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इस वजह से विलकिंसन टैंक को कहा जाने लगा था ‘भुतहा तालाब’

 

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अपनी पत्नी के साथ तालाब की स्थिति की जानकारी देते अशोक पागल

यह बहुत कम लोगों को पता है कि कभी इस तालाब का नाम विलकिंसन टैंक था. इस नाम के उच्चारण में लोगों को असुविधा होती थी. बोलने में लोगों को काफी असुविधा होती थी, जिस कारण इसका नाम चर्चित हुआ “भुतहा तालाब”. 60 के दशक तक यह तालाब आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा था. हालांकि आज यह केवल एक पता के रूप में शेष रह गया है.

News Wing आपको बता रहा है कि आखिर क्यों यह तालाब आज अस्तित्व में नहीं है? आर्थिक गतिविधि वाले इस तालाब को लोग क्यों भुतहा नाम बोलने लगे? तालाब के किस किनारे को लोग भुतहा मानकर जाने से परहेज करते थे? इतने बड़े तालाब को आखिर किस तरह भर कर खेल का मैदान बना दिया गया?

टैंक के उत्तरी किनारे पर पांच-छह कुएं थे, हादसे होते रहते थे

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अपने युवा अवस्था से ही तालाब को देख चुके स्थानीय निवासी अशोक पागल (रंगमंच नाट्य कलाकार) ने हमारे रिपोर्टर को उपरोक्त सवालों के जवाब दिये उन्होंने बताया कि छोटानागपुर रिजन के ब्रिटिश कमिश्नर रहे विलकिंसन के समय बने इस तालाब को विलकिंसन टैंक कहा जाता था. लेकिन उस समय इस नाम को बोलने में लोगों को काफी परेशानी होती थी.

टैंक के उत्तरी किनारे (आज जहां डीसी ऑफिस है) पर 5 से 6 कुंए बने थे, ताकि टैंक में हमेशा पानी की आपूर्ति होती रहे. स्थानीय लोगों को तो इस कुएं की जानकारी थी. लेकिन बाहर से आने वाले लोगों को नहीं. इससे कई लोगों की इस कुंए में गिर कर मौत हो गयी थी.
फिर तो यह तालाब ऐसा बदनाम हुआ कि लोग कहने लगे कि इस तालाब में भूत है जो लोगों को डूबो कर मारता है. हालांकि इस बातों में कितना दम था, इसकी पुष्टि तो अब नहीं की जा सकती. लेकिन यह तय है कि इस डर ने ही इस तालाब के अस्तित्व को खत्म करने में प्रमुख भूमिका निभायी.

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आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र था भुतहा तालाब

अशोक पागल कहते हैं कि भुतहा तालाब स्थानीय लोगों के साथ आधी राजधानी के लिए आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र था. शहर के लोग इस तालाब में मछली पालन का काम करते थे.

रांची नगर निगम ने बकायदा इसके लिए ठेका जारी करता था. तालाब की मछलियां काफी स्वादिष्ट होती थी. इसका कारण यह था कि तिलकुल बेचने वाले लोग यहां आकर तिल धोते थे. ऐसे में तिल का छिल्का तालाब में चला जाता था, जिसे खाने से मछलियां काफी स्वादिष्ट होती थी.

इसी तरह तालाब के आसपास रहने वाले 40 से 50 घरों के साथ शहर के अन्य इलाकों में रह रहे धोबी लोग भी तालाब में आकर कपड़ा धोते थे. ऐसे में यह तालाब काफी शोरगुल से भरा रहता था.

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भूत ने ऐसा क्या किया कि तालाब का अस्तित्व ही मिट गया

तालाब का उत्तरी किनारा, जो सबसे भयंकर था.

अशोक पागल कहते हैं कि उत्तर दिशा में बने इन कुंओं की जिन्हें जानकारी नहीं होती थी, उनके साथ हादसा होना तय था. उनकी जानकारी के मुताबिक करीब 10 से 12 लोगों की मौत कुंए में डुबने से हुई थी. लगातार लाशें मिलने का हश्र यह हुआ कि लोग इसे भुतहा तालाब कहने लगे.

इससे यह इलाका काफी सुनसान रहने लगा. इससे यहां लूट-मार की घटनाएं भी आम हो गयीं. सो, यहां बिहार क्लब व अन्य क्लबों सहित स्थानीय लोगों ने तत्कालीन कमिश्नर एमवीजी रव से गुजारिश की कि इसका कोई उपाय वे करें.

उन्होंने भी इसपर सहमति जताते हुए तालाब को भरने का मन बनाया. स्थानीय लोग, स्कूल बच्चे (उस समय अशोक पागल भी छात्र थे) सहित स्वयं एमवीजी राव ने श्रमदान कर इसे भरने का काम शुरू किया. देखते ही देखते यह तालाब बदलकर समतल खेल का मैदान हो गया और आज यह भुतहा तालाब नाम केवल एक पते के रूप में ही रह गया.

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बाद में जो स्टेडियम बना, उसका नाम पड़ा जयपाल सिंह स्टेडियम

1978 के दौरान इस मैदान में एक स्टेडियम भी बना, जिसका बाद में झारखंड के हॉकी खिलाड़ी रहे जयपाल सिंह मुंडा के नाम पर “जयपाल सिंह स्टेडियम” नाम रखा गया. हालांकि यह स्टेडियम भी आज काफी जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है.

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