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निजता पर इमरजेंसी

त्वरित टिप्पणी

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Faisal Anurag

जब इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपी थी, तब जयप्रकाश नारायण ने कहा था – विनाश काले विपरीत बुद्धि. यही बात केंद्र सरकार के उस कदम के लिए भी है जो किसी भी नागरिक के डेटा को खंगालने का अधिकार दस एजेंसियों को दे दिया है. मोदी सरकार पर आरोप लगता रहा है कि वह जांच एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल करती है और विरोधियों पर इस बहाने नियंत्रण पाने की कोशिश कर रही है.

तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद सरकार और भारतीय जनता पार्टी में घबराहट साफ दिख रही है. निजता पर सरकार का यह हमला उसी का नजीता है. पर्सनल लिबर्टी बड़े संघर्षो के बाद देश और दुनिया के अनेक मुल्कों ने हासिल किया है. आज भी यह लोकतंत्र का अत्यंत संवेदनशील मामला है. देश ने इंदिरा गांधी के राजनीतिक इमरजेंसी को बर्दाश्त नहीं किया था. जाहिर है कि भारत के लोग मोदी सरकार के लिबर्टी पर इस इमरजेंसी को भी नहीं सहेंगे. देश में बढ़ते आर्थिक संकट के बीच लोकतंत्र के संवेदनशील सवाल पर हमला बढ़ता जा रहा है. राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो 2019 के पहले सरकार इस तरह के और भी अधिक कठोर और दमनात्मक कदम उठाने की कोशिश कर सकती है. यह कदम उसका अहसास कर रहा है.

यह विडबंना ही है कि जिन लोगों ने इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का विरोध कर राजनीति में पहचान बनायी, वे इंदिरा गांधी से एक कदम आगे बढ़ने में झिझक भी नहीं रहे हैं. देश के मशहूर कानूनविद मिहिर देसाई ने एक बार कहा था कि यह सरकार बिना इमरजेंसी की घोषणा किए तमाम तरह के वे कदम उठा रही है जिसे इमरजेंसी के प्रावधान भी न्यायोचित नहीं ठहरा सकते हैं. देसाई के इस तर्क में काफी दम है.

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी से शासकों ने यह सीख लिया है कि बिना इसकी घोषणा किए वे लोकतंत्र में लोगों के अधिकारों में कितना और किस तरह कटौती कर सकती है. और जनसवालों पर प्रतिरोध के तमाम कदमों का दमन कर सकती है. सरकार ने देश में एक भय का माहौल बना रखा है. नए प्रावधान के बाद एजेंसियों को असीमित अधिकार हासिल हो गए हैं और देश का कोई भी नागरिक इनके रडार पर है. तो क्या भारत का संविधान जिस निजता के अधिकार की गारंटी करता है उसे कोई भी सरकार इतनी आसानी से छीन सकती है. अभी तक फोन टैपिंग के मामले को ले कर देश में अनेक तरह की बहस होती रही है और इस पर सहमति रही है कि नागरिक अधिकारों की हिफाजत हर हाल में की जानी चाहिए और केवल शक के आधार पर किसी नागरिक के निजी जीवन में राज्य को दखल देने का अधिकार प्रदान नहीं किया जा सकता है.

नागरिक अधिकारों के वैश्विक घोषणा पत्र में भी इस बात की गारंटी की गयी है कि लोकतंत्र का बुनियाद नागरिकों की आजादी है और राज्य को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है. भारत में वह राजनीतिक परिघटना भी हुयी है जब मामूली दो सिपाही के निगरानी रखने के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया था. 1975 के बाद से देश में नागरिक अधिकारों के लिए देश में सजग वातावरण का निर्माण हुआ. मोदी सरकार के इस कदम के बाद नागरिक अधिकारों और उसकी स्वतंत्रता की हिफाजत का सवाल अत्यंत संवेदनशील दौर में है. अब तक राज्य  और उसकी एजेंसियों के पास किसी के फोन टैपिंग के लिए सीमित अधिकार ही थे और उसका बेजा इस्तेमाल नहीं हो इसके लिए अनेक चेक और बैलेंस की व्यवस्था थी. नीरा राडिया टेप कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद यह प्रावधान किया गया था कि गृह सचिव की अनुमति के बाद ही किसी के फोन को टैप किया जा सकता है और सात दिनों के बाद जांच एजेंसी को गृह सचिव को रिपोर्ट करनी होगी होगी कि जांच से संबंधित मामले में क्या फायदा हुआ. लेकिन मोदी सरकार ने अब असीमित अधिकार दे कर किसी के भी फोन, कंप्यूटर और अन्य डाटा स्टोर पर खतरा पैदा कर दिया है. मात्र निजी सूचना के लिए रखा गया भी कोई डाटा किसी को मुसीबत में फंसा सकता है. भारत जैसे देश में इस बात की बहुत ज्यादा गुंजाइश है कि जांच निजी खुंदक के कारण या राजनीतिक विरोध के कारण भी किसी को परेशान किया जा सकता है. अभी मणिपुर में एक संपादक को केवल इसलिए जेल भेज दिया गया है कि उसने राज्य सरकार और मोदी सरकार की आलोचना की थी. देश में पिछले कुछ समय से देखा जा रहा है कि राजनीतिक विरोध के कारण कई लोगों पर देशद्रोह का ममला दर्ज किया गया और उन्हें परेशान किए जाने का सिलसिला अब तक जारी है. दुनिया के तमाम लोकतंत्र अपने नागरिकों की निजी स्वतंत्रता के लिए सजग रहता है. लोकतंत्र ने इसी कारण अपनी साख को दुनिया भी में बना रखा है और एक विचारधारा की तरह अब तक अपराजेय रहा है. जिन देशों ने गैर लोकतांत्रिक कदम उठाये उन्हें भारी जनविक्षोभ और प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है. भारत को यदि लोकतंत्र के रूप में कामयाब बने रहना है तो उसे संविधान में प्रदत्त नागरिक अधिकारों की रक्षा हर कीमत पर करनी होगी.

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