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राजनीति की नयी इबारत के संकेत हैं चुनावी नतीजे

धारणा भी बनी है कि भाजपा के सरकार कॉरपोरेट घरानों की हित चिंतक हैं और मेहनतकश तबकों के लिए के पास संवेदना का अभाव है.

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Faisal Anurag

बदलते राजनीतिक माहौल में यही लगभग साफ है कि 2019 भारतीय जनता पार्टी के लिए आसान नहीं है. पांच राज्यों के नतीजे बताते हैं कि सेमीफाइनल ने विपक्ष को एकजुट होने का गहरा संदेश दिया है. चुनाव नतीजों का यह भी संदेश है, मतदाता केवल वायदों पर यकीन नहीं करते और न ही उन्हें सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति प्रभावित करती है.

2014 के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी के वोट प्रतिशत लगातार कम हो रहे हैं और यह बताता है कि जिन उम्मीदों के साथ उसने पूर्ण बहुमत हासिल किया था, उसे पूरा करने में वह कामयाब नहीं रही है और ब्रांड मोदी भी उसे बहुमत दिलाने में कारगर नहीं हो पा रहे हैं. यह धारणा भी बनी है कि भाजपा के सरकार कॉरपोरेट घरानों की हित चिंतक हैं और मेहनतकश तबकों के लिए के पास संवेदना का अभाव है. हिंदी इलाकों के नतीजे भाजपा के लिए बड़ी चेतावनी हैं और इससे साफ है कि 2019 में भाजपा को भारी जनाक्रोश का सामना करना होगा. वोट प्रतिशत के आंकड़े बता रहे हैं कि कांग्रेस अन्य विपक्षी दलों की उपेक्षा कर राजनीतिक परचम नहीं फहरा सकती है.

मध्यप्रदेश और राजस्थान में यदि कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी और कुछ अन्य क्षेत्रीय ताकतों का साथ लिया होता तो भाजपा बुरी पराजय का शिकार होती. कांग्रेस ने यह साबित किया है कि उसने जिन सवालों को उठाया है, उसे मतदाताओं के बड़े वर्ग का समर्थन हासिल हुआ है. रोजगार, किसान और रफाल का सवाल इसमें प्रमुख है. इसके साथ यह भी जाहिर हुआ है कि विपक्ष अपने राज्य नेताओं के बीच तालमेल बैठाने और अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में कामयाब रही है.

गुजरात से जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अब परिपक्व स्थिति में है. गुजरात में भाजपा की सीटों  को कम करने में कांग्रेस कामयाब रही थी. अब हिंदी इलाकों के राज्यों में भी उसने भाजपा की रणनीति का मुकाबला किया है और तीन राज्यों से उसे सत्ता से बाहर करने में कामयाब हुयी है. लेकिन इस तत्थ्सय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस की यह निर्णायक जीत नहीं है न ही भाजपा की राजनीति पूरी तरह पस्त हुयी है. कांग्रेस को फिर से खड़ा होने के लिये भी उसे जरूरी है कि वह विभिन्न क्षेत्रीय ताकतों की महत्ता को ज्यादा गंभीरता से ले. इन चुनावों ने राजनीतिक नेताओं की एक नयी पीढ़ी के महत्व को भी रेखांकित किया है. इन चुनावों में किसानों के साथ ही आदिवासी, दलित और पिछडों के सवालों ने बड़ी भूमिका निभायी है.

तेलंगाना में केसीआर की वापसी भी बताती है कि उनकी पार्टी ने इन तबकों का व्यापक समर्थन हासिल किया है. तेलंगाना में अल्पसंख्यकों का भी समर्थन केसीआर को ही मिला है. हिंदी इलाकों में मतदाताओं का रूख बदला है और अबतक भाजपा के समर्थन में रहने वाले तबकों के भीतर भी नाराजगी साफ है. छत्तीसगढ,मध्यप्रदेश और राजस्थान में आदिवासी दलित वोट भाजपा का दामन छोड़ चुके हैं और अन्य तबकों में भी भारी बेचैनी है. राजस्थान और मध्यपदेश में भाजपा ने सम्मानजनक सीटें हासिल की है, लेकिन यह पूरी राजनीतिक कहानी नहीं है. राजनीतिक तौर पर भाजपा अपने परंपरागत आधारों में पड़ी दरार को रोक नहीं पायी है और आनेवाले दिनों में उसे इससे भी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा, यदि विपक्ष 2019 में मुकम्मल गठबंधन करने में कामयाब होगा तो.

