न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

हाथों से दिव्यांग, लेकिन पैर से लिखकर बच्चों में जगा रहे शिक्षा का अलख

शिक्षकों के लिए मिसाल मो. अकबर अंसारी

364

Ravi Chourasiya

Dhanbad: 5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस, एक ऐसा दिन जब हम अपने शिक्षकों को सम्मानित करते हैं, उनके सम्मान में कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं. इस शिक्षक दिवस पर हम आपको एक ऐसे शिक्षक से मिलवाते हैं, जिन्हें देखकर, जिनके बारे में जानकर आपके मन में उनके लिए सम्मान स्वतः आ जायेगा. क्योंकि कठिनाई से नहीं हारते हुए उन्होंने जो भी किया है, वो शिक्षकों के लिए मिसाल है.

इसे भी पढ़ेंःशिक्षक दिवस विशेष – एक शिक्षिका के भरोसे 570 छात्र, स्कूल की भी हालत जर्जर

ये हैं धनबाद के गोविंदपुर के रहनेवाले 33 वर्षीय शिक्षक मो. अकबर अंसारी. जन्म से इनके हाथ नहीं हैं. लेकिन मुसीबतों के आगे नहीं हारते हुए अपने बुलंद हौसले से ना सिर्फ उन्होंने अपनी एक पहचान बनाई. बल्कि पिछले 12 सालों से लगातार पैरों से लिखकर पारा शिक्षक के तौर पर सैकड़ों बच्चों में ज्ञान की जोत जला रहे हैं.

 मां की ममता ने दी नई जिंदगी

गोविंदपुर में किराए के मकान में रहने वाले मो अकबर अंसारी का जब जन्म हुआ तो कई अपनों ने सलाह दी कि दिव्यांग बेटे को मार दो. लेकिन अकबर की ढाल बनी उनकी मां. मां की ममता ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी. अकबर जब थोड़ा बड़े हुए तो पैरों को ही हाथ की शक्ति देनी शुरू कर दी. लकड़ी को पैरों की उंगलियों में फंसा कर जमीन में लिखने का प्रयास किया. उसकी कोशिश देख दादाजी को उम्मीद की किरणें दिखीं. उन्होंने स्लेट खरीद अकबर को थमा दी.

 कैसे हासिल की सनातक की शिक्षा

अपने हौसले के पक्के अकबर ने 1999 में झरिया राज प्लस टू स्कूल में पैरों से ही लिख मैट्रिक की परीक्षा पास की. फिर 2001 में इसी तर्ज पर आरएस मोर कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा भी उर्तीण की. 9 साल के बाद उन्हें स्नातक की डिग्री भी मिल गई. 2005 में तत्कालीन डीसी बिला राजेश के आदेश पर इन्हें पारा शिक्षक की नौकरी मिली.

सेवा नियमित हो जाए तो समझूंगा हो गया सम्मानित

बच्चों में शिक्षा के साथ-साथ आत्मविश्वास जगा रहे अकबर को एक दर्द आज भी साल रहा है. दरअसल इनकी सेवा आज तक नियमित नहीं हो पाई. टेट के एग्जाम में 11 अंकों से अनुतीर्ण हो चुके दिव्यांग होने के कारण अकबर ने एक्स्ट्रा समय की मांग की थी. क्योंकि इन्हें पैर से लिखना था लेकिन विभाग ने वो नहीं दिया. नतीजन आज तक इनकी नौकरी स्थाई नहीं हो पाई. जो पगार मिलता है वो घर का किराया और बीवी-बच्चों के भरण पोषण के लिए नाकाफी है.

शिक्षक दिवस के अवसर पर अकबर जैसे बाधा पर विजय पाने वाले शिक्षकों को सम्मान देने की जरूरत है जो आज तक इन्हें नही मिला. अगर इनकी सेवा सरकार नियमित कर दे तो शिक्षक दिवस के मौके पर अकबर के लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा.

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Comments are closed.

%d bloggers like this: