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दिखावे की “चकाचौंध” में राज्य को डूबा तो नहीं रही “सरकार” ?

 Surjit Singh

तथ्य

शिक्षा- वर्ष 2018 में इंटर का रिजल्ट सिर्फ 48.34 प्रतिशत रहा. वर्ष 2015 में यह आंकड़ा 63.88 प्रतिशत था. बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट वर्ष 2018 में 59.48 प्रतिशत रहा. वर्ष 2015 में यह आंकड़ा 71.20 था.

राजस्व – वर्ष 2014-2015 में राज्य सरकार अपने खर्च का 47 प्रतिशत राशि राज्य के कर राजस्व और गैर कर राजस्व से जुटाती थी. वर्ष 2016-17 में घटकर सिर्फ 40 प्रतिशत रह गया है. मतलब आमदनी में सात प्रतिशत की गिरावट आयी है.

योजना – प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में केंद्र सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि वह तब तक केंद्रांश की पहली किस्त 700 करोड़ नहीं देगी, जब तक कि राज्य सरकार अपने हिस्से का 271 करोड़ (राज्यांश) आवंटित नहीं कर देती.

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राज्य सरकार कहां व्यस्त है

              मुख्यमंत्री रघुवर दास ने घोषणा की है कि बिरसा मुंडा स्मृति पार्क में एक टावर बनेगा, जिस पर 50 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होगा. ताकि लोग उस टावर से पूरी रांची को देख सकें.

              करोड़ों रुपये की लागत से मोरहाबादी मैदान में टाईम्स स्क्वायर बन रहा है. ताकि रांची आने वाले लोगों को लगे कि रांची विकसित शहर है.

              शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, पर तीन माह बाद यानी 15 नवंबर को 20 हजार से अधिक शिक्षकों को नियुक्ति पत्र देंगे. ताकि स्थापना दिवस की शोभा बढ़ सके.

              करोड़ों रुपये खर्चकर तालाबों का सौंदर्यीकरण और कंक्रीट में तब्दील किया जा रहा है. इस योजना की वजह से तालाब भर नहीं रहे हैं. पानी की भयंकर समस्या के लिए लोगों को तैयार रहना होगा.

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स्थिति क्या है

              हम स्वच्छता में नंबर-वन, नंबर-दो करते रह गये और रांची के हिंदपीढ़ी मुहल्ले में चिकनगुनिया और डेंगू ने पूरे इलाके को कब्जे में ले लिया.

              26 अगस्त को प्रभात खबर में पहले पन्ने पर खबर है कि राजधानी के डोरंडा इलाके में लगातार 30 घंटे तक बिजली नहीं रही.

              24 अगस्त को कुछ घंटे तक हुई बारिश में ही राजधानी की हालत खराब हो गयी. लोगों को दो से पांच घंटे तक जाम से जूझना पड़ा. कई मुहल्लों में घरों में पानी घुस गया.

              चतरा में अब भी लोग नदी पर पुल नहीं होने की वजह से गर्दन भर पानी में डूबकर गांव से बाहर निकलने को मजबूर हैं.

              रांची रिंग रोड, रांची-टाटा रोड, बोकारो-धनबाद रोड अब तक नहीं बन पाया. सड़क की स्थिति जर्जर है.

उपर के तथ्यों, घोषणाओं, सरकार के कामों और रांची समेत राज्यभर के हालात से क्या पता चलता है. सरकार क्या चाहती है. सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं. चकाचौंध का दिखावा या लोक कल्याणकारी काम? कहीं ऐसा तो नहीं कि चकाचौंध और दिखावे के चक्कर में सरकार राज्य का लुटिया डुबाने जा रही है. विपक्ष मौन है. तार्किक ढंग से अपनी बात नहीं रख रहा. सवाल नहीं उठा रहा. सत्ता पक्ष के कुछ नेता ही सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उसका जवाब भी नहीं मिल रहा.

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शिक्षा

राज्य में शिक्षा का स्तर अब तक के सबसे खराब स्थिति में पहुंच गया है. वर्ष 2015 में इंटर की परीक्षा में 63.88 प्रतिशत छात्र सफल हुए थे. वर्ष 2016 में 58.36 प्रतिशत, वर्ष 2017 में 52.36 प्रतिशत और वर्ष 2018 में 48.34 प्रतिशत छात्र सफल हुए. बोर्ड की रिजल्ट की बात करें तो वर्ष 2015 में 71.20 प्रतिशत छात्र सफल हुए थे. जबकि वर्ष 2016 में 67.54 प्रतिशत, वर्ष 2017 में 67.83 प्रतिशत और वर्ष 2018 में 59.48 प्रतिशत छात्र सफल हुए. यहां भी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. साफ है वर्तमान सरकार में शिक्षा का स्तर सुधरने के बजाय खराब से खराब होता गया है. इसकी एक बड़ी वजह स्कूलों में शिक्षक का नहीं हैं. करीब 90 प्रतिशत पद रिक्त पड़े हैं. लेकिन सरकार को शिक्षकों को नियुक्त करने की जल्दी नहीं है. क्योंकि सरकार राज्य स्थापना दिवस पर 20 हजार से अधिक शिक्षकों को नियुक्ति पत्र देकर स्थापना दिवस की शोभा बढ़ाना चाहती है.  

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राजस्व

राज्य सरकार को विकास योजनाएं या फिर अन्य मद में खर्च करने के लिए पैसा कहां से आता है. पैसे टैक्स, फीस और रॉयल्टी से आता है. आमदनी राज्य सरकार को भी होती है और केंद्र से भी राज्य का हिस्सा मिलता है. वित्तीय वर्ष 2014-15 में राज्य सरकार का राजस्व 14,684.87 करोड़ रुपया था. वित्तीय वर्ष 2015-16 में यह 17,331.96 करोड़ रहा औऱ वर्ष 2016-17 में 18,650.66  करोड़ रुपया रहा. इसी दौरान केंद्र से मिलने वाली राज्यांश में भारी बढ़ोतरी देखी गयी. केंद्र से वर्ष 2014-15 में 16,879.69 करोड़ रुपया, वर्ष 2015-16  में 23,306.39 करोड़ रुपया और वर्ष  2016-17 में 28.403.27 करोड़ रुपये दिये. इस तरह कुल आमदनी में राज्य का हिस्सा साल-दर-साल कम होता जा रहा है. वर्ष 2015 में आमदनी में राज्य का राजस्व जहां कुल राजस्व का 47 प्रतिशत था, वहीं अब मात्र 40 प्रतिशत रह गया है. और सरकार वैसी योजनाओं पर खर्च करने की नयी-नयी योजनाएं बना रही है, घोषणाएं कर रही हो, जो चकाचौंध को तो बयां करती है, लेकिन लोक कल्याणकारी नहीं हो सकती. आम लोगों के जीवन पर उसका कोई खास असर नहीं पड़ने वाला. न कोई फायदा होगा. उदाहरण के लिए बड़ा तालाब में 200 करोड़ की लागत से बनने वाली स्वामी विवेकानंद का स्टैच्यू, पुरानी जेल परिसर में 50 करोड़ रुपये से अधिक रुपये से बनने वाला टावर और मोरहाबादी मैदान में बन रहा स्टेट स्क्वायर को लिया जा सकता है.

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