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हेमंत सरकार के पहले टर्म में भी भोजपुरी-मगही पर हो चुका है भाषाई विवाद

Ranchi: सीएम हेमंत सोरेन के भोजपुरी, मगही भाषाओं पर दिये गये बयान से सियासी उफान बना हुआ है. पर इन भाषाओं के मसले पर विवाद पहली बार हुआ है, ऐसा नहीं है. हेमंत सरकार के पिछले कार्यकाल में भी इस पर राजनीति हो चुकी है. 2013-14 के दौरान टेट (TET) परीक्षाओं में इन भाषाओं को शामिल किये जाने के मसले पर काफी गहमागहमी सत्ता पक्ष के दलों के बीच ही हुई थी.

उस दौरान सीएम हेमंत सोरेन थे जबकि शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव. टेट में भोजपुरी, मगही को नजरअंदाज किये जाने से डाल्टनगंज के तत्कालीन विधायक के एन त्रिपाठी ने आपत्ति जतायी थी.

स्थिति यह हो गयी थी कि इस मसले को सुलझाने को कांग्रेस आलाकमान ने उस समय झारखंड के प्रभारी बीके हरिप्रसाद और केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश को रांची भेजा था.

कांग्रेस भवन में दिनभर चली बैठक के बाद अंततः भोजपुरी और अंगिका को भी टेट में बनाये रखने पर सहमति बनायी गयी थी.

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बाहरी कैंडिडेट्स को झारखंड में नौकरी पर विवाद

2013-2014 के दौरान राज्य में टेट के जरिये शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया चली थी. गीताश्री उरांव आशंकित थीं कि भोजपुरी, मगही बोलने वाले कैंडिडेट्स की संख्या अच्छी है. राज्य की नौकरियों में उन्हें रोकने को इन भाषाओं को सरकार के स्तर से रोका जाना चाहिये. इससे ये कैंडिडेट आवेदन करने से वंचित रह जायेंगे.

उनके इस संबंध में दिये गये बयान से काफी बवाल हुआ था. कांग्रेस आलाकमान को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा था. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत ने बाद में कहा था कि बेहतर भविष्य की आस संजोये कैंडिडेट्स के मामले में कोई भी बयान पार्टी फोरम में चर्चा के बाद ही दिया जाय.

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सभी डिवीजनों में हैं भोजपुरी-अंगिका बोलने वाले

पूर्व मंत्री के एन त्रिपाठी ने न्यूज विंग से कहा कि भोजपुरी, अंगिका जैसी भाषा के मसले पर वे पूर्व में भी अपनी आवाज उठाते रहे हैं. राज्य का कोई डिवीजन ऐसा नहीं है जहां भोजपुरी, अंगिका, मैथिली, मगही बोलने वाले ना हों. पलामू, चतरा, गढ़वा, लातेहार जैसे जिलों में 99 फीसदी तक लोग मगही, भोजपुरी बोलते हैं.

यही यहां के हर वर्ग के लोगों की भाषा है. हजारीबाग, कोडरमा, गिरिडीह, बोकारो, धनबाद, रांची के शहरी क्षेत्रों में मगही, भोजपुरी है.

ग्रामीण में खोरठा का प्रचलन अधिक है. गोड्डा, देवघर, साहेबगंज के अलावा पाकुड़ के कुछ हिस्सों में अंगिका का ही रिवाज कई सदियों से है. जमशेदपुर के शहरी क्षेत्रों में तो भोजपुरी, मगही, अंगिका, मैथिल भाषी ही हैं.

राज्यभर में 10 लाख से अधिक ऐसे लोग होंगे जो भोजपुरी ही बोलते हैं. झारखंड अलग राज्य का गठन भाषाई आधार पर नहीं हुआ है. क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करने और मिलकर आगे बढ़ने को हुआ है.

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झारखंड आंदोलन में मैथिल समाज का भी रोलः मिथिला मंच

झारखंड मिथिला मंच के प्रमुख मनोज मिश्रा के मुताबिक राज्यभर में 45 लाख से अधिक लोग ऐसे हैं जो मैथिली भाषा का ही प्रयोग संवाद, व्यवहार में करते हैं. तकरीबन हर जिले में इस भाषा को जानने वाले लोग हैं.

संथाल के कई जिलों में तो मैथिली, अंगिका बोलने वाले कई सदियों से वास करते रहे हैं. उनका मूल ही वहीं का है. देवघर, दुमका, गोड्डा, राजमहल, साहेबगंज और अन्य इलाके इनमें प्रमुख हैं.

झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में इस भाषाई समाज के लोगों ने भी कुर्बानियां दी हैं. ऐसे में सीएम के स्तर से अनावश्यक बयान देकर उन्हें अपमानित नहीं किया जाना चाहिये.

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