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मां की किडनी के कर्ज का फर्ज : इस तरह दुनिया में मिसाल बन गया ये डॉक्‍टर

Avinash

Jamshedpur : मां के दूध के कर्ज का फर्ज तो आपने देखा होगा, लेकिन डॉ.टीपी लहाणे ने मां की किडनी के कर्ज का फर्ज ऐसा अदा किया कि पूरी दुनिया में मिसाल बन गये. 65 साल के डॉ.लहाणे पिछले 27 साल से मां की डोनेट की हुई किडनी पर जिंदा है. एक मेडिकल सेमिनार में हिस्सा लेने जमशेदपुर पहुंचे पदम श्री अवार्डी और देश के मशहूर नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.टीपी लहाणे ने बताया कि सबकी मां एक बार जन्म देती हैं, लेकिन मेरी मां ने मुझे दो बार जन्म दिया. एक बार कोख से और दूसरी बार अपनी किडनी डोनेट कर.

पहली बार के जन्म ने मुझे अपने लिए जीना सीखाया, मगर दूसरे जन्म ने मुझे औरों के लिए अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा दी. बकौल डॉ.लहाणे, 35-36 साल का रहा होगा. मेरी दोनों किडनी खराब हो गई थी. डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि जीना मुश्किल है. लेकिन मेरी मां अंजना बाई ने मुझे अपनी एक किडनी डोनेट कर दूसरा जन्म दिया. यह मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट था. इस दूसरे जन्म ने मेरी जिंदगी के मकसद को बदल दिया. ईश्वर का भी आशीर्वाद है कि पिछले 27 साल से मां की किडनी पर जिंदा हूं. यही नहीं मेरी मां भी अभी जिंदा है और उनका आशीर्वाद मेरे साथ है. वह 86 साल की है और पिता हाल ही में 94 साल की उम्र में गुजरे.

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एक लाख 62 हजार गरीबों के आंख का किया ऑपरेशन 

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डॉ.लहाणे ने बताया कि नया जीवन मिलने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र के गांव में रहने वाले गरीब आदिवासी मजदूर और किसानों के लिए निशुल्क मोतियाबिंद शिविर लगाना शुरू किया. हम केवल कहने को शिविर नहीं लगाते हैं. हॉस्पिटल की जो ऑपरेशन की क्वालिटी होती है, वहीं क्वालिटी हम इन शिविरों में देते हैं. यही कारण है कि हम मोतियाबिंद के ऑपरेशन में सौ फीसदी सफल रहे हैं. बकौल डॉ.लहाणे, अभी तक मैं महाराष्ट्र के गांवों में एक लाख 62 हजार लोगों का मोतियाबिंद ऑपरेशन कर चुका हूं. मैंने इतने लोगों को रौशनी मां की किडनी के आशीर्वाद के चलते दे पाया.

यही नहीं, मोतियाबिंद के अलावा लगभग 25 हजार दूसरे ऑपरेशंस किया हूं. मेरे इस काम को देखते हुए भारत सरकार ने 2008 में मुझे पद्म श्री अवार्ड दिया था. उस वक्त तक मैंने एक लाख मोतियाबिंद ऑपरेशन किया था. यह पूरी दुनिया में एक रिकॉर्ड है. महाराष्ट्र का कोई तालुका (ब्लॉक) नहीं है, जहां पर मैंने शिविर नहीं लगाया है. सबसे ज्यादा शिविर आदिवासी क्षेत्र-गड़चिड़ौली और पालघर जैसे जिलों में लगाया है, जहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव रहा है. एक कैंप में 400 से लेकर 2000 लोगों तक के ऑपरेशंस किए गए हैं. यह सारे ऑपरेशंस बिना टांके वाले हैं. हम अत्याधुनिक मशीनों के जरिए ऑपरेशंस करते हैं और कई बार एक एक माह तक कैंप में रहकर लोगों को जीवन ज्योति प्रदान की है.

बाबा आम्टे के कुष्ठ आश्रम के मरीजों का किया ऑपरेशन 

डॉ.लहाणे ने बताया कि समाज सेवक बाबा आम्टे ने 1999 में अपने कुष्ठ आश्रम आनंद वन के मरीजों के ऑपरेशन के लिए संपर्क किया. कुष्ठ रोगियों का मोतियाबिंद ऑपरेशन काफी जटिल होता है. उसका सफलता प्रतिशत सौ फीसदी नहीं होता था. लगभग 20 फीसदी मरीजों के आंखों की रौशनी नहीं लौट पाती थी. लेकिन हमने बाबा आम्टे के इस प्रस्ताव को चुनौती के रूप में लिया और हमने पहले दिन ही लक्ष्य बनाया कि एक भी मरीज का ऑपरेशन असफल नहीं होना चाहिए. हमने 231 कुष्ठ मरीजों का ऑपरेशन किया. एक माह आनंद वन में रहे और हर रोज मरीजों की देखभाल की और जो जरूरत पड़ी, वह किया. आपको बता दें इसमें से एक भी ऑपरेशन असफल नहीं रहा. ऐसे मरीजों के ऑपरेशंस की जटिलता को हमने खत्म किया. इसमें डॉ.रागिनी पारेख का काफी योगदान रहा, जो मेरे साथ ही मुंबई के जेजे हॉस्पिटल में काम करती है.

पिता किसान थे, मजदूरी कर पढ़ाई की 

12 फरवरी 1957 में महाराष्ट्र के लातूर जिले में जन्मे डॉ.लहाणे के पिता किसान थे. डॉ.लहाणे ने दसवीं तक की पढ़ाई खेत में मजदूरी करके की. छह भाई बहन थे. फिर कमाओ और सीखो योजना के तहत मिले पैसे से बारहवीं तक की पढ़ाई की. बाद में एमबीबीएस के लिए चयन हो गया. ख्वाहिश थी कि हड्‌डी या बच्चों के डॉक्टर बनेंगे, लेकिन एमबीबीएस थर्ड ईयर में पढ़ाई में आई मुश्किल की वजह से आंख का डॉक्टर बनना पड़ा. 1993-94 के दौरान डॉ लहाणे ने धुले के सरकारी अस्पताल में काम किया. एक नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में उन्होंने इस क्षेत्र के बारे में व्यापक रूप से व्याख्यान दिया और राज्य के दूरस्थ गांव और आदिवासी बस्तियों में अस्थायी नेत्र उपचार शिविरों में काम किया. लहाणे ने जेजे अस्पताल मुंबई के डीन के रूप में पदभार ग्रहण करने से पहले अस्पताल में नेत्र विज्ञान विभाग के प्रमुख थे. उन्हें जेजे अस्पताल के नेत्र विज्ञान विभाग के आधुनिकीकरण का श्रेय दिया जाता है.

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