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शिक्षकों के आदर के बिना कैसी शिक्षा ?

केवल भवन बनाकर नहीं दी जा सकती शिक्षा, उससे तो केवल ठेकेदारी की मंशा ही दिखेगी

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RP Shahi

झारखंड के 17 सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज 18 सालों से 10 प्रतिशत शिक्षक/शिक्षण स्टाफ के भरोसे चल रहे हैं. इन संस्थानों में स्थायी प्रिंसिपल भी नियुक्त नहीं हैं. योग्य अध्यापकों की कमी नहीं है, और यहां पर भी कई प्राध्यापक पीएचडी कर के बैठे हैं. लेकिन नियमानुसार उन्हें प्रिंसिपल क्यों नहीं बनाया जा रहा है, यह तो विभाग, विभागीय मंत्री और मुख्यमंत्री ही बता पायेंगे.

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AICTE के नियमानुसार, इन संस्थानों को नए छात्रों के प्रवेश की अनुमति नही है. लेकिन सरकार नियमों की अवहेलना कर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है. एक नागरिक के पत्र के उत्तर मं AICTE ने जो उत्तर दिया और उस सजग नागरिक ने उसे सरकार को भेजा, उसे पढ़कर भी सरकार सजग नहीं हो रही है. तो यह केवल अज्ञानता का विषय नहीं है, यह युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ और गैरकानूनी काम करने का खुला निमंत्रण भी है.

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विभाग, मंत्री और मुख्यमंत्री नए पॉलिटेक्निक खोलने में बहुत दिलचस्पी ले रहे हैं और बढ़-चढ़ कर इसे प्रचारित कर रहे हैं. लेकिन अगर छात्रों को पढ़ाया नहीं जा सकता तो विद्यालय भवन बनवाने से किसे लाभ है ? ठेकेदार, विभागों के सचिव व इंजीनियर या बिल पास करने वाले क्लर्क ? जिस व्यवस्था में इतना बड़ा विभाग पॉलिटेक्निक में पढ़ा रहे पीएचडी प्रोफेसर को नियमानुसार प्रिंसिपल नहीं बना पा रहे हैं. वहां किसी गोलमाल या व्यक्तिगत लोभ की आशंका होना स्वाभाविक है. यह प्रक्रिया तो एक सप्ताह में हो सकती है, इसे क्यों नहीं किया जा रहा है और बिना नियम के नए पॉलिटेक्निक क्यों बनाये जा रहे हैं ?

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इधर इस फेसबुक पोस्ट पर लोगों की कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. कुछ लोग तो पीआईएल दायर करना चाहते हैं, ताकि धोखाधड़ी उजागर हो सके.

लूट के इस खेल को लेकर लोगों खुलकर अपने विचार रखें.

 

वही कुछ लोगों ने कमेंट के तौर पर कटाक्ष करते हुए कंबल ओढ़कर धी पीने वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसा बताया है.

ये लेखक के निजी विचार हैं और उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

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