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दुमका : 42 गांवों को नगरपालिका में शामिल किये जाने के विरोध में सड़क पर उतरे ग्राम प्रधान

कहा- नगरपालिका में गांवों को शामिल किये जाने से आदिवासी-मूलवासियों का अस्तित्व पड़ जायेगा खतरे में

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Dumka : 42 गांवों को दुमका शहर/नगरपालिका में मिलाने के विरोध में रानीडिंडा, खैरबानी, बागडूबीह, गिधनीपहाड़ी, जोगीडीह, अंगराईडीह, करहड़बिल, श्रीआमड़ा, सोनाडंगाल के गांवों के मंझी बाबा (ग्राम प्रधान), जोग मंझी, नायकी, गुडित, प्राणिकों, भोक्ताओं के संयुक्त आह्वान व नेतृत्व में ग्रामीणों ने धरना-प्रदर्शन किया. धरना में गांव के मंझी बाबा (ग्राम प्रधान), जोग मंझी, नायकी, गुडित, प्राणिकों, भोक्ताओं और ग्रामीणों ने अपने-अपने विचार रखे. नगरपालिका का विस्तर किये जाने का विरोध किया. वहीं, मास्टर प्लान तैयार करनेवाली कंपनी मार्स प्लानिंग एवं इंजीनियरिंग सर्विस कंपनी के विरुद्ध नारेबाजी की. सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि पूर्व में भी ग्रामीण रैली, धरना व प्रदर्शन द्वारा ग्राम सभा की ओर से सरकार को मेंमोरेंडम दिया जा चुका है.

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राज्य सरकार भारतीय संविधान का उल्लंघन कर बना रही नगरपालिका

धरना को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि दुमका जिला अनुसूचित क्षेत्र में आता है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 (ख) के अनुसार पांचवीं अनुसूची (अनुसूचित क्षेत्र) में सूचीबद्ध संतालपरगना काश्तकारी अधिनियम शहर के विस्तारीकरण के नाम पर कानून का उल्लंघन करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है. जनजाति (आदिवासी) समाज की अपनी स्वशासन व्यवस्था है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान है. शहरीकरण के तहत अनुसूचित गांवों को मिलाने से यहां के ग्रामीणों को मिले कानूनी संरक्षण एवं सुरक्षा खत्म हो जायेगी, जिसके फलस्वरूप आदिवासी के साथ-साथ मूलवासियों, किसानों, गरीबों की जमीन का अतिक्रमण होगा. इससे आदिवासी और मूलवासियों का अस्तित्व खतरे में आ जायेगा.

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मांझी परगना व्यवस्था खत्म करने की है सजिश

ग्रामीणों और वक्ताओं ने कहा कि भारत गांवों का देश है. पंचायती राज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना है. अगर गांवों को नगरपालिका में मिलाया जाता है, तो यह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों और ग्रामीणों के विश्वास को तोड़ने के समान होगा. इससे विकास बाधित होगा. वक्ताओं ने कहा कि किसी भी हालत में 42 गांवों को दुमका नगरपालिका में नहीं मिलने दिया जायेगा. अगर गांवों को नगरपालिका से जोड़ा गया, तो पंचायती राज खत्म हो जायेगा, प्रधानी व्यवस्था खत्म हो जायेगी, आदिवासियों की स्वशासन व्यवस्था ”मांझी परगना व्यवस्था” खत्म हो जायेगी, प्रधान, जोग मंझी, नायकी, गुडित, प्राणिकों, भोक्ता, मुखिया सभी खत्म हो जायेंगे. गांव की 85-95% आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर करती है, जिनकी आमदनी सिंचाई के अभाव में अच्छी नहीं है, जो रोज काम करते हैं, तब जाकर घर में दो वक्त का खाना बन पाता है. इससे गरीब किसानों में नये-नये कर/टैक्स का बोझ और बढ़ेगा और किसान कर्ज के बोझ से बेघर होने और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जायेंगे. भवनों/घरों में होल्डिंग टैक्स लगने लगेंगे. बिजली दर बढ़ जायेगी. इसके साथ ही ग्रामीणों को कई अन्य टैक्स देने पड़ेंगे. गांवों को शहर से जोड़ने का सीधा मतलब अन्नदाता किसानों और गरीबों की हत्या करना है.

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नगरपालिका के सवाल पर आखिर चुप क्यों हैं राजनीतिक दल

वक्ताओं ने यह भी दु:ख व्यक्त किया कि जहां एक ओर सरकार ग्राम उदय से भारत उदय और सबका साथ सबका विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बिना ग्राम सभा की अनुमति के सरकार विकास के नाम पर गांवों को शहर में जबरन जोड़ रही है. ऐसे में राजनीतिक पार्टियां चुप क्यों हैं.

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राज्यपाल व मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन डीसी कार्यालय को सौंपा

धरना-प्रदर्शन के बाद 42 गांवों को दुमका शहर में नहीं मिलाने को लेकर ग्रामीणों ने उपायुक्त कार्यालय के माध्यम राज्यपाल और मुख्यमंत्री को मेमोरेंडम दिया. इस धरना-प्रदर्शन में कालीचरण हांसदा, अनिल कुमार टुडू, सुसाना हांसदा, हबील मुर्मू, मंजुलता सोरेन (सरवा मुखिया), जयचिंता सोरेन (गोलपुर मुखिया), मिस्त्री सोरेन, बुदिलाल किस्कू, सुकलाल मुर्मू, मंगल हेम्ब्रोम, साहेब मुर्मू, शिवलाल हांसदा, मुनि हांसदा, अनिल हांसदा आदि के साथ-साथ रानीडिंडा, खैरबानी, बागडूबीह, गिधनीपहाड़ी, जोगीडीह, अंगराईडीह, करहड़बिल, श्रीआमडा, सोनाडंगाल गांवों के महिला-पुरुष काफी संख्या में उपस्थित थे.

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