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डॉ शीन अख्तरः बंद दरवाजों पर दस्तक देते हुए हाथ

Dr Vinod Kumar

(कुछ दिनों पहले प्रोफेसर डॉ शीन अख्तर का निधन हुआ था, उनको याद कर रहे हैं उनके अनन्य मित्र और फिल्मकार डॉ विनोद कुमार)

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डॉ शीन अख्तर सिर्फ एक प्रख्यात प्रोफेसर और लोकप्रिय कुलपति व चुस्त प्रशासक ही नहीं बल्कि एक कुशल वक्ता, रोमानियत और संजीदगी से लबरेज कथाकर, संवेदनशील शायर और उत्तर आधुनिक चिंतक रहे. इनकी रचनाएं बड़ी खामोशी से राजदार हो जाती हैं.

इनकी लेखकीय ऊर्जा जबर्दस्त है. जो बेरहम जिन्दगी के अर्थ को तीव्रता के साथ तलाशना चाहती है. इनकी कथाओं में, शायरी में, फिक्र में संवेदनशीलता के साथ-साथ एक ऐसी गहरी सोच है जो हमें अंधेरी गुफाओं में ले जाती है. लेकिन उन गुफाओं में एक मद्धम सी रोशनी भी तैरती होती है. जो हमें मौका देती है कि हम भयाक्रांत होकर भी आगे का रास्ता ढूंढ सकें.

शीन अख्तर की सोच बंद गली की सोच नहीं है. रास्ते तलाशती इनकी रचनाएं दस्तावेज हैं. जो निरंजर बंद दरवाजों पर दस्तक देती हैं. इन दस्तक देते हुए हाथों को यकीन है कि हमारी संदनशीलता अभी भी जिन्दा है. सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों से सम्पृक्त इनकी रचनाओं में मानवीय मूल्यों की अद्भुत अनुगूंज है.

इनकी लेखकीय संवेदना आम आदमी की घुटन और सरमायदारों की खुदगर्जी की तस्वीरें बड़ी शिद्दत से प्रस्तुत करती हैं.

बड़े ही पुरअसर ढंग से अपनी रचनाओं में शीन अख्तर गिरते हुये समाजी स्तर और बदलते हुए इंसानी मयार के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं और दावते इंकलाब देते रहें हैं.

डॉ शीन अख्तर ने अपने उपन्यास खूं बहा में समाज में फैले भ्रष्टाचार, नक्सलवाद और आदमी के रिश्तों की ऐसी दास्तान पेश की है जो आज की सोच का जलता हुआ सच है. एक ऐसा सच जिससे हमें बार-बार होकर गुजरना पड़ता है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर लंबी काली खौफनाक रात को जीने के लिये हम कब तक विवश हैं. लेखक ने एक जोरदार दस्तक दी है और हमें सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर सामाजिक बराबरी के

लिए हमें कब तक खूं बहाना पड़ेगा?

विनाश यात्रा कविता संग्रह गोधरा और गुजरात पर घटी घटनाओं का ऐसा आकलन है जहां कोई वक्तव्य नहीं. न कोई नारा…बस कवि के अंदर की छटपटाहट है. इंसान दोस्ती के लिए, मानवीय रिश्तों के लिए. कवि का खुद कहना है ‘‘मैं इन कविताओं के माध्यम से देशवासियों को मानव प्रेम का एक संदेश दे रहा हूं.’’

उसकी नीली आंखो में
कयामत का समुंदर छाया है
उसके बिखरे बालों में
खुशबू है, न रात का जादू है…

आहट जो गुमनाम हुई में कवि अपनी तड़प और बेचैनी को उजागर करते हुए हमें रहस्यमय तिलिस्म में ले जाता है. जहां सिर्फ हम हैं और हमारे अंदर के एहसासात. कवि के सवाल इतने कद्दावर हैं कि वह इनके अर्थ कभी अतीत में ढूंढ़ता है तो कभी भविष्य में. वर्तमान के दंश उसे लगातार असमर्थ युद्ध में लहुलुहान कर देते हैं. शीन अख्तर सिर्फ कथाओं, कविताओं और नाटक तक ही महदूद नहीं है बल्कि उनकी पकड़ आलोचना और चिंतन की धाराओं पर भी है.

