Opinion

महामारी को असहमति का गला घोंटने का बहाना बनाया गया

विज्ञापन

Faisal Anurag

” नरेंद्र मोदी के शासन में महामारी को असहमति का गला घोंटने का बहाना बनाया गया. और भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र गहन अंधकार में चला गया.” यह टिप्प्णी मशहूर पत्रिका टाइम ने की है. टाइम मैगजीन ने नरेंद्र मोदी को दुनिया के 100 ताकतवर लोगों में शामिल करते हुए सख्त टिप्पणी लिखी है. मैगज़ीन आगे लिखती है कि जहां दलाई लामा ने भारत को एक समरसता और स्थिरता की धरती बताया था, वहीं मोदी की खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी कहलाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने न सिर्फ़ Elitsim को अस्वीकार किया बल्कि बहुलतावाद को भी अस्वीकार किया. और विशेष रूप से मुसलमानो को निशाना बनाया. मोदी ने भारत की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को सन्देह में ला दिया है. दुनिया भर में लोकतंत्र पर गहराते संकट के बीच दुनिया भर में उभरे कुछ नेताओं ने न केवल लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तारतार कर दिया है बल्कि लोगों के अधिकारों पर भी हमला किया है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ताजा कथन भी बता रहा है कि लोकतंत्र किन मुश्किल हालात का सामना कर रहा है. ट्रंप ने कहा कि वे चुनाव हार जाने के बाद भी हस्तांतरण की रस्म आसानी से नहीं होने देंगे. अमेरिका जैसे लोकतंत्र में पहली बार किसी राष्ट्रपति ने इस तरह का बयान दिया है.

इसे भी पढ़ें – 1349 नये कोरोना संक्रमित मिले, 4 की मौत, राज्य में 76438 पॉजिटिव केस

अमेरिका में राष्ट्रपति का पद चार सालों का होता है. और एक व्यक्ति दो बार ही राष्ट्रपति चुना जा सकता है. इस साल नवबंर में राष्ट्रपति पद का चुनाव तय है. और ट्रंप सर्वेक्षणों में लगातार पिछड़ रहे हैं. ऐसे में उनके इस बयान को समान्य नहीं माना जा सकता है. यह उस प्रवृति को ही जाहिर करता है जो दुनिया के अनेक शासक इस समय इस्तेमाल कर रहे हैं. लोकतंत्र को शासक की पूरी एक खेप हाइजेक करने में लगी हुई है. भारत के संबंध में टाइम की टिप्पणी को इस संदर्भ से काट कर नहीं देखा जा सकता है. पिछले ही साल टाइम के कवर पेज पर मोदी के लिए डिवाइडर इन चीफ लिखा गया था. और इस पर एक बड़ा आर्टिकल छापा गया था. लंदन से प्रकाशित मशहूर पत्रिका द इकोनॉमिस्ट भी मोदीकाल में लोकतंत्र को ले कर गहरी चिंता कई बार व्यक्त कर चुका है.

इसे भी पढ़ें – प्रोन्नति और सीधी नियुक्ति के माध्यम से मिडिल स्कूलों में तीन हजार प्रिंसिपल्स की होगी नियुक्ति

बकौल पत्रकार उर्मिलेश भारत की डेमोक्रेसी तेजी से कारपारेटाक्रेसी की ओर अग्रसर है. भारत में मॉबोक्रेसी की चर्चा की की जाती रही है. जिस तरह भारत में कारपारेट ताकतों का सत्ता पर वर्चस्व बढा है उस की छाया उन नीतियों और विधेयकों पर भी पड़ने लगी है जिनका सरोकार मजूदरों और किसानों से है. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी कह रहे हैं कि कुषि और श्रम विधेयक क्रमश: किसानों और मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए लाए गए हैं. इसी तरह की बात तो नोटबंदी और जीएसटी के संदर्भ में भी की गयी थी. नोटबंदी का लक्ष्य देश में आतंकवाद और कालाधन को खत्म करना था. लेकिन परिणाम बता गया कि नोटबंदी के बाद भी कालाधन समस्या है. और आतंकवाद भी. जबकि जीएसटी के बाद तो राज्यों के आर्थिक हालात ही बदतर हो गए हैं. हालत की गंभीरता यह है कि अब केंद्र राज्यों की हिस्सेदारी भी नहीं दे पा रहा है.
लॉकडाउन के बावजूद भारत में कोविड एक गंभीर संकट है. और 91 हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. किसानों और श्रमिकों की चिंता को भी खारिज नहीं किया जा सकता है.

महामारी के बीच कृषि और श्रम विधेयक जिस तरह पारित कराए गए, उससे संसद की गरिमा को ले कर भी सवाल उठे हैं. राज्यसभा में कृषि विधेयक के दौरान वोटिंग नहीं करायी गयी. और श्रम विधेयक तो विपपक्ष विहीन संसद से पारित कराया गया. प्रसिद्ध पत्रकार एमके वेणु ने इसे विध्वसंकारी खेल की संज्ञा दी है. वेणु ने लिखा है : ऐसा लगता है कि मोदी कुछ हद तक घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं. और महामारी के चलते पैदा हुई उथल-पुथल के बीच इन नए सुधारों के नाम पर एक बड़ा जुआ खेल रहे हैं. यह सब किसानों और श्रमिकों के हितों को आगे बढ़ाने के नाम पर किया जा रहा है.

adv

इसे भी पढ़ें – गिरिडीह सदर अंचल के राजस्व कर्मी को एसीबी ने 3500 रूपये की रिश्वत लेते किया गिरफ्तार

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button