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जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) क्यों न बने चुनावी मुद्दा!

कुमार संजय,राजीव रंजन,दीपक बारा

Ranchi : जिला खनिज फाउंडेशन, डीएमएफ प्राकृतिक संसाधन के अभिशासन का एक जन केंद्रित दृष्टिकोण है. जहां लोगों के लाभ प्राप्त करने के अधिकार को सबसे आगे रखा गया है. यदि डीएमएफ को उचित ढंग से विकसित एवं क्रियान्वित किया जाए, तो डीएमएफ में न केवल सबसे कमजोर समुदायों के जीवन और उनकी आजीविका में सुधार करने की अकूत क्षमता है, बल्कि यह समावेशी अभिशासन के लिए भी एक आदर्श मॉडल हो सकता है.

जिला खनिज फाउंडेशन, डीएमएफ का गठन केंद्रीय खनन कानून, खान और खनिज, विकास और विनियमन अधिनियम संशोधन 2015 के तहत किया गया है. इसका एक स्पष्ट उद्देश्य है. खनन संबंधित गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों एवं व्यक्तियों के हित और लाभ के लिए कार्य करना. डीएमएफ एक गैर लाभकारी ट्रस्ट है. जो झारखंड सहित भारत के सभी खनन जिलों में स्थापित किया गया है. झारखंड सरकार ने वर्ष 2016 में झारखंड डीएमएफ ट्रस्ट के संचालन के लिए नियम भी बनाया है.

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जिसके तहत राज्य के खनन प्रभावित जिलों मे डीएमएफ ट्रस्टों के कामकाज के दिशा निर्देश एवं खनन प्रभावित क्षेत्रों में रह रहे समुदायों को सामाजिक और आर्थिक लाभ सुनिश्चित किया जा सके. गौरतलब है कि झारखंड के सभी 24 जिलों में डीएमएफ ट्रस्ट का गठन किया जा चुका है.

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राज्य में डीएमएफ की वर्तमान स्थिति

झारखंड में सितंबर 2019 तक लगभग 4718 करोड़ रु राशि डीएमएफ में संग्रहित हुई है. झारखंड  देश में डीएमएफ संग्रह के मामले में दूसरा सबसे बड़ा राज्य है. शीर्ष राज्य ओडिशा है. भारत सरकार के खान मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, अक्टूबर 2019 तक डीएमएफ अंतर्गत 32553 करोड़ रूपये देश के सभी राज्यों को मिलाकर संग्रहित हुए हैं.

झारखंड देश का एक प्रमुख कोयला खनन राज्य है. डीएमएफ फंड का अधिकांश हिस्सा लगभग 75% झारखंड में कोयला खनन जिलों से आता है.

राज्य के विभिन्न जिले जैसे धनबाद,1178 करोड़, पश्चिम सिंहभूम 940 करोड़, रामगढ़ 613 करोड़ चतरा 631 करोड़, हजारीबाग,201 करोड़, गोड्डा 301 करोड़ और बोकारो 426 करोड़ डीएमएफ संग्रहण में सबसे बड़े जिलों में गिने जाते हैं. और जहां लगभग 100.300 करोड़ रूपये प्रति वर्ष निश्चित रूप से आने का अनुमान रहता है. साथ ही अन्य जिलों में भी एक अच्छी खासी रकम रॉयल्टी के रूप में डीएमएफ के खाते में जमा होती है.

अभी तक राज्य में डीएमएफ से विभिन्न विकासात्मक परियोजनाओं के लिए 4322 करोड़ मंजूर किए गए हैं और इसमें से 1979 करोड़ रूपये की राशि खर्च की जा चुकी है. सबसे ज्यादा राशि लगभग 76% प्रतिशत पेयजलापूर्ति के लिए एवं 11% राशि ओडीएफ शौचालय के लिए की गयी है. डीएमएफ की राशि से खर्च का ब्योरा इस प्रकार है.

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योजनाओं का

विवरण

 

योजनाओं की

संख्या

लाभार्थियों की संख्या

(ODF,प्रशिक्षु,अन्य)

आवंटित राशि

(करोड़ में)

खर्च की गयी राशि

(करोड़ में )

 
पेयजलापूर्ति 15852 3186355 3314 1456.59  
स्वच्छता (ODF) 16 734890  493.55 420.60  
स्वास्थ्य 244  450 22.04 8.72  
अन्य 783 575 492.14 93.18  
कुल 16895 3922270 4322.11 1979.1  

 

सबसे अहम सवाल यह है की जिलों द्वारा डीएमएफ से संबधित योजनाओं के प्लानिंग और इसका किर्यान्वयन क्या इसके नियमों और उद्देश्य के तहत हो रहा है. क्या यह अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में बढ़ रहा है. साथ ही इस बात पर भी गौर फरमाया जाना चाहिए कि क्या डीएमएफ फंड लक्षित लाभार्थियों के लाभ के लिए प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा रहा है, या फिर खनन प्रभावित लोगों के अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा.

महत्वपूर्ण मुद्दे

  •  डीएमएफ से संबंधित राज्य के नियम के अनुसार, यह जरूरी है कि इस राशि की प्लानिंग और योजनाओं को लेने के लिए खनन प्रभावित क्षेत्रों के अन्तर्गत पड़ने वाले ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य है. लेकिन इसके ठीक विपरीत सिर्फ खानापूर्ति के लिए ग्राम सभाओं का आयोजन करवाया गया. जैसे ग्रामसभा स्तर के माध्यम से किसी भी योजना का चयन नहीं किया गया. ऐसी योजनाओं को ऊपर से थोप दिया गया. इसलिए जमीनी स्तर पर क्षेत्र के लोगों की व्यापक जरूरत के अनुरूप सहभागी नियोजन की प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए.
  • पेयजल और स्वच्छता पर निवेश के फैसले राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2016 में ऊपर से दिए गये निर्देशों के अनुसार हुएए इसमे खनन प्रभावित क्षेत्र और यहाँ के लोगों की बुनियादी जरूरत का खयाल नहीं रखा गया।
  • राज्य ने अभी भी खनन प्रभावित लोगों की पहचान के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया है. इससे कई वास्तविक लोग छूट गये हैं, जो खनन के कारण विस्थापित और पुनर्वासित हुए हैं या अपनी आजीविका खो चुके हैं और जो इस डीएमएफ़ फंड के प्रमुख लाभार्थी हैं.
  • इसके अलावा डीएमएफ़ गतिविधियों से संबंधित शुरुआती तीन-चार वर्षों में किसी भी जरुरत के मुताबिक, योजना नहीं होने के कारण क्षेत्र विशेष के गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया. उदाहरण के लिए बाल मृत्यु दर और कुपोषण शीर्ष खनन जिलों और आदिवासी क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण समस्या है. इस मुद्दे पर निवेश और काम बिलकुल भी नहीं हुआ है. डीएमएफ़ राशि से आदिवासी क्षेत्रों में इन मुद्दों पर बेहतर कार्य किया जा सकता था.
  • बिल्कुल ऐसी ही स्थिति आजीविका के साथ भी है. वास्तव में आजीविका से संबधित गतिविधियों पर भी बेहद कम ध्यान दिया गया. जबकि सभी खनन जिलों में सुरक्षित आय और रोजगार एक महत्वपूर्ण चुनौती है.
  • झारखंड में अभी भी डीएमएफ उपयुक्त प्रशासनिक व्यवस्थाए योजना और समन्वय कार्यालय के बिना काम कर रहे हैं. योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए केवल रांची, रामगढ़, हजारीबाग, गोड्डा जिलों ने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट पीएमयू की स्थापना की है. जबकि पीएमयू की स्थापना से डीएमएफ़ के कार्यों का निजोजन क्रियान्वयन और बेहतर समन्वय से समावेशी तरीके क्षेत्र का विकास संभव है.
  • एक तरफ राज्य में जहां लोगों के सबसे जरूरी और सबसे महत्वपुर्ण मुद्दों पर काम नहीं किया गया. वहीं दूसरी तरफ फ्लाईओवर जैसी प्रमुख शहरी परियोजनाओं के लिए डीएमएफ के पैसे का उपयोग किया गया. धनबाद में इस वर्ष के शुरू में डीएमएफ़ के फंड से 256 करोड़ के फ्लाईओवर को मंजूरी दी गई है.
  • वास्तव में धनबाद का एक प्रमुख मामला यह है कि पहले 4 वर्षों में सबसे ज्यादा प्रभावित लोग डीएमएफ के लाभ से वंचित रहे हैं. झरिया के लोगों को इस फंड से कोई लाभ नहीं मिला. डीएमएफ को एक समावेशी उत्तरदायी और पारदर्शी संस्थान के रूप में कार्य करने एवं बेहतर उपयोग के लिए आवश्यक कदम.  
  • जिलों को डीएमएफ लाभार्थियों की पहचान करनी चाहिए. हर जिले को डीएमएफ के लाभार्थी की पहचान करनी चाहिए और एक सूची बनानी चाहिए. इसे वेबसाइट पर प्रकाशित करना चाहिए एवं इन्हें डीएमएफ संबंधितत लाभ देना चाहिए.
  • ग्राम सभा की भागीदारी को सुनिश्चित करनार ग्राम सभा का डीएमएफ ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व होना चाहिए. साथ ही जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक प्रधान जैसे मुंडा जो ग्राम सभा का नेतृत्व करते हैं, उन्हें भी शामिल करना चाहिए.
  • ग्राम सभा के माध्यम से बॉटम उप प्लानिंग का अनुपालन किया जाना चाहिए. इसे राज्य डीएमएफ नियम एवं पीएमकेकेकेवाई भी आवश्यक मानती है.
  • डीएमएफ ट्रस्ट की स्वायत्तता को बनाए रखने की जरूरत है. डीएमएफ ट्रस्ट की मूल भावना और इच्छित स्वायत्तता को बनाए रखा जाना चाहिए. इसे अपने निर्णय लेने की आजादी से समझौता नहीं होना चाहिए और इस संस्थान को मजबूती भी प्रदान करनी चाहिए. जैसा कि केंद्र और राज्य के नियम के अनुरूप प्रभावित लोगों का उनकी जरूरत के मुताबिक उत्थान हो सके.
  • डीएमएफ को पारदर्शी एवं उतरदायी बनाने की जरुरत है. डीएमएफ से संबंधित जानकारी का सार्वजनिक प्रकटीकरण वेबसाइट एवं पंचायत ग्रामसभा स्तरों तक किया जाना चाहिए. क्योंकि डीएमएफ एक सार्वजनिक ट्रस्ट है एवं इसका व्यापक रूप से वित्तीय कार्य प्रगति और सामाजिक अंकेक्षण किया जाना चाहिए.
  • झारखंड में डीएमएफ अपने जन केंद्रित उद्देश्य से भटक रहा है और इच्छित लाभार्थियों की सेवा करने में विफल रहा है. वर्तमान स्थिति को देखते हुए डीएमएफ में आवश्यक सुधार लाने और बेहतर कार्यनीति बनाने की जरूरत है. ताकि डीएमएफ अपने उद्देश्य और बुनियादी सिद्धांतों से विचलित न हो.

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