चाहे उर्दू साहित्य का नजरिया हो, सोफोक्लीज का चिंतन हो या फिर उत्तर आधुनिकता. शीन अख्तर ने साहित्य के हर आयाम पर अपनी नजर रखी है. ‘लेस्बियनिज्म’ पर इनकी किताब ने उर्दू साहित्य में एक तहलका सा मचा दिया था. हर बार इन्होंने अपनी दिशा खुद चुनी है. राह खुद बनायी है. बागी की विरासत और शहरनामा इनकी ईमानदार कोशिश है, जहां इन्होंने शेख भिखारी से लेकर आज के झारखण्ड पर अपनी सोच से हमें हैरान कर दिया है.

जब माजी में झांकता हूं तो जैसे अभी घटित हुआ हो. शीन अख्तर से पहली मुलाकात सर्दी वाली शाम थी. इमरजेन्सी उठा लिया गया था और चुनाव के ऐलान कर दिए गये थे. जाहिर है इनसे मुलाकातों से साहित्य संस्कृति के साथ-साथ उस दौर की राजनीति पर हमारी घंटों बातें होती. बहसें होती.

मैंने शुरू में ही नोटिस किया था कि बगैर किसी गिरह के साफगोई से अपनी बातें कहने में इन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी. साफ और स्पष्ट. हिपोक्रिसी की तमाम नकाब नोचता हुआ दर्द मंद संगलाख चट्टानों से टकराता एक अजीम शख्सियत जीते हुए. इनके मन के तहखानों से उठती हुई ध्वनियों को मैं सुन लिया करता था.

इनकी तहरीर जुल्म के खिलाफ पुरअसर अंदाज में होती थीं. और कुछ ऐसा ही असर था इनका कि मैं इनके बेहद करीब आ गया. चुपके से शीन भाई मेरे दोस्त, मेरे हमनवा, मेरे बड़े भाई बन गये. व्यक्तिगत बातों से लेकर सामाजिक, साहित्यक स्तर पर हमारा जुड़ाव बढ़ता गया.

सलीब के प्रकाशन के बाद मैं रंगमंच पर सक्रिय हो गया था. एक शाम मेरे रिहर्सल रूम में अचानक शीन भाई वहाब अशरफी के साथ आये और मुझसे कहा कि जेएनयू से मोहम्मद हसन साहब आनेवाले हैं. क्या उस वक्त मैं अपना नाटक पेश कर सकता हूं. इत्तेफाक की बात थी कि उन दिनों मेरा नाटक मिसेज डिसूजा को नींद क्यों नही आती लगभग मंचन के लिए तैयार हो चुका था.

वह दिन मैं भूल नहीं सकता जब मोहम्मद हसन साहब को हमने अपने नाटक के मंचन को देखने के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया. उन्होंने जमकर नाटक की तारीफ की और कहा कि दिल्ली में भी ऐसे नाटक कम देखने को मिलते हैं.

नाट्य प्रदर्शन के साथ मेरा फिल्मी आगाज हो चुका था. मैं पूना के फिल्म इंस्टीट्यूट से लौटकर अपनी फिल्म आक्रांत के स्क्रिप्ट पर काम कर रहा था कि शीन भाई ने मुझे आइन राशिद खान साहब से मिलवाया. आइन रशिद खान साहब कलकते के पुलिस कमिशनर थे और सत्यजीत राय के बेहद करीबी भी.

