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लोकसभा चुनाव में कॉरपोरेट पूंजी का प्रभाव, झारखंड के मुद्दे हो गये गौण

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Pravin kumar

Ranchi : झारखंड की बदहाली, सामाजिक, सांस्कृतिक अस्थिरता, आदिवासियता और बदहाल ग्रामीण आर्थिक विकास जैसे सवालों को लोकसभा चुनाव में गायब कर दिया गया है. मतदाताओं के विमर्श को रोजमर्रे के सवालों से भटकाने की पूरी कोशिश की जा रही है.

स्थानीय नीति और विस्थापन,खनन के सवालों को चुनावों में एक ओर जहां कुछ राजनीतिक पार्टियां लोगों को इन मुद्दों से दूर रखने के प्रयास में लगी हैं तो वहीं इन सवालों को प्रमुखता से उठाने में अन्य दल भी परहेज कर रहे हैं.

कॉरपोरेट पूंजी के प्रभावों ने इन सवालों को चुनावों में निर्णायक सवाल बनने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रखी है. इसी में रोजगार का सवाल भी शामिल है. पिछले लोकसभा चुनाव के बाद झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की बहस परवान चढ़ी थी.

आज आंध्रप्रदेश में यही सवाल निर्णायक बनकर उभर गया है. जबकि झारखंड के राजनीतिक दल इस सवाल को भूल गए हैं. झारखंड के पिछड़ेपन के अनेक कारणों में केंद्र की नीतियां भी रही हैं. विपक्ष से उम्मीद की जा रही थी कि वह इस सवाल को प्रमुखता से अपना चुनावी एजेंडा बनाकर सत्तापक्ष के लिए मुसीबत खड़ा करेगा.

लेकिन अभी तक इसकी कोई आहट कहीं भी सुनायी नहीं दे रही है. इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण के सवाल और कॉरपोरेट लूट (खनिजों अवैध खनन) से उपजे हालात को भी चुनाव विमर्श के दायरे से बाहर कर दिया गया है. झारखंड के विकास के लिए अलग आर्थिेक मॉडल का कोई भी नजरिया किसी दल ने पेश नहीं किया है.

जबकि यह सवाल जनाक्रोश और कई बड़ों जनांदोलनों का केंद्र रहा है. इसके साथ ही मनरेगा, राशन,पेंशन जनस्वस्थ्य, शिक्षा और मातृभाषा में शिक्षा, वनाधिकार कानून के सवालों पर बात नहीं की जा रही है. कांग्रेस ने अपने चुनावी मेनिफेस्टो में जरूर इसका जिक्र किया है, लेकिन चुनाव अभियान में इसे प्रमुखता से उठाया नहीं जा रहा है.

विकास का सवाल झारखंड में एक ओर जहां आदिवासी समाज में आतंक की तरह दस्तक देता है क्योंकि उसमें विस्थापन का दर्द अंतरनिहित हैं, वहीं लूटतंत्र के हिस्सेदार इसे ही प्रमुख कारक  मानते हैं. इन दोनों के तीखे अंतरविरोध को ग्रामीण इलाकों में महसूस किया जा सकता है.

अपने कर्मचारियों को वेतन देने में भी आफत है

झारखंड बजटीय सरपल्स स्टेट के रूप में उभरा था, लेकिन वह बाद में एक फर्जी किस्म का कागजी आंकड़ा ही साबित हो गया. इसके लिए खराब गवर्नेस का सवाल उठाया गया. लेकिन सवाल उठता है कि झारखंड में गवर्नेस का मतलब क्या है. उन संवैधानिक प्रावधानों को नजरअंदाज तो इसके नाम पर नहीं ही किया जा सकता.

संविधान अनेक तरह के संरक्षण भी देता है और वह इस इलाके के गवर्नेस के अलग मानदंड स्थापित करने का संकेत भी करता है. लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह सवाल कभी प्रमुख नहीं रहा. राजनीतिक अस्थिरता के नाम पर इस सवाल को चुनाव में दरकिनार रखने का प्रयास सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है.

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जनसरोकर के विषय को भूल रहे हैं राजनीतिक दल

आम लोगों से जुड़े सवाल को नजरअंदाज यदि हम करना चाहें तो मनरेगा के हालात, शिक्षा अधिकार कानून के हनन और वनाधिकार कानून के हनन के उदाहरणों को देख सकते हैं. स्कूलों के विलय के सवाल से राजनीतिक सरगर्मी पैदा हुई थी, जब भाजपा के अधिकांश सांसदों ने राज्य सरकार की इस नीति को खुली चुनौती दी थी.

चुनौती देने वाले चार सांसदों का टिकट भाजपा काट चुकी है. विपक्ष भी इस सवाल पर संजीदा राजनीतिक अभियान नहीं चला रहा है. जबकि राज्य के कई इलाकों में लोगों के लिए यह एक सुलगता हुआ सवाल है. जबकि वे वोट के लिए जाएंगे, तब उनके दिमाग में अन्य सवालों के साथ यह भी एक सवाल होगा.

मनरेगा की दुर्दशा तो यह है कि एक ओर केंद्र सरकार इसके बजट में कटौती कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दे पा रही है, जिस वजह से बजट आवंटन बाधित है. इसका सीधा असर ग्रामीण मजदूरों पर पड़ रहा है. राज्य में चुनाव लड़ रहे सता पक्ष और विपक्ष दल ने अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति जनसरोकारों के विषय नहीं उठा पा रहे हैं.

विपक्ष महागठबंधन कर भाजपा का भय दिखाकर वोट बटोरने में लगा है, तो भाजपा राष्ट्रवाद के नाम पर वोट लेना चाहती है. लेकिन दूसरी ओर लोकसभा चुनाव में यह सवाल ग्रामीण और जनांदोलनों के क्षेत्र का विषय बना हुआ है.

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