Opinion

पर्यावरणः मानव अस्तित्व 2050 तक गंभीर संकट में होगा

Faisal Anurag

मानव अस्तित्व 2050 तक गंभीर संकट में होगा. यह चेतावनी वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को देखते हुए दी है. 4 जून को जारी आस्ट्रेलियन थिंक टैंक की रिपोर्ट में इस का उल्लेख किया गया है. इस चेतावनी में कहा गया है कि पृथ्वी का तापमान 2100 तक 3 उिग्री सेल्सियस तक बढ़ जायेगा. रिपोर्ट का संकेत यह भी है कि किस तरह दुनिया पर्यावरण और जलवायु का नुकसान कर रही है. इसके साथ ही दुनिया भर की सरकारों का वास्तविक सरोकार जलवायु संकट से निपटने की प्रतिबद्धता नहीं दिखा रहा है.

इसे भी पढ़ेंः तो क्या पांच उपमुख्यमंत्री की परिघटना राजनीति में नया समीकरण का आगाज साबित होगी ?

दुनिया भर में जिस तरह के जलवायु असंतुलन के हालात देखे जा रहे हैं उसकी गंभीरता को नजरअंदाज करने का वक्त तेजी से गुजरता जा रहा है. बावजूद इसके जिस तरह चौतरफा संकट गहराया है उसके प्रति सरकारों कर रुख आश्वसत नहीं करता है. 2015 के पेरिस प्रतिबद्धताओं की हकीकत यह है कि सरकारों ने उसे केवल कागजी बना दिया है. अमरीका तो जलवायु संकट की गंभीरता को ही मानने को तैयार नहीं हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने तो अपने पूर्व के लोगों से अलग नजरिया अपना कर क्लाइमेट संकट के सवाल पर जिस तरह की बेरूखी दिखायी है वह बेहद गंभीर है. पेरिस प्रतिबद्थताओं के प्रति उनका नजरअंदाज करने का ढुलमुल रवैया पृथ्वी के लिए बेहद घातक है.

इस रिपोर्ट में उन तमाम कारणों और क्षेत्रों के बारे में बताया गया है जो तेजी से संकटग्रस्त हो रहे हैं. इसमें खेती, जंगल और पानी के संकट को विशेष फोकस किया गया है. यह न तो कोई पहली रिपोर्ट है और न ही आखिरी. समय आ गया है कि दुनिया भर के देशों में पर्यावरण और जलवायु असंतुलन के सवाल को ले कर राजनीतिक दलों और सरकारों पर दबाव बनाया जाये.

ग्रेटा थंबवर्ग एक स्कूली छात्रा हैं और अपनी छोटी सी उम्र में वे पूरे यूरोप और अमरीका में क्लाइमेट चेंज वारियर के रूप में बड़े आंदोलन का केंद्र बन कर उभरी हैं. ग्रेटा ने नोयडिक देशों के बाद यूरोप में इस बहस को तेज किया है कि हम अब जलवायु परिवर्तन के सवाल को नजरअंदाज नहीं कर सकते और सरकारों को अपनी उन नीतियों को बदलना होगा जिससे मानव जाति के सामने अस्त्त्वि का खतरा पैदा हो गया है. ग्रेटा का अकेले शरू किया गया अभियान यूरोप के विभिन्न देशो के संसदों में बहस को तेज कर रहा है. यूरोप का संकट ही इतना गहरा है कि उसे ग्रेटा ने आंदोलित कर दिया है. ब्रिटेन की संसद ने ग्रेटा का भाषण करवाया और वहां के पर्यावरण मंत्री ने उससे लंबी बात की. विपक्ष के नेता लेबर पार्टी के कोर्बिन ने भी ग्रेटा के अभियान के प्रति उससे मुलाकाल कर समर्थन व्यक्त किया. यूरोप के कई देशों में विकास की उन नीतियों को लेर बहस तेज हो गयी है जिससे जलवायु का नुकसान हो रहा है और असंतुलन व संकट गंभीर होता जा रहा है.

इसे भी पढ़ेंः क्यों बिछड़ गए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी

यूरोप के इस घटनाक्रम का असर एशिया, अफ्रीका, अमरीका और अरब पर भी पड़ेगा. यूरोपीय यूनियन के चुनाव में जिस तरह ग्रीन पार्टियों का मत प्रतिशत और सीट बढ़े हैं. उसका भी संकेत साफ है कि राजनीति समूहों को क्लाइमेट के सवाल को प्रमुखता देनी होगी. दुनिया भर के आदिवासी इलाकों में वर्तमान विकास नीतियों का जिस तरह प्रतिरोध है उसके राजनीतिक संदर्भ को भी गंभीरता से रेखांकित करने की जरूरत हे. आदिवासी समाजों ने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और जंगल जल बचाने के अभियान को दुनिया भर में तेज कर रखा है. अफ्रीका के देशों के साथ भारत जैसे देश में भी आदिवासी आंदोलनों का संदेश प्रकृति के संरक्षण ओर बचाव का ही है. आदिवासी आंदोलनों के स्वर को ही ग्रेटा ने अपने संदर्भ में मुखर किया है. ग्रेटा जिस क्लाइमेट डेमोक्रेसी का मुखर आवाज बनी हैं, उसकी जडें आदिवासियों के आंदोलन में ही हैं. आदिवासियों ने सदियों से पकृति से खेलने ओर लूटने के खिलाफ मुखर प्रतिरोध किया है. अमरीका में भी जब आदिवासियों को बेदखल ओर संहार का शिकार बनाया जा रहा है, इस तरह के स्वर ही बुलंद हुए थे. झारखंड में भी  उपनिवेशवादी विस्तार और विकास को आदिवासियों के जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है. भारत के विभिन्न अंचलों में आदिवासियों के प्रतिरोध से यह आवाज बुलंद हुई है कि भारत के राजनीतिक दलों का विकास एजेंडा घातक है और उससे पूरी मानव जाति तेजी से संकटग्रसत होती जा रही है.

इस हालात में भारत के राजनीतिक दलों के एजेंडा में जिस तरह जलवायु और पर्यावरण के सवाल गौण हैं उसे बदलने का वक्त आ गया है. भारत उन देशों में है जिसकी जलवायु तेजी से बदल रही है ओर इस के कारण जलसंकट के साथ कई अन्य गंभीर हालात बढ रहे हैं. वर्षा भी जिस तरह प्रभावित हुई है उसे ज्यादा देर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है. भारत की राजनीति को परास्थिकी सेंट्रिक बनाये जाने का वक्त आ गया है. इसके साथ ही विकास के एजेंडा पर भी पुनर्विचार किये जाने की जरूरत है.

इसे भी पढ़ेंः आर्थिक सुस्ती के खिलाफ मोदी सरकार को उठाने होंगे बड़े कदम

 

Telegram
Advertisement

Related Articles

Back to top button
Close