इन्होंने कलकते के मुसलमानों पर एक डाक्यूमेंटरी फिल्म बनायी थी- दि सेवन्थ मैन. उनकी फिल्म पर और आधुनिक सिनेमा पर हम घंटो चर्चा करते रहे. फिर अचानक फिल्मी सफर में मैं इतना मशगूल हो गया कि शीन साहब से मेरी मुलाकातें मुख्तसर सी ही रहीं.

1992 में मैं अशोकनगर चला आया. शीन साहब जामिया नगर में काफी पहले ही बस चुके थे. हमारी मुलाकातों का दौर फिर चल पड़ा. कोई फर्क नहीं. वही जोश वही अंदाजे बयां. साम्प्रतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीति सरोकारों पर हमारी बहसें और चिंतन के दौर चल पड़े.

फिर 1998 में एक घटना घटी. शीन अख्तर साहब रांची विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति के पद पर नियुक्त कर दिए गए. मैं नहीं जानता था कि एक संवेदनशील लेखक और प्रोफेसर प्रशासक के रूप में कितना सफल होगा. लेकिन मैं इनकी प्रशासकीय क्षमता को देखकर दंग रह गया.

शीन अख्तर साहब ने विश्वविद्यालय की जड़ता को बखूबी तोड़ा और दो दशकों बाद युवा महोत्सव का सफल आयोजन करवाया. सभी प्राध्यापक, छात्र एवं शिकेक्षतर कर्मचारी जैसे जाग पड़े. जमे हुए पानी में हलचल. और मांदर की थाप पर नाचते हुए पांव. एथलीट मीट और न जाने कितने कार्यक्रम इन्हेांने आयोजित करवाये.

सीनेट हाल से लेकर सेन्ट्रल लाइब्रेरी के हाल तक इन्होंने अपनी परिक्लपना से निर्मित करवाये. विश्वविद्यालय में कम्प्यूटरराइजेशन से लेकर नियमित कक्षाओं और नवांगीभूत कॉलेज के शिक्षकों के नियमितिकरण तक का साहसपूर्ण कार्य अपने संक्षिप्त कार्यकाल में इन्होंने बड़े ही लगन से किया.

जैसा मेरा आकलन है शीन अख्तर की सफलता का राज था इनकी ईमानदारी और कर्मठता. आज के समाज में इन दोनों ही चीजें जैसे अजायबघर में रख दी गयी हैं. ईमानदारी और कर्मठता के साथ तेजी से कार्य कुशलता को अमल में लाना और किसी फैसले को कल के लिए नहीं टालना इनकी प्रशासकीय कुशलता की खासियत रही है.

प्रति कुलपति से कुलपति और फिर जैसा कि हर ईमानदार और कर्मठ आदमी के साथ होता है, ढेरों बहाने बनाकर इन्हें दूसरा टर्म नहीं दिया गया. इन्हें सेहत पर ध्यान देने को कहा गया. बड़ी दिलचस्प बात है कि जो आदमी बिल्कुल चुस्त दुरूस्त हो उससे कहा जाये कि इस गुलशन में अब तुम्हारा काम नहीं.

दरअसल आज की व्यवस्था को हर उस आदमी से खतरा महसूस होता है जो व्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल न हो. जाहिर है एक संवेदनशील लेखक चिंतक व्यवस्था की उस मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सकता जहां चाटुकारिता, जातपात और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो.

बहरहाल, शीन अख्तर को यकीन था कि समाज में जुल्मोसितम की तारीकियां दूर होंगी और एक नयी सुबह का चमकता सूरज दिखेगा. एक निडर फनकार जिसकी आंखों से बेपनाह इल्मियत झंकती थी. अपनी सोच और फिक्र से समाज को, अकेडमिया को एक नयी दिशा देना चाहता था.

क्या क्या है हमसे जुनूं में न पूछिए/उलझे हैं कभी जमीं से कभी आसमां से हम.

(लेखक फिल्मकार, सिनेमा के शिक्षक और खुद भी एक साहित्यकार हैं)

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