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रिनपास में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी, बढ़ रही मरीजों की परेशानी

600 एडमिट और 300 ओपीडी मरीज देखने के लिए सिर्फ 08 डॉक्टर.

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Chandan Choudhary

Ranchi : देश भर में मानसिक रोगियों के इलाज के लिए अपनी पहचान बना चुका रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइकेट्री एंड एलायड साइंस (रिनपास) वर्तमान में अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगा हुआ है. रिनपास में डॉक्टर व स्टाफ की घोर कमी है. हॉस्पिटल के 600 मरीजों को सिर्फ आठ मनोचिकित्सक व चार पीजी डॉक्टर ही संभाल रहे है. इसके अलावा प्रतिदिन लगभग 300 से 400 मरीज ओपीडी में अपना इलाज कराने आते है. डॉक्टरों की कमी इस कदर बढ़ चुकी है कि कई बार मरीजों को बगैर इलाज कराये ही वापस लौटना पड़ा रहा है. हॉस्टिपटल में पुरुष और स्त्री दोनों मिलाकर 585 मरीज भर्ती है. इन्हें प्रतिदिन ट्रीटमेंट की आवश्यकता रहती है. कम संसाधन में ही रिनपास के डॉक्टर मरीजों की सेवा कर रहे है. यहां के निदेशक डॉ सुभाष सोरेन का कहना है कि डॉक्टरों की कमी के बाद भी रिनपास मरीजों को स्वास्थ्य सेवा दे रहा है. डॉक्टरों,नर्सो और कर्मियों का संस्थान में घोर अभाव है. मैन पॉवर के लिए सरकार को कई बार पत्र भी लिखा जा चुका है, लेकिन इस दिशा में अबतक कोई सकरात्मक पहल नहीं हो सकी है. सरकार की सहमति मिलते ही बहाली प्रक्रिया आरंभ कर दी जायेगी.

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200 सुरक्षाकर्मी के जिम्मे पूरा अस्पताल प्रबधंन

रिनपास में अब स्थिति यह हो गई है कि यहां सुरक्षा के लिए तैनात किए गए. सुरक्षाकर्मियों से मरीजों की देखभाल कराई जा रही है. मरीज की सुरक्षा के साथ-साथ ये सुरक्षाकर्मी मरीजों के लिए खाना बनाने, खाना खिलाने से लेकर अन्य कई काम ये सुरक्षाकर्मी ही कराते है. यह कहना गलत न होगा की रिनपास में सुरक्षाकर्मी ही मरीजों को संभाल रहे है. रिनपास के पुरुष व स्त्री दोनों विभाग मिलाकर लगभग 200 सुरक्षाकर्मी तैनात है. इन्हीं सुरक्षा कर्मियों से ही वाहन चालन व एंबुलेंस चालन का भी सेवा लिया जा रहा है. एसआईएस एजेंसी के माध्यम से बहाल हुए इन सुरक्षाकर्मियों का मानदेय भी काफी कम है. सुरक्षाकर्मी ने बताया कि 6800 रुपए महीना मिलता है. उसमें भी आठ सौ रुपए कट कर मात्र 6000 रुपए ही हाथ में आता है. ऐसे में घर चलाने में काफी मुश्किलें आती है. जबकि पुरे अस्पताल में हम सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी ली जाती है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार मानदेय कम से कम 15000 रुपए होना चाहिए. वह भी हम लोगों को नहीं मिलता.

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सुरक्षाकर्मी विमल ने बताया कि प्रत्येक वार्ड में सोशल वर्कर होना चाहिए. लेकिन इनकी कमी की वजह से सुरक्षाकर्मी से ही सोशल वर्कर का काम लिया जाता है. किचन, जेनरेटर चालक, एंबुलेंस चालक, कुक, खाना खिलाने आदि सभी कार्य सुरक्षाकर्मियों से ही लिए जाते है. इसके बाद भी उचित मानदेय नहीं मिलता है, इससे निराशा होती है.

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50 डाक्टरों की जगह हैं सिर्फ 08

सुपरिटेंडेंट डॉ एके नाग ने बताया कि रिनपास में कुल 08 मनोचिकित्सक एवं 04 पीजी डॉक्टर है. इसके माध्यम से ही वार्ड में भर्ती छह सौ मरीजों एवं ओपीडी में स्वास्थ्य लाभ लेने आये 350 मरीजों का उपचार प्रतिदिन किया जाता है. जबकि हॉस्पिटल में प्रति दस मरीज पर एक डॉक्टर होना चाहिए. डॉक्टरों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या है कि वे सही रूप से मरीजों का प्रोपर काउंसलिंग नहीं कर पा रहे हैं. पिछले दो सालों में कई डॉक्टर और कर्मचारी सेवानिवृत हुये लेकिन उनके स्थान पर कोई कर्मी नहीं आने से रिनपास में मैन पॉवर की काफी कमी आ गयी है. मैन पॉवर की कमी असर सीधे रूप से रिनपास में इलाज कराने आये मनोरोगियों पर पड़ रहा उन्हें सही रूप से स्वास्थ्य लाभ नहीं मिल पा रहा है.

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1795 में बना था संस्थान, रांची में 1925 में हुई थी स्थापना

अप्रैल 1925 में इसकी स्थापना रांची के कांके में हुई थी. अस्पताल के सौ वर्ष होने को है. समय के साथ-साथ इस अस्पताल ने काफी प्रसिद्धि हासिल की. झारखंड, बिहार उत्तर प्रदेश समेत देश भर से मानसिक रोगी इस अस्पताल में अपना इलाज कराने आते है. वैसे तो इस मनोरोगियों के लिए इस अस्पताल का निर्माण मुंगेर (संयुक्त बिहार) में गंगा नदी के तट पर 1795 में ही कर दिया गया था. उस वक्त इसे ल्यूनेटिक एसाइलम के नाम से जाना जाता था. 1821 में इसे पटना कॉलेजिएट स्कूल में स्थापित किया गया. इसके बाद अप्रैल 1925 में इसकी स्थापना कांके में हुई. जहां इसका नाम इंडियन मेंटल हॉस्पिटल कर दिया गया. आजादी के बाद राज्य सरकार ने इसका नाम 30 अगस्त 1958 को रांची मानसिक आरोग्यशाला (आरएमए) कर दिया. 1997 से इसका संचालन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की देखरेख में होने लगा. जिसके बाद एक बार फिर से नाम में परिवर्तन कर आरएमए से बदल कर रिपनास कर दिया गया. जो अब भी रिनपास के ही नाम से जाना जाता है.

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