Opinion

इमरजेंसी में गिरफ्तारी…

Shrinivas

(आंदोलन और अब तक के जीवन की अंतिम गिरफ्तारी)

वर्ष 1975 में आज ही, 28 जून को मैं गिरफ्तार हो गया. 26 जून को अहले सुबह आपातकाल की घोषणा की खबर रोडियो (बीबीसी) पर मिली. तब मैं मुजफ्फरपुर में था. परिवार के साथ. जेपी सहित विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं की गिरफ्तारी की खबर से सन्न था. मैंने अगले दिन बेतिया जाना तय कर लिया. बाबा (पिता) के यह कहने पर कि इस बार पकड़ाने पर लंबे समय तक अंदर रहना पड़ेगा, कहा- पहले लापरवाह रहते थे, अब आसानी से गिरफ्तार नहीं होंगे. मैं 27 को दोपहर में बेतिया पहुंच गया. सतर्कता बरतते हुए पंकज जी के आवास (कालेज कैंपस में) पहुंचा. वह नहीं थे. फिर उनके छिपने की जगह गया. शाम को एक कब्रिस्तान में दस बारह साथी जुटे. 28 जून को बेतिया बंद कराने का निर्णय हुआ.

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मोतिहारी बंद के कुछ सौ परचे थे. उन पर मोतिहारी को कलम से काला कर बेतिया लिखा गया. अगली सुबह मीना बाजार के पास जुटना तय करके हम सब अलग अलग निकले. आम लोगों के अलावा मीना बाजार और लाल बाजार की दुकानों पर परचा देते और ‘कल बेतिया बंद है’ कहते हुए अपने सुरक्षित ठिकानों को लौट गये. सुबह सात बजे 15- 20 साथी मीना बाजार के पास अवंतिका होटल (जो एक कांग्रेसी का था) के निकट जमा हुए. तानाशाही मुर्दाबाद, इंदिरा गांधी इस्तीफा दो, जेपी को रिहा करो आदि नारे लगने लगे. हालांकि बाजार अभी पूरा खुला नहीं था, फिर भी अफरा तफरी मच गयी. आसपास तमाशाबीनों की भीड़ थी.

अवंतिका होटल के मालिक उलझ पड़े. हल्ला गुल्ला होने लगा. हम कुछ साथी पास के राज हाई स्कूल चले गये- स्कूल बंद कराने और कुछ लड़कों को साथ लाने. क्लास में घुस घुस कर हम लड़कों को बाहर निकलने के लिए कहने लगे. तभी प्रिंसिपल साहब आकर डांट के अंदाज में बोले- आपलोग छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं. निकल जाइये यहां से.

हमने उलझने से परहेज किया. फिर भी 25-30 तीस लड़के हमारे साथ बाहर आ गये. हम वापस चौराहे पर लौटे. नारेबाजी और हंगामे का दौर जारी था. खुली हुई अधिकतर दुकानें बंद हो चुकी थीं. दुकानदार और ग्राहक तमाशबीन बने हुए थे. तभी दो गाड़ियों पर पुलिस पहुंच गयी. नगर थाना प्रभारी रामाधार सिंह लीड कर रहे थे. सिपाही लोग आंदोलनकारियों की ओर झपटे. सभी बचने के लिए भागने लगे.

मैं एक परिचित पान की दुकान पर खड़ा था. दारोगा को उधर बढ़ते देख कर लगा कि उसने मुझे पहचान लिया है, पकड़ने के इरादे से आ रहा है. हालांकि बाद में जाना कि वह मेरा भ्रम था. मैं बचने के लिए दर्जी और अनाज वाली पट्टी में दौड़ गया. मुझे तमाशबीनों की भीड़ के कारण दौड़ने में दिक्कत हो रही थी. कुछ देर में ही पकड़ा गया.  रामाधार सिंह बोले- बड़ा नेता बनते हैं, भाग काहे रहे थे? मैंने कहा- अब कालर तो छोड़िये. आप जानते हैं, अब नहीं भागेंगे.

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इतनी दौड़ा दौड़ी के बाद भी हममें से सिर्फ तीन पकड़े गये. थाना लाकर बंद कर दिया गया. मुझे बाबा की चेतावनी याद आ रही थी और खुद पर झुंझला रहा था. दिन भर में दो और गिरफ्तारी हुई- कुल पांच. एक अजीज भाई (अब नहीं हैं), दूसरे का नाम याद नहीं. हमेशा की तरह हमारे यह कहने पर भी कि हमें पैदल जेल चलिये (ताकि हम रास्ते भर नारा लगाते जायें, लोगों को पता चले कि आंदोनकारी जा रहे हैं) हमें शाम तक जेल पहुंचा दिया गया.

 

फिर रोज कुछ आंदोनकारी आने लगे. दस दिन बाद पंकज जी भी. उनको उनके मामा के घर से देर रात पकड़ा गया. धीरे धीरे हमारी संख्या बढ़ने लगी. छोटी जेल. जगह कम पड़ने लगी. अंततः 28 या 29 जुलाई को दो बसों में भर कर कुल 90 आंदोनकारी बंदी भागलपुर (विशेष) कारा पहुंचा दिये गये. करीब एक साल जेल में रह कर हम (पंकज जी और मैं) जून 1976 के पहले सप्ताह में जमानत पर बाहर आ गये.

 

भागलपुर जेल, जहां लगभग नौ सौ आंदोनकारी बंद थे, प्रवास का विवरण बहुत लंबा हो जायेगा. मेरे खयाल से इमरजेंसी के दौरान भागलपुर सहित तमाम बड़ी जेलों में ही छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी का मुकम्मल प्रशिक्षण (हमारे जिले का वार्ड ही वाहिनी का के़द्र था.) हुआ. हम जेपी के विचारों और संपूर्ण क्रांति आंदोलन के विभिन्न आयामों को ढंग से समझ सके; और समग्र बदलाव के प्रति हमारा कमिटमेंट मजबूत हुआ.

फिलहाल इतना ही. वैसे भी यह सब पहले भी लिख चुका हूं. फिर भी आज 28 जून को अनायास वह सब याद आ गया.

 

पुनश्च : बाहर का नजारा बहुत निराशाजनक था. समर्थक कन्नी काटते थे. सामने पड़ने पर मुंह फेर लेते थे. गिरफ्तारी के भय से अनेक साथियों का अंदाज भी बदला हुआ था. वे पूरी तरह निष्क्रिय थे. हम भी बेतिया के बजाय (फिर से पकड़े जाने का खतरा था ही) पूरे जिले, खास कर गांवों में घूम घूम कर आंदोलन को जिंदा रखने और शांत पड़ गये साथियों को जोड़ने और किसी हद तक सक्रिय करने का प्रयास करते रहे.

 

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