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आज भी संताल हूल की चिंगारी मौजूद है आदिवासियों में

शहीद सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और बाजला के सपनों के देश की रक्षा के लिए कौन आगे आयेगा

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Pravin kumar

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khunti : जब कभी आदिवासी समाज की संस्कृति और जमीन को विघटित करने का प्रयास किया गया है प्रतिरोध की चिंगारी भड़ उठी. 1855 30 जून को संताल आदिवासियों ने महजनरो,  जमींदारों और अंग्रेजी शासन के जमीन कब्जा करने के खिलाफ हूल किया. इस हूल के अनेक संस्कृति और राजनीतिक संदेश हैं. संताल हूल की प्रासंगिता आज भी बनी हुई है क्योंकि आदिवासी समाज आज भी भूमि बेदखली और शासकीय जुल्म का शिकार है और आदिवासी समाज में आज भी स्वशासन की आकांखा मौजूद है. आदिवासी स्वशासन का अर्थ उनकी संस्कृतिक चेतना के साथ शासन करने और जल,  जगंल, जमीन पर समुदायिक हक को कायम रखने की है. संताल हूल इस वर्ष 30 जून को अपनी 162 वीं सालगिरह पूरा कर रहा है. भारतीय इतिहास के साथ साथ विश्व इतिहास में संताल हूल का जन आंदोलन के रूप में खासा स्थान है. वहीं दूसरी ओर हूल के वीर की गाथा संताल समाज में आज भी गीतों के रूप में याद करता है.

तोकोय हुकूमते बाजाल तोकोय बोलेते

रूपु सिंह ताम्बोली दोम माक् केदेया

सिदो हुकूमते नायगो कान्हू बोलेते

रूपु सिंह ताम्बोली दोञ माक्

केदेया/तीरेताम हातकड़ी

जांगारेताम बेड़ी

आमदोन चालाककान बजाल सिउड़ी

थानाते/ तिरोतिञ तिरियो नायगो

जांगारे तिञ लीपुर

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इञ दोञ चालाक्कान नायगो सिउड़ी मेला ञेल

इस गीत का भावार्थ यह है कि 1855 के विद्रोह के थोड़े दिन बाद गोड्डा सब डिवीजन के सुंदरपहाड़ी प्रखंड की बारीखटंगा गांव का एक युवक बजाल को जब विद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर पुलिस ले जाती है तो रास्ते में महिलाएं उनसे पूछती हैं कि बताओ बाजल, रूप सिंह तांबोली की हत्या तुमने किसके कहने पर की, सिदो या कान्हू के कहने पर,  तुम्हारे हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां लगी है और तुम्हें शिउड़ी थाना कैद कर ले जाया जा रहा हो ?  इस पर बाजला यह जवाब देता है, देखो मेरे हाथ में हथकड़ी या नहीं बांसुरी है और मेरे पैरों में बेड़ियां नहीं बल्कि घुंघरू बंधी है,  मैं तो शिउड़ी के मेला का आनंद लेने जा रहा हूं.

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सिदो ने कहा था, अब समय आ गया है फिरं‍गियों को खदेड़ने का

हूल

देश के इतिहासकारों के लेख के अनुसार देश की आजादी की पहली लड़ाई की शुरुआत भले ही 1857 मानी जाती है, लेकिन झारखंड अंग्रेजो के कार्यशैली और खुद को आजाद रखने की मानोवृति ने झारखंडी जनमानस को ब्रिटिश के खिलाफ हूल को दो वर्ष पूर्व ही शुरू हो गयी थी. जब 30 जून 1855 को साहेबगंज जिले के भोगनाडीह में 400 गांव के 40,000 आदिवासियों ने चार भाइयों सिदो, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में अंग्रेजों को मालगुजारी देने से इंकार करने की घोषणा की. इस दैरान सिदो ने कहा था, अब समय आ गया है कि फिरं‍गियों को खदेड़ने का. इसके लिए संतालो से कहा था- करो या मरो, अंग्रेज़ों हमारी माटी छोड़ो. अंग्रेजों ने तुरंत इन चार भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश जारी किया. गिरफ्तार करने आये दरोगा को संताल आंदोलनकारिओं ने गर्दन काटकर हत्या कर दी. इसके बाद संताल परगना के सरकारी अधिकारिओं में आतंक छा गया.

20 हज़ार संतालो ने जल, जंगल, जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी थी

अंग्रेजों ने प्रशासन की पकड़ कमजोर होते देख आंदोलन को कुचलने के लिए सेना को मैदान में उतारा, मार्शल लॉ लगाया गया. हजारों संताल आदिवासियों को गिरफ्तारी किया गया, लाठियां चली, गोलियां चलायी गयी. इस लड़ाई में चांद और भैरव शहीद हो गये. संताल हूल के दैरान जबतक एक भी आंदोलनकारी जिंदा रहा, वो लड़ता रहा. अंग्रेज इतिहासकार विलियम विल्सन हंटर ने अपनी किताब The Annals Of Rural Bengal  में लिखा है कि अंग्रेज का कोई भी सिपाही ऐसा नहीं था जो आदिवासियों के बलिदान को लेकर शर्मिंदा न हो. अपने कुछ विश्वस्त साथियों के विश्वासघात के कारण सिदो और कान्हू को पकड़ लिया गया और भोगनाडीह गांव में सबके सामने एक पेड़ पर टांगकर फांसी दी गयी. इस लड़ाई में लगभग 20 हज़ार संतालो ने जल, जंगल जमीन की हिफाजत के लिए अपनी कुर्बानी दे दी.

वर्तमान दैर में आदिवासी समाज हूल के दैर से कही अधिक संकट से झूझ रहा है. ऐसे में जल, जंगल जमीन पर पू़ंजीपतियों का अधिपत्य के विरोध में समाज हित की बात को लेकर सर्वव्यापी संर्घष के तेवर नहीं दिख रहे हैं. धीरे धीरे राजसता के अधिन नेतृत्व होता जा रहा है और आमजनों की जल, जंगल, जमीन पर अधिकार की बात पीछे छुटते जा रही है. अपने सम्मान की रक्षा और पूर्वजों की विरासत की रक्षा करने में कमजोर साबित हो रहे हैं लेकिन संताल हूल की चिंगरी मौजूद है आदिवासीयों समाज में. शोषण के विरुद्ध संघर्ष दीवानगी और हंसते हंसते शहीद हो जाने वाले वीर सपूत अपनी बलिदान दे रहे हैं, लेकिन आज कैसे बदलेगी सूरत शहीद सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और बाजला के सपनों के देश की रक्षा के लिए कौन आगे आयेगा.

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