भाजपा,आरएसएस और उनकी अनुषंगी इकाइयों ने जिन सांप्रदायिक सवालों को उठाया है, उसे भी मतदाताओं ने नकार दिया है. इन संगठनों ने ध्रुवीकरण करने वाले जिन सवालों को उठाया है, वह मतदाताओं को आकर्षित नहीं कर पाया. स्पष्ट है कि विकास और धार्मिक सवालों को एक साथ उठाने की भाजपा की कोशिश मतदाताओं के लिए विकर्षण का कारक बन गया है. मोदी सरकार के बारे में यह धारणा आम होती जा रही है कि वह बातें तो विकास की करती है, लेकिन उस विकास का सरोकार भारत के गांवों और उसके निवासियों के हित में नहीं है. भारत के लोग एक आधुनिक सोच को आगे ले जाना चाहते हैं और इसी राह में दिग्भ्रम पैदा करने वाली ताकतों को वे खारिज करना चाहते हैं. भारत की राजनीति में यह एक तरह से बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है. 2019 इसका गवाह हो सकता है कि भारत के लोग किस तरह की राजनीति को स्वीकार करेंगे. विकास का मतलब भी जनहित में परिभाषित करने की मांग देश में लंबे समय से होती रही है. आर्थिक विकास में आर्थिक और सामाजिक समानता और हिस्सेदारी का सवाल भी गहरा हुआ है.

2003 से तीन चुनावों में छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल किया था, लेकिन उसकी जीत बहुमत से कुछ ही ज्यादा सीट हासिल करने तक की रही है. इस बार के चुनाव में छत्तीसगढ़  के मतदाताओं ने जिस तरह भाजपा को नकारा है, उससे विकास की भाजपा की परिभाषा पर अनेक तरह के सवाल उठ रहे हैं. कॉरपोरेटपरस्त भाजपा की नीतियों को आदिवासियों ने पूरी तरह से नकार  दिया है. बस्तर इलाके के नतीजे बताते हैं कि आदिवासी राज्य दमन के खिलाफ भी दो टूक निर्णय सुनाया है. गुजरात के विधानसभा चुनावों के दौरान भी आदिवासियों की नाराजगी मुखर थी और राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के आदिवासी भी विकास के नाम पर संसाधनों के संगठित लूट के खिलाफ फैसलाकुन है. इससे एक बात साफ होती है कि मतदाता कॉरपोरेटपरस्त नीतियों के साथ सहज नहीं हैं और वे विकास के नाम पर चंद घरानों को लाभ पहुंचाने की नीति के खिलाफ भी हैं. नोटबंदी से पैदा हुयी आर्थिक गतिरोध ने भी चुनावी तौर पर दस्तक दिया है और यह एक गहरे राजनीतिक जनविमर्श का भी संकेत है. जनता विकल्प के नाम पर अपनी जमीन खोने के लिये तैयार नहीं हैं. किसानों और युवाओं की नारजगी ने भी यह बताया है कि भारत की आर्थिक दिशा को जनहित के नजरिए के अनुकूल बनाना होगा और उनकी हिस्सेदारी भी उसमें तय करनी होगी. भारत का किसान आंदोलन परंपरागत प्रतिरोध से आगे बढ़कर राजनीतिक तौर पर कई नए संदेश दे रहा है और साथ ही भारतीय ग्रामीण व्यवस्था के लिए नया विचा भी गढ़ रहा है. किसान अब दयनीय बनकर जीना नहीं चाहते और वे उन संजालों को भी उतार फेंक रहे हैं, जो उन्हें धार्मिक तौर पर बांटता हैं. उत्तरप्रदेश के कैराना उपचुनावों के समय किसानों ने जो सद्भाव को नया राजनीतिक संदेश रखा था, वह इन चुनावों में परिपक्व को अपनी स्वीकार्यता स्थापित कर रहा है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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