न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

चुनावी समर में नेताओं की बद्जुबानी लोकतंत्र के लिए खतरनाक

जो मुद्दे युवाओं, किसानों और गरीबों की थी, वो आज भी देखने को मिल ही रही है.

139

Sweta

mi banner add

2019 का लोकसभा चुनाव काफी रोमांचक है. जहां प्रत्याशियों की घोषणा और मेनिफेस्टो को लेकर आगे निकलने की होड़ लगी हुई है. लेकिन इस चुनावी समर में कई मुख्य मुद्दे गौण हो गये हैं. जो मुद्दे युवाओं, किसानों और गरीबों की थी, वो आज भी देखने को मिल ही रही है.

इस चुनाव में एक नया कल्चर भी देखने को मिला. पार्टी को राह दिखाने वाले कई बुजुर्ग नेताओं को किनारे कर दिय़ा गया. लेकिन जो चीज इस चुनाव में आम दिख रही है, वो एक-दूसरे नेता और पार्टी को नीचा दिखाना है. उसी दौर में जुबानी जंग भी जमकर चल रही है. खुद को बेहतर और जनता का हितैशी दिखाने में नेता अपनी मर्यादा भी ताक पर रख रहे हैं.

देश में लोकतंत्र है और उसमें हर तरह की आजादी है. लेकिन ये कैसा लोकतंत्र है कि नेता मुख्य मुद्दों को छोड़ एक-दूसरे पर कटाक्ष कर रहे हैं और बयान देते वक्त भी किसी तरह के अनुशासन का पालन भी नहीं कर रहे. जिससे यह लोकतंत्र और खासकर भारत की चुनावी संस्कृति का मजाक है.

इसे भी पढ़ें – चतरा में बीजेपी के बागी नेता ही ना डुबा दें सुनील सिंह की नैया

कुछ नेताओं के विवादित बयान

आजम खान का विवादित बयान

मैं आपसे सवाल करता हूं कि क्या राजनीत इतनी गिर जायेगी. 10 बरस जिसने रामपुर वालों का खून पिया, लहू पिया. जिसकी उंगलियां पकड़कर हम रामपुर लेकर आये. रामपुर की गलियां और सड़कों की पहचान करायी. किसी का कांधा नहीं लगने दिया उसके शरीर से, छूने नहीं दिया, गंदी बात नहीं की. लेकिन 10 साल तक सबकुछ ठीक कराया, मगर आपमें और मुझमें क्या फर्क है

शाहबाद वालों, रामपुर वालों, उत्तर प्रदेश वालों, हिंदुस्तान वालों..उसकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लग गये. लेकिन मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवियर है, वो खाकी रंग का है. इसे मैं 17 दिन में पहचान गया और आपको समझने में 17 बरस लगे.

बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह का आजम पर पलटवार

उत्तर प्रदेश के बलिया की बैरिया सीट से बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह ने आजम खान के जयाप्रदा पर दिये विवादित बयान पर एक और विवादित बयान देकर नये विवाद को जन्म दे दिया है. आजम खान पर निशाना साधते हुए सुरेंद्र सिंह ने कह डाला कि आजम खान की संस्कृति है कि उसमें वो दुनिया की सभी बहनों-बेटियों को अपनी पत्नी के रूप में मानते हैं.

साथ ही विधायक ने आजम खान को बदतमीज नेता बताते हुए कहा कि उन पर टिप्पणी करना अप्रासंगिक है और ऐसे नेता को तो जेल  भेज देना चाहिए.

सपा नेता पंडित सिंह का जया प्रदा पर निशाना

आजम खान के जया प्रदा पर दिये विवादित खांकी अंडरवियर वाले बयान पर सपा के ही एक अन्य नेता का बयान आया है. सपा नेता पंडित सिंह ने पत्रकारों से बातचीत के क्रम में कह डाला कि, जयाप्रदा महिला नहीं हैं, वह बहुत बड़ी चीज हैं. साथ ही आजम खान के खांकी अंडरवियर वाले बयान पर उन्होंने अपनी राय रखते हुए कहा कि यह उनकी सोच होगी.

योगी आदित्यनाथ का विवादित

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मेरठ में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले विवादित बयान देकर माहौल गर्मा दिया है. आदित्यनाथ ने वहां एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि अगर कांग्रेस-बीएसपी-एसपी को अली पर विश्वास है तो हमें भी बजरंगबली पर विश्वास है.

चुनाव आयोग ने योगी को नोटिस जारी किया तो जवाब में उन्होंने कहा कि उनकी मंशा गलत नहीं थी. साथ ही यह भरोसा भी दिया कि भविष्य में ऐसी गलती उनसे नहीं होगी.

मायावती का विवादित बयान

मायावती ने योगी आदित्यनाथ के दिये विवादित बयान पर टिप्पणी की और चुनावी रैली में जवाब में भी विवादित बयान ही दे डाला. मायावती ने कहा कि, मैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी की एक बात का जरूर जबाव देना चाहूंगी, जो इन्होंने हमारे गठबंधन के बारे में इशारा करते हुए कहा है कि यदि इनके अली हैं, तो हमारे बजरंगबली हैं. तो मैं इन्हें कहना चाहती हूं कि हमारे अली भी हैं और बजरंगबली भी हैं.

इसे भी पढ़ें – बड़ी पार्टियों के ये उम्मीदवार खुद को ही नहीं करेंगे वोट

अर्थात ये दोनों हमारे अपने ही हैं और इन दोनों में से कोई भी गैर नहीं हैं. हमें बजरंगबली इसलिए भी चाहिए क्योंकि ये मेरी खुद की दलित जाति से ही जुड़े हैं और इनकी जाति की खोज मैंने नहीं की है, बल्कि खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने की है.

साथ ही बयान में मायावती ने कहा कि योगी जी की बहुत-बहुत आभारी भी हूं कि इन्होंने हमारे वंशज के बारे में ये खास और महत्वपूर्ण जानकारी दी है.

मेनका गांधी का विवादित बयान

बीजेपी नेता मेनका गांधी ने मुस्लिम बहुल क्षेत्र तूराबखानी में बीते गुरूवार को एक चुनावी सभा में विवादित बयान दे डाला था. मेनका ने कहा था कि, मैं चुनाव लोगों के प्यार और सहयोग से जीत रही हूं, मेनका यहीं नहीं रूकी और कह डाला कि यदि मेरी जीत मुसलमानों के बिना होगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा और कहा कि बता देती हूं कि दिल खट्टा हो जाता है.

मेनका यही नहीं रूकीं और उन्होंने कह डाला कि ऐसे में फिर जब मुसलमान आता है काम के लिए तो फिर मैं भी सोचती हूं कि नहीं रहने ही दो क्या फर्क पड़ता है. क्योंकि आखिर नौकरी भी तो एक सौदेबाजी ही होती है, जनता से पूछा कि बात सही है या नहीं?

2019 के चुनाव में उपरोक्त दिये गये चुनावी बयानों ने लोकतंत्र का भी मजाक बना दिया है. चुनाव में ना सिर्फ लोगों की जाति और धर्म की लड़ाई है, बल्कि भगवान की जाति पर भी बयान दिये जा रहे हैं. यूपी में भगवान की जाति पर आदित्यनाथ और मायावती लड़ रहे हैं और विवादित बयानों का दौर जारी है.

तो जया प्रदा पर आजम खान की आपमानजनक टिप्पणी ने कई विवादों को जन्म दे दिया है. आजम खान के बयान ने सपा के अनुशासन पर भी सवाल खड़े किये हैं और साबित किया है कि पार्टी का उनपर कोई जोर नहीं चलता.

हालांकि कई पार्टियों ने आजम के बयान की भरपूर निंदा की है. वहीं आजम के खांकी अंडरवियर वाले बयान पर बीजेपी के एक नेता भी निशाना साधा है और आजम खान की संस्कृति पर ही टिप्पणी कर दी है और कहा है कि आजम की संस्कृति ही ऐसी है कि वे दुनिया की सभी बहनों-बेटियों को अपनी पत्नी के रूप में मानते हैं.

जबकि मेनका गांधी ने भी अपने विवादित बयान में जीत को लेकर दावा किया है और मुस्लिमों के वोट ना देने पर कह भी डाला है कि जब वे उवके पास काम के लिए आयेंगे तो उन्हें सोचना पड़ेगा.

इसे भी पढ़ें – बाईपी गांव का तीन महीने का अनाज गायब, कहां गया कोई बताने को तैयार नही

नेता किसी भी पार्टी के हों, उनकी अपनी एक मर्यादा होती है. साथ ही पार्टी को अनुशासन याद दिलाने और अपने नेताओं पर लगाम लगाना पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेवारी होती है. लेकिन इस लोकसभा चुनाव में अगर देखा जाए तो किसी भी पार्टी के वरिष्ठ नेता ही मर्यादा को ताक पर रखकर बयान दे रहे हैं और वो भी पूरी तरह से खुलकर.

आखिर जब पार्टी के वरिष्ठ नेता और अध्यक्ष इनपर लगाम नहीं लगायेंगे, पार्टी की संस्कृति याद नहीं दिलायेंगे तो आगे इसका अंजाम भी और बुरा ही होता जायेगा.

चुनाव आचार संहिता और भारत का संविधान लोगों और समाज की गरिमा को महत्व देने की हिदायत देता है. भाषा की मर्यादा का तार-तार होना बताता है कि हमारी राजनीति किस वैचारिक प्रदूषण के दौर से गुजर रही है.

राजनीति में विचारहीनता को हावी होने देया जा रहा है, भारत ने वह भी दौर भी देखा है, जब राजनीति में पवित्रता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था. राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता विचारों से प्रेरित होकर पार्टियों में आते थे और लंबा संघर्ष करते थे.

भाषा की मर्यादा को सभी दल अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे. राजनीतिक दल भी इस बात के लिए सचेत रहते थे कि उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं के चाल, आचरण और भाषा में झलके और आम जन से प्रेरणा ग्रहण कर पार्टियों की विचारधारा से जुड़ें.

लेकिन पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि राजनीति प्रतिबिद्धता की जगह एक व्यवसाय का रूप ग्रहण कर रहे हैं और इसमें चुनावी कामयाबी को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है और इसी कामयाबी के लिए देखा जा रहा है कि अपने वोट बैंक के भीतर अपनी छवि को उग्र बनाने के लिए भाषा की मर्यादा को नष्ट किया जा रहा है.

इसे भी पढ़ें – डबल इंजन वाली सरकार के विकास की कहानी, न सड़क-न स्कूल-न पीने का पानी

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
%d bloggers like this: