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दोहरा मानदंड है राजनीतिक आरोपों में

राजनीतिक बयानों में न केवल तर्कहीन प्रहार किए जा रहे हैं, बल्कि गाली जैसी शब्दावलियों का खुलकर इस्तेमाल भी किया जा रहा है.

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Faisal Anurag

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पहली बार भारतीय चुनावी प्रचार में राजनीतिक भाषा न केवल अपनी गरिमा खो चुकी है. राजनीतिक बयानों में न केवल तर्कहीन प्रहार किए जा रहे हैं, बल्कि गाली जैसी शब्दावलियों का खुलकर इस्तेमाल भी किया जा रहा है. चुनाव आयोग इसपर रोकथाम करने से परहेज कर रहा है और उसने अभी तक राजनीतिक दलों को इसके लिए चेतावनी तक नहीं दिया है.

आरोपों के कुछ ऐसे भी मुद्दे खड़े किए जा रहे हैं, जो पिछले अनेक सालों में अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं. इसमें वंशवाद का आरोप भी एक है. भारतीय जनता पार्टी इस आरोप का इस्तेमाल गांधी परिवार पर करती है, लेकिन अपने चुनावी तालमेल और पार्टी के भीतर वंशवाद को बढ़ावा देने से हिचकती भी नहीं है.

भाजपा ने कांग्रेस नेतृत्व पर इस तरह के आरोपों को तेज कर रोजगार,किसानी समस्या और रफाल के मुद्दे को हाशिए पर लाने की कोशिश की है. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं 2014 में मोदी के वायदे और बेरोजगारी के साथ दलितों और आदिवासियों के सवाल प्रमुख होते जा रहे हैं.

किसानों का सवाल भी प्रमुख बनता जा रहा है. साफ देखा जा रहा है कि राजनीतिक दलों के प्रचार से अलग जनता के अपने सवाल चुनाव में प्रभावी भूमिका निभाने की स्थिति में है. इससे भाजपा और उसके घटकों की बेचैनी भी बढ़ती जा रही है.

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भाजपा के मंत्री रविशंकर प्रसाद लगातार गुस्से में कांग्रेस को निशाना बना रहे हैं. कांग्रेस पर वंशवाद का प्रहार वह बेहद आक्रमकता के साथ कर रहे हैं. रविशंकर प्रसाद आरोप लगाते हुए भूल जाते हैं कि उनकी जगह भाजपा में वंशवाद के कारण मजबूत हुई है.

वे बिहार जनसंघ और बाद में भाजपा के एक प्रमुख नेता ठाकुर प्रसाद के पुत्र हैं. भाजपा ने बिहार में जिस रामविलास पासवान के साथ अपने पुराने गठबंधन को इस बार और मजबूत किया है, वे वंशवाद के लिए खासे जाने जाते हैं. इस बार भी उन्हें जो छह सीटें भाजपा ने बिहार में दी हैं, उसमें से चार पर उनके पुत्र और वंश के अन्य सदस्य ही उम्मीदवार बनाए गए हैं.

भाजपा के वंशवाद की समस्या यह है कि वह दूसरे दलों में अपने पिता या पति के कारण ही स्थापित हुए नेताओं को अपनी ओर करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है और अपनी पार्टी के नेताओं की संतानों को टिकट दिया है.

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हाल ही में भाजपा में शामिल किए गए अनेक नेताओं की पहचान उनके पिता या पति की विरासत ही है. उन नेताओं की अपनी अलग से ना ही कोई पहचान है और ना ही किसी संघर्ष का इतिहास है.

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में भाजपा लगातार इसी तरह के लोगों को अपनी पार्टी में ला रही है. वह विपक्ष पर जिन आरापों को लगा रही है, उसे ही अपनी कामयाबी का सूत्र भी बना रखा है.

भाजपा को लगता है कि इस तरह के आरापों से वह चुनाव में खास कर लेगी. भाजपा विदेशी मूल के उस सवाल को भी फिर से खड़ा कर रही है, जिससे भारत की जनता ने 2004 के चुनावों में ही खारिज कर दिया था और वह सवाल भारत की राजनीति में केवल विपक्ष के प्रहार तक ही सीमित रह गया है.

भारत में वंशवाद और विदेशी मूल के दोनों सवाल ही राजनीतिक कामयाबी नहीं दिला सकते,  यह तथ्य अनेक बार स्थापित हो चुके हैं. भारत  की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना ने लोकतंत्र के उच्चतम मूल्यों को भी अपने अनुरूप ही स्वीकार किया है.

भारतीय समाज में परिवार और वारिश का महत्व है और भारत की राजनीति भी इससे वंचित नहीं है. भारत में जब अतीत के उन मूल्यों को ही स्थापित करने की कोशिश की जा रही है, जिनकी ऐतिहासिकता ही मिथकीय है. लोकतंत्र का वर्तमान ढांचा इन मिथकों के प्रभाव से मुक्त नहीं है.

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