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मोदी सरकार ने संसद में बोला झूठः मई 2017 में ही चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड पर जाहिर की थी चिंता 

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New Delhi: केंद्र की मोदी सरकार पर संसद को गुमराह करने का आरोप लग रहा है. दरअसल, शीतकालीन सत्र के दौरान वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने 18 दिसंबर को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में कहा कि चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कोई चिंता नहीं जताई थी. जबकि पारदर्शिता के मुद्दे पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना कि चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर चिंता जाहिर की थी, और इसे लेकर सरकार को पत्र लिखा था. कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने संसद को गुमराह किया है.

इलेक्टोरल बॉन्ड पर संसद को किया गुमराह !

दरअसल, चुनावी बॉन्ड को लेकर विवाद है कि इसकी वजह से राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे की गोपनीयता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा. इसे लेकर संसद में सवाल किया गया था कि जब इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था लागू की जा रही थी तो क्या चुनाव आयोग ने इसे लेकर चिंता जाहिर की थी.
इसके आलोक में वित्त राज्य मंत्री ने कहा कि चुनाव आयोग ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कोई चिंता नहीं जताई थी. जबकि द वायर की खबर के अनुसार, कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के. बत्रा का दावा है कि उनके पास वो दस्तावेज हैं जिससे ये पता चलता है कि चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस पर अपनी चिंता जाहिर की थी.

ज्ञात हो कि सांसद मोहम्मद नदीमुल हक ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर राज्यसभा में सवाल पूछा था. जिसके जवाब में वित्त मंत्रालय के राज्य मंत्री पी. राधाकृष्णन ने बताया कि नवंबर 2018 तक कुल 1056.73 करोड़ रुपये का इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदा गया है और इसमें से 1,045.53 करोड़ रुपये राजनीतिक पार्टियों के पास गए हैं.

चुनाव आयोग ने मई, 2017 में लिखा था

पत्र

द वायर की खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने बीते 26 मई 2017 को कानून मंत्रालय के सचिव को पत्र लिखकर अपनी चिंता जाहिर की थी. आयोग के चुनाव खर्च विभाग के निदेशक विक्रम बत्रा ने ये पत्र लिखा था. चुनाव आयोग ने ये जानकारी भी एक आरटीआइ के तहत दी थी.

साल 2017 के बजट में मोदी सरकार द्वारा राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग को लेकर प्रस्तावित एक्शन प्लान पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग ने लिखा कि इनकम टैक्स एक्ट, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और कंपनी एक्ट 2013 में संशोधन करने से पारदर्शिता पर काफी प्रभाव पड़ेगा.

आयोग ने लिखा, ‘इससे राजनीतिक वित्त और राजनीतिक दलों की फंडिंग के पारदर्शिता पहलू पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.’ अपने पत्र में चुनाव आयोग ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की थी कि कानूनों में संशोधन करने से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. प्रस्तावित संशोधन से केवल पार्टियों को चंदा देने के लिए शेल कंपनी के पनपने का रास्ता खुल सकता है. और कंपनियों को ये छूट दे दी जाएगी कि उन्हें पार्टियों को दी जाने वाली चंदे के बारे में जानकारी नहीं देनी है तो इससे पारदर्शिता पर काफी बुरा प्रभाव पड़ेगा.

वही कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश बत्रा द्वारा प्राप्त किए गए दस्तावेज ये दर्शाते हैं कि तीन जुलाई, 2017 को कानून एवं न्याय मंत्रालय ने चुनाव आयोग की आपत्तियों को लेकर आर्थिक कार्य विभाग को एक ज्ञापन भेजा था. कानून मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को एक नहीं बल्कि तीन पत्र लिखा था. लेकिन वित्त मंत्रालय ने एक भी पत्र का जवाब नहीं दिया. इतना ही नहीं, वित्त मंत्रालय के वित्तीय क्षेत्र सुधार और विधान मंडल ने चुनाव आयोग के विचारों से सहमति जताई थी कि नया कानून सही नहीं है और इसे वापस लिया जाना चाहिए.

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