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जजों की ओर से लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की निरंतर चर्चा नई उम्मीद जगाने वाली है

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Faisal Anurag

जस्टिस चंद्रचूड़ के बाद अब जस्टिस दीपक गुप्ता ने लोकतंत्र, संविधान और लोगों के अधिकारों को ले कर वक्तव्य दिया है. सुप्रीम कोर्ट के जजों की इन टिप्पणियों को ले कर खासी चर्चा है. आमतौर पर इस तरह की बातों को धारा के विपरीत माने जाने का रिवाज बना हुआ है. लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की चर्चा जिस तरह जज कर रहे हैं, वह एक नयी उम्मीद इस अर्थ में है कि एकाधिकारवाद की प्रवृतियों ओर संख्याबल ने कुछ ऐसी चर्चाओं को पैदा किया है, जिसे ले कर तरह-तरह की आशंकाएं प्रबल हैं.

जस्टिट गुप्ता ने कहा है: दुख की बात है कि आज देश में असहमति को देशद्रोह समझा जा रहा है. असहमति की आवाज को देश विरोधी या लोकतंत्र विरोधी करार देना संवैधानिक मूल्यों पर चोट पहुचाता है. अगर आप अलग राय रखते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप देशद्रोही हैं. या देश के संविधान के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखते हैं.

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन में लोकतंत्र व विरोध विषयक व्याख्यान देते हुए उन्होंने जोर दे कर कहा है कि लोकतंत्र में विरोध करने की स्वतंत्रता पर कोई अंकुश नहीं लगना चाहिये. क्योंकि लोकतंत्र में विरोध की भी अहमियत है. जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध के स्वर को प्रोत्साहित किये जाने की जरूरत है. न कि इसे दबाने की.

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देखते-देखते पिछले कुछ सालों में देश में सरकार से असहमति को देश विरोध मान लेने का प्रचलन बढ़ गया है.  सरकार की आलोचना और आलोचकों को देशद्रोही करार देने की प्रवृति जोरो पर है. ऐसे माहौल में जस्टिस गुप्ता की बातों का महत्व बढ़ जाता है. गुजरात के एक समारोह में इससे मिलती-जुलती बातें जस्टिटस चंद्रचूड़ ने हाल ही में कही है.

अभी हाल में एक अन्य जस्टिस अरूण मिश्र सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जजों और जजों के निशाने पर रहे. सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने तीन साल पहले जब प्रेस के सामने आ कर भारत के लोगों का आह्वान किया था कि वे संस्थानों की प्रतिष्ठा और स्वायत्तता की हिफाजत के लिए आगे आयें.

तब से ही जुडिशियरी के भीतर चलने वाली असहमति को लेकर कई बार चर्चा हुई है. राजनीतिक प्रेक्षकों के एक बड़े  तबकों ने इन घटनाक्रमों को लेकर गंभीर टिप्पणियां लिखी हैं.

जस्टिस गुप्ता ने जो कहा: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने सोमवार को कहा कि देश में आजकल विरोध को देशद्रोह की तरह देखा जा रहा है. हाल ही की कुछ घटनाओं में ऐसा देखा गया है कि विरोध का सुर रखने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा दायर किया गया है. उन्होंने कहा कि यह सही नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित ‘लोकतंत्र व विरोध’ विषय पर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए. विरोधी सुरों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. बातचीत के जरिए देश को सही तरीके से चलाया जा सकता है. बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के खिलाफ है.

उन्होंने कहा कि किसी पार्टी को 51 फीसदी लोगों का समर्थन हासिल हो तो इसका यह मतलब नहीं है कि बाकी 49 फीसदी लोगों को पांच साल तक कुछ नहीं बोलना चाहिए. लोकतंत्र 100 फीसदी के लिए होता है. सरकार सभी के लिए होती है. लोकतंत्र में हर व्यक्ति की भूमिका होती है. जब तक कोई कानून न तोड़े तोड़े, उसके पास हर अधिकार है.

उन्होंने श्रेया सिंघल के मामले में जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन द्वारा दिये गये फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर हम विरोधी सुरों को दबाएंगे तो अभिव्यक्ति की आजादी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निडर न्यायपालिका के बिना कानून का शासन नहीं हो सकता. जस्टिटस गुप्ता की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि सरकार हमेशा सही नहीं होती है.

उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकों को साथ मिलकर प्रदर्शन करने का अधिकार है. लेकिन शांतिपूर्ण ढंग से. विरोध महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का मूल था. हम सभी गलतियां करते हैं. सरकार को प्रदर्शन