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सजा के बाद भी ड्यूटी पर जमे हैं अपर समाहर्ता, बेल पर हैं बाहर

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Chatra : सबका साथ और सबका विकास का दावा करनेवाली प्रदेश की रघुवर सरकार और उसका तंत्र एक बार फिर कटघरे में खड़ा है. इस बार सरकार और व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कोई और नहीं, बल्कि दो अधिकारियों के मामले ने ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है. जिला प्रशासन द्वारा एक ही मामले में दो अधिकारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जा रहा है. जिला प्रशासन जिस अधिकारी के साथ खड़ा है, उसे भ्रष्टाचार के मामले में निगरानी की अदालत ने दोषी करार देते हुए सजा भी सुना दी है. जबकि, दूसरे अधिकारी सहायक अभियंता आनंद प्रकाश पांडेय पर महज भ्रष्टाचार के आरोप ही लगे हैं. सहायक अभियंता का यह मामला न्यायालय में विचाराधीन भी है. हो सकता है कि अपर समाहर्ता को सजा की जानकारी जिला प्रशासन को न हो. दरअसल, चतरा के अपर समाहर्ता विनोद कुमार झा के विरुद्ध निगरानी कोर्ट में चल रहे एक मामले में फैसला आ चुका है.

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रांची में पदस्थापन के दौरान लगा था आरोप

रांची में उपसमाहर्ता के पद पर पदस्थापन के दौरान विनोद कुमार झा के विरुद्ध षड्यंत्र के तहत आवेदक से पैसे लेकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगा था. इस बाबत शिकायतकर्ता रिटायर्ड अंचल अधिकारी सुधीर कुमार ठाकुर की लिखित शिकायत पर निगरानी में कांड संख्या 17/2013 के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई थी. आठ मई 2013 को दर्ज हुई प्राथमिकी में तत्कालीन उपसमाहर्ता विनोद कुमार झा के अलावा लेखापाल दिलीप कुमार को नामजद अभियुक्त बनाया गया था.

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शिकायतकर्ता ने पैसा मांगने का लगाया था आरोप

शिकायतकर्ता ने उपसमाहर्ता पर सेवानिवृत्ति के बाद भुगतान की जानेवाली राशि के लिए पैसे मांगने का आरोप लगाते हुए निगरानी में शिकायत दर्ज की थी. इस पर कार्रवाई करते हुए निगरानी की टीम ने झा के लेखापाल दिलीप कुमार को घूस लेते रंगेहाथ गिरफ्तार किया था. उसके बाद पूछताछ के क्रम में दिलीप ने तत्कालीन उपसमाहर्ता का नाम निगरानी की टीम को बताया था. इसी आधार पर दोनों के विरूद्ध भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने और योजनाबद्ध तरीके से पार्टी से पैसे मांगने की प्राथमिकी दर्ज हुई थी. प्राथमिकी के करीब पांच वर्ष बाद निगरानी के विशेष जज संतोष कुमार की अदालत ने विगत चार सितंबर को मामले की सुनवाई करते हुए आरोपों को सही मानते हुए आरोपी तत्कालीन उपसमाहर्ता (वर्तमान अपर समाहर्ता, चतरा) को जेल भेज दिया. उसके बाद छह सितंबर को मामले में अपना फैसला सुनाते हुए अदालत ने अपर समाहर्ता विनोद कुमार झा को एक साल की सजा और पांच हजार रुपये जुर्माना की सजा सुना दी. इसके बाद उन्हें जमानत मिल गयी. लेकिन, आश्चर्य की बात तो यह है कि विनोद कुमार झा से जुड़े इस मामले में जिला प्रशासन द्वारा न तो अब तक राजस्व विभाग को सूचना दी गयी है और न ही गृह और कार्मिक विभाग को. जबकि, जिला परिषद के सहायक अभियंता आनंद प्रकाश पांडेय को निगरानी द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेजने के बाद उन्होंने जमानत पर बाहर आते ही विभाग में योगदान के लिए आवेदन दिया है. लेकिन, उनसे यह कहकर योगदान नहीं लिया जा रहा है कि ग्रामीण विकास विभाग से मंतव्य की मांग की गयी है, दिशा-निर्देश मिलते ही अग्रतर कार्रवाई की जायेगी. लेकिन, इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब सहायक अभियंता पर आरोप भर लगने से प्रकरण में विभाग से मार्गदर्शन मांगा जा सकता है, तो सजायाफ्ता अधिकारी के मामले में राजस्व विभाग और कार्मिक से क्यों नहीं? जिला प्रशासन सीनियर और जूनियर अधिकारियों के बीच सौतेला व्यवहार क्यों अपना रहा है? इधर, इस मामले में जिला प्रशासन का पक्ष जानने के लिए कई बार डीसी जितेंद्र कुमार सिंह को फोन किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया.

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