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अष्टम महागौरीः भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं

श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:.महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥“

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डॉ. स्वामी दिव्यानंद जी महाराज (डॉ. सुनील बर्मन)

श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं. इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं. नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है. इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. मां महागौरी की आराधना से किसी प्रकार का रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है. उजले वस्त्र धारण किये हुए महादेव को आनंद देनेवाली शुद्धता की मूर्ती देवी महागौरी मंगलदायिनी हैं.

महागौरी की पूजा

महागौरी आदी शक्ति हैं. इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाशमान होता है. इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी है. मां महागौरी की अराधना से भक्तों को सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा देवी का भक्त जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी बनता है. दुर्गा सप्तशती (Durga Saptsati) में शुभ-निशुम्भ से पराजित होकर गंगा के तट पर जिस देवी की प्रार्थना देवतागण कर रहे थे वह महागौरी हैं. देवी गौरी के अंश से ही कौशिकी का जन्म हुआ, जिसने शुम्भ निशुम्भ के प्रकोप से देवताओं को मुक्त कराया. यह देवी गौरी शिव की पत्नी हैं, यही शिवा और शाम्भवी के नाम से भी पूजित होती हैं.

महागौरी की चार भुजाएं हैं. उनकी दायीं भुजा अभय मुद्रा में है और नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभता है. बायीं भुजा में डमरू डम-डम बज रही हैं और नीचे वाली भुजा से देवी गौरी भक्तों की प्रार्थना सुनकर वरदान देती हैं. जो स्त्री इस देवी की पूजा भक्ति भाव से करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वयं करती हैं. कुंवारी लड़की मां की पूजा करती हैं तो उसे योग्य पति प्राप्त होता है. जो पुरुष देवी गौरी की पूजा करते हैं उनका जीवनसुखमय रहता है. देवी उनके पापों को जला देती हैं और शुद्ध अंत:करण देती हैं. मां अपने भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं.

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पूजन विधि

नवरात्र में सभी दिन कुंवारी कन्या को भोजन कराने का विधान है, परंतु अष्टमी के दिन का विशेष महत्व है. इस दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं. देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी देवी की पंचोपचार सहित पूजा करें.

देवी का ध्यान

महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं. देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं सर्वमंगल मांग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते..

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महागौरी कथा

देवी पार्वती के रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी का मन आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं. इस प्रकार वर्षों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आतीं तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुंचते हैं. वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देख कर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत 

ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है. उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौरवर्ण का वरदान देते हैं.

एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी. जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा. महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है. एक सिंह काफी भूखा था. वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं. देवी को देख कर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया. इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देख कर उन्हें उस पर बहुत दया आती है  और मां उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं.

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