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क्या आपको सच पता है ! लोगों के पास पैसे नहीं है, फिर शेयर बाजार कैसे चढ़ रहा है?

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Surjit Singh

कई लोगों से जब भी देश की गरीबी, भूखमरी या खराब अर्थव्यवस्था की चर्चा करो, सच बताओ, तो वह विश्वास ही नहीं कहते हैं. अगर हालात इतनी ही खराब है तो देश का शेयर बाजार कैसे चढ़ रहा है. कैसे रिकॉर्ड ऊंचाई पर है. अर्थशास्त्र की भाषा में इस रहस्य का जवाब समझना आम लोगों की तो छोड़िये, पढ़े-लिखे लोगों को भी मुश्किल होगा.

तो आप इन तथ्यों को पढ़िये, फिर समझ में भी आ जायेगा.

पहले यह जानिये कि शेयर बाजार में जो उछाल है, वह निवेश की वजह से है या बात कुछ और है. शेयर बाजार में लोग दो तरह से पैसे लगाते हैं. पहला शॉर्ट टर्म और दूसरा लॉन्ग टर्म.

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शॉर्ट टर्म में लोग पैसे लगाते हैं और तुरंत मुनाफा या नुकसान के साथ वापस ले लेते हैं. इसका मतलब यह होता है उन्हें इस बात का यकीन नहीं है कि आगे चलकर अर्थव्यवस्था किस हाल में रहेगी. इसलिये अभी जो करना है (मुनाफा कमाना या नुकसान सहना) कर लिया जाए.

लॉन्ग टर्म में लोग पैसे लगाकर छोड़ देते हैं. लंबी अवधि के लिये पैसे लगाये जाते हैं. इसे निवेश कहा जाता है. यह तब होता है जब पैसे लगाने वाले को विश्वास होता है कि अर्थव्यवस्था सही दिशा में जा रही है और उन्हें ज्यादा रिटर्न मिलने के चांस है.

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शेयर बाजार में पैसे लगाने वाले के लिये एक शब्द होता है डिलिवरी वॉल्यूम. इसका मतलब होता है कि शेयर बाजार में हर दिन या माह जितनी राशि का खरीद-बिक्री होती है, उसमें से कितने प्रतिशत लोग अपने पैसे को निवेश के तौर पर लगाते हैं. यानी लॉन्ग टर्म के लिये.

पिछले कुछ सालों के आंकड़े को देखिये. वर्ष 2018-19 डिलिवरी वोल्यूम 23 प्रतिशत था. वर्ष 2019-20 में 20 प्रतिशत. मार्च 2020 में भी डिलिवरी वोल्यूम 20.50 प्रतिशत था. जबकि जून 2020 में यह घटकर 15 प्रतिशत पर आ गया है. जून माह में डिलिवरी वोल्यूम में सबसे बड़ी कमी तब देखने को मिल रहा है, जब शेयर बाजार ने सबसे अधिक (मई के मुकाबले 37 प्रतिशत का) छलांग लगाया है. इसके मायने यह है कि शेयर बाजार में जो पैसे लगाये जा रहे हैं, उसमें से सिर्फ 15 प्रतिशत राशि ही लंबी अवधि के लिये निवेश में लग रहा है. जबकि 85 प्रतिशत राशि के शेयर खरीदे जा रहे हैं और बेचे जा रहे हैं.

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अभी म्यूचुअल फंड की स्थिति को भी समझ लें. मई 2020 में म्यूचुअल फंड के निवेश में 95 प्रतिशत की कमी आयी है. और जून माह में जनवरी से मई तक होने वाले कारोबार के मुकाबले औसत 12 प्रतिशत कम हो गया है. साफ है कि लोग लंबी अविधि के लिये निवेश करना नहीं चाहते. मतलब भविष्य पर भरोसा नहीं रहा.

अब बैंकों की स्थिति को समझिये. फिक्स्ड डिपोजिट (एफडी) और सेविंग एकाउंट में राशि डालने पर बैंक क्या इंटरेस्ट दे रहे हैं. एफडी पर बैंकों का इंटरेस्ट रेट 3.50-500 प्रतिशत का इंटरेस्ट रेट दे रहे हैं. जबकि सेविंग में पैसे रखने पर 2.70-3.50 प्रतिशत तक ब्याज दे रहे हैं. जबकि जून में महंगाई दर 2.7 प्रतिशत था. मतलब यह कि अगर आप बैंक में पैसा डालते हैं कि इंटरेस्ट से पैसा कमायेंगे, तो बहुत गलतफहमी में है. जो ब्याज मिलेगा, उस पर टैक्स कटने के बाद महंगाई दर जितना भी फायदा नहीं होगा. मतलब आप नुकसान में ही रहेंगे.

अब सवाल यह उठता है कि इन तथ्यों के बाद भी लोग शेयर बाजार में ही क्यों पैसा लगा व निकाल रहे हैं.
आपको पता है देश की 73 प्रतिशत संपत्ति पर कितने लोगों का कब्जा है. 1 प्रतिशत लोगों का. मतलब 13 लाख लोगों का. कोरोना को लेकर चालू लॉकडाउन में हर सामान्य व्यक्ति की तरह ही उनके आय में भी कमी आयी है. पर, उनके पास आय के बहुत सारे श्रोत होते हैं, इस कारण उन पर सामान्य आदमी जितना असर नहीं पड़ा है. लॉकडाउन में उनके खर्च (क्लब, पार्टी, रेस्टूरेंट, घूमना-फिरना, खरीददारी, विदेश जाना आदि) में भारी कमी आयी है.

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ऐसे लोगों के पास पैसे हैं. जिसे वह लंबी अवधि में निवेश करने के प्रति आश्वस्त नहीं है. इसमें उन्हें खतरा नजर आ रहा है. उनका विश्वास टूटा है. इसलिये यही 1 प्रतिशत लोग शेयर बाजार में रोज शेयर खरीद रहे हैं और रोज बेच दे रहे हैं. क्योंकि लंबी अवधि के निवेश पर उनका विश्वास टूट चुका है. यही कारण है कि शेयर बाजार हर दिन नयी ऊंचाई छू रहा है.

तो अब आप समझ गये होंगे कि हमारी-आपकी आमदनी कम हो गयी. करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये. बाजार के हालात खराब है. दुकानें बंद हो रही हैं. पर शेयर बाजार में रोज दिवाली क्यों है.

नोटः पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार Aunindyo Chakrabarty ने एक कार्यक्रम में ये आंकड़े बताये थे. लेख में उनके आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है.

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