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दलबदल का स्याह दौर लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह

भारत की राजनीति का आर्थिक सामाजिक सवालों से परे केवल चुनावी जीत हार के जोड़तोड़ पर बढ़ती निर्भरता राजनीति के सैद्धांतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचा चुके हैं.

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Faisal Anurag

दलबदल भारत की राजनीति का एक ऐसा स्याह पहलू है, जिससे सत्ता का समीकरण भले ही अनुरूप बन जाता हो, लेकिन राजनीतिक दलों की साख और लोकतंत्र की गरिमा इससे कमजोर ही होती है. भारत की राजनीति का आर्थिक सामाजिक सवालों से परे केवल चुनावी जीत हार के जोड़तोड़ पर बढ़ती निर्भरता राजनीति के सैद्धांतिक मूल्यों को नुकसान पहुंचा चुके हैं. इससे म में एक तरह की निराशा भी बढ़ती है.

मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इससे आहत महसूस करता है और राजनीतिक विचारों को लेकर उसका आग्रह भी कमजोर पड़ता है. भारत का दलबदल का इतिहास एक कलंक बना हुआ है.

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आज के दौर में यह नहीं कहा जा सकता है कि किसी राजनीतिक दल से किसी व्यक्ति का मोहभंग किसी वैचारिक टकराव का नतीजा है. पार्टियों के छोटे बड़े विभाजन भी ज्यादातर मामलों में किसी सैंद्धांतिक मतभेद का नजीता नहीं हैं.

भारत में वोट के समीकरण का जाति और धार्मिक ध्रुवीकरण  पर बढ़ती निर्भरता को राजनीति से लोगों के जरूरी सवालों को दरकिनार-सा कर दिया है. राजनीति पर बढ़ते कॉरपोरेट नियंत्रण ने तो मुख्यधारा की पूरी राजनीति में वैचारिक सवालों को लगभग खत्म सा कर दिया है. अनेक प्रमुख दलों के बीच अब अंतर भी बहुत कम होता जाना भी विकल्पहीनता की स्थिति पैदा करती है.

कुछेक दल ही ऐसे हैं जो सामाजिक और आर्थिक न्याय की राजनीति को अभी भी जीवित रखे हुए हैं. सत्ता से हक की जगह केवल हिस्सेदारी हासिल करने की बहस ने भी मूल्यों में क्षरण पैदा किया है. यही कारण है कि अब दलबदल जैसे सवालों पर राजनीतिक विक्षोभ कम ही दिखता है.

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जनविक्षोभ की लगातार कमी के कारण ही दलबदल के लिए नेताओं को ताकत मिलती है. चूंकि दलबदल में किसी भी राजनीतिक दल के बड़े नेताओं की भूमिका होती है, इसलिए पुराने नेता या कार्यकर्ता ठगा हुआ महसूस करने के बाद भी अपने गुस्से और विरोध का इजहार नहीं कर पाते हैं.

भारत की राजनीति में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया और दलबदल की बढ़ती प्रवृति के संबंधों का आकलन कम ही किया जाता है. 1990 के बाद की भारत की राजनीति आर्थिक उदारीकरण की शिकार है.

आर्थिक उदारीकरण के बाद जिस तरह कॉरपोरेट ने राजनीतिक दलों और सरकारों पर असर डाला   और धीरे-धीरे अपने दखल को निर्णायक बना दिया है, उससे भी राजनीतिक साख और संकट गहरा हुआ है. य

ह वही दौर है, जहां अलग-अलग दलों के बीच आर्थिक सवालों पर अलगाव खत्म सा हो गया है. आयाराम और गयाराम तथा भजन लाल के दलबदल ने एक जमाने में भारत की राजनीति में जिस तरह का विवाद खड़ा किया, उसे निपटाने के लिए बड़े राजनीतिक सुधार की जरूरत थी, लेकिन राजनीतिक दलों ने इसे टाल दिया.

भारत का दलबदल कानून भी लचर है. कुछेक मामलों में जिस तरह उसे और कमजोर किया गया, उससे संसदीय बदबदल को बढ़ावा ही मिला है. इसमें उत्तर प्रदेश,हरियाणा और झारखंड में विधानसभा में हुए दलबदल की घटनाओं पर जिस तरह का रूख उभरा है, वह बेहद गंभीर मामला है. भारत में जब दलबदल का कानून बना था, तब भी वह केवल संसद और विधायिकी के लिए ही बनाया गया था.

राजनीतिक दलों पर इसे लेकर किसी भी तरह का बंधन नहीं डाला गया है. राजनीतिक सुधारों के सवालों को उठाने वाले समूह मांग करते रहे हैं कि राजनीतिक दलों के भीतर भी दलबदल के मानदंड तय होने चाहिए और चुनावों में टिकट देने की अर्हता इस संदर्भ में तय किया जाना चाहिए.

2014 में हुए बड़े पैमाने के दलबदल और फिर 2019 में चुनावों के समय जिस तरह नेता दलबदल कर टिकट हासिल कर रहे हैं, यह किसी भी लोकतंत्र के लिए बड़ी चेतावनी है.

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जनादेश का इससे बड़ा  अपमान और क्या हो सकता है और साथ ही उन कार्यकर्ताओं के लिए तो यह राजनीतिक वज्रपात ही है, जो अपने-अपने दलों के विचारों के लिए जान की बाजी तक लगा देने का जज्बा दिखाते रहे हैं. अब दलबदल में जिस तरह धन का भी वर्चस्व निर्णायक हुआ है, उसकी गंभीरता को भी देखना चाहिए.

भारत ने वह दौर भी देखा है जब मतदाताओं ने दलबदुओं को न केवल सामाजिक स्तर पर बल्कि रानीतिक स्तर पर भी सबक सिखाया है. वह दौर इतिहास का ऐसा पन्ना बन गया है, जिसकी  चर्चा भी नहीं होती है.

लोकतंत्र की कामयाबी के लिए जरूरी है कि आर्थिक और सामाजिक न्याय के सवाल चुनावों में प्रमुख बने और जनादेश का अपमान करने वालों के लिए राजनीतिक और कानूनी सजा का प्रावधान किया जाए.

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