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आर्थिक-सामाजिक संकट हैं भी तो क्या हुआ… गाय, पाकिस्तान और राम मंदिर है न!

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Faisal Anurag

गाय, गोबर, पाकिस्तान, राम मंदिर और पीओके के इर्दगिर्द बार-बार भारत की राजनीति को केंद्रित करने का प्रयास उस दौर में तेज हो जाता है जब आर्थिक या सामाजिक संकट देश में गहराता है. बहस की दिशा में मोड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी स्वयं अभियान का नेतृत्व करने लगते हैं. इस क्रम में लवजिहाद और टुकड़े- टुकड़े गैंग को भी समय-समय पर लगाया जाता है.

दरअसल इस तरह के अभियान के दो मकसद होते हैं. एक तो ज्वलंत आर्थिेक संकट से ध्यान भटकाना और दूसरा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करना. चुनावों के नजदीक होने के साथ ही इस अभियान को पिछले सात सालों से अपनाया जा रहा है. इसके पहले भी इस तरह की कोशिशें की जाती थीं. लेकिन वे राजनीतिक फसल तैयार नहीं कर पाती थीं. बल्कि वे बुमरिंग हो जाती थीं.

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यानी एक तरह से निरर्थक. लेकिन 2012 के बाद गुजरात को जिन अधारों पर भाजपा ने प्रयोगशाला कहा उसमें इस तरह के प्रयास बारबार कामयाब हुए.

इस समय जबकि आर्थिक मंदी लगातार गहरा रही है. और केंद्र की पूरी सरकार इसे नकारते हुए दुश्मन की तलाश कर रही है. वैसे दौर में प्रधानमंत्री का रवांडा जैसे देशों का उदाहरण और गाय के साथ ओम का  ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्व रेखांकित करने के कई मायने हैं.

इस प्रचार से यह धारणा यानी परसेप्सन बनाने की कोशिश की जा रही है कि मोदी की नीतियों के कारण नहीं बल्कि दूसरे कारणों से ग्रोथ रेट में गिरावट आयी है. मोदी ने एक बार फिर गाय और ओम के बहाने अपने राजनीतिक विरोधियों पर प्रहार किया है. वे बताना चाहते हैं कि यदि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संकट है तो इसके लिए उनके विरोधी ही जिम्मेदार हैं.

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मोदी ने इसके साथ 2014 के चुनावों में जिस पिंक रिवोल्यूशन की बात कर गाय के सवाल को वोट से जोड़  दिया था, वे एक बार फिर उसे नयी अवधारणा देने की कोशिश में हैं. मोदी को पता है कि उनके पहले कार्यकाल में तो पिंक रिवोल्यूशन का वह संदर्भ ही हल किया जा सका जिसे वे ही गंभीर बताते रहे हैं.

प्रधानमंत्री आर्थिक तबाही और अपनी गरीबी के लिए कुख्यात रवांडा का उदाहरण दे रहे हैं जहां गाय का महत्व तो है लेकिन वह हिंदुओं की तरह पवित्र नहीं मानी जाती है.

इस पूरे संदर्भ में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटो सेक्टर की मंदी के लिए ओला-उबर को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी नीतियों का बचाव ही किया है. वास्तव में आर्थिक मंदी का कारण सरकार की नीतियां और प्राथमिकताएं हैं. केंद्र सरकार वोट के लिए जिस तरह बेशुमार घोषणा कर रही है, और धन बहा रही है उसके साथ ही वित्त प्रबंधन में नाकायाबी बरती जा रही है.

बजट के आंकड़ों को भी जिस तरह छुपाने का प्रयास किया जा रहा है, उससे पता चलता है कि सरकार सवालों के हल के लिए सजग नहीं है. हार्डवर्ड बनाम हार्ड की बात करने वाली यह सरकार न केवल विशेषज्ञों की अवज्ञा करती है बल्कि नीम-हकीम के इलाज पर ही यकीन करती दिखायी देती है. मारूति ने निर्मला सीतारमण के ओला-उबर पर किये गये दोषारोपण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि  ऑटो सेक्टर की मंदी के लिए ओला-उबर जिम्मेदार नहीं है. वित्त मंत्री यह भूल जाती हैं कि ओला-उबर बेरोजगार ही खरीदते हैं.

असल में वित्त मंत्री इस हकीकत को छुपा रही हैं कि जीएसटी सहित अनेक ऐसे कारक हैं जिसने ऑटो सहित भारत के तमाम सेक्टर के उद्योगों की कमर तोड़ दी है.  सरकार इस तथ्य को नकार कर ऐसे शॉफ्ट शत्रुओं की तलाश करती है जिससे यह परसेप्सन बने कि सरकार  गलत नीति पर नहीं है.

राज्यों की सरकारों की आर्थिक हालत भी बहुत अच्छी नहीं है

यह दौर ऐसा है जिसमें कानून की गरिमा को भी एकतरफा बना दिया गया है. तबरेज अंसारी की हुई लिंचिंग मामले में जिस बेशर्मी से लिंचरों का बचाव किया गया है, वह बेहद त्रासद बयान है.

सरकारों का नजरिया बताता है कि उसने जिस तरह की प्राथमिकता बनायी है, उसमें बहुसंख्यकों का हर तरह से तुष्टिकरण किया जा रहा है. कानून और निष्पक्षता  की गरिमा भी इससे प्रभावित हो रही है. लेकिन इसे ही राजनीतिक ताकत बना लिया गया है.

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