलगड़ी को लेकर ग्रामीणों पर कार्रवाई कर रही है. ऐसे में राजनीतिक दलों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है.  साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा भी वर्तमान हालात से जिले को बाहर निकालने के लिए सार्थक पहल नहीं करना हालात को बद से बदतर बना रहा है. खूंटी में लाठी और डंडे के बल पर शांति स्थापित करना संभव नहीं.  क्या स्थानीय सांसद ,विधायक ,पंचायत के मुखिया, जिला परिषद, पंचायत समिति सदस्य, स्थानीय जनसंगठन एवं राज्य की सत्ताधारी राजनीतिक दल की निष्क्रियता खूंटी को लेकर चिंताजनक महौल बना रहा है.

खूंटी में द्रेशद्रोह के मुकदमे को लेकर जिला प्रशासन पर भी कई सवाल

इलाके में अगर पत्थलगड़ी समर्थक संविधान की गलत व्याख्या कर लोगों को भड़का रहे थे, तो सरकार क्या कर रही थी ? जनता के बीच सही तथ्यों को क्यों नहीं रखा गया ? इसमें कानूनविदों की सहायता क्यों नहीं ली गयी ? सरकार ने इस  दिशा में अब तक ग्रामीणों से टकराव के अलावा क्या रास्ता अपनाया है ? और अगर सरकार ने अपना काम किया है और उसमें सफलता नहीं मिल रही है, तो इसमें दोषी कौन है ?क्या बिना योजना के सिर्फ लाठी और डंडे के बल पर शांति स्थापित करना संभव है ? कहीं ये संवादहीनता आने वाले समय में खूंटी को और अराजक न बना दे ? ये संवादहीनता कहीं खूंटी जिले को  पुन: माओवाद-नक्सलवाद की ओर न धकेल दे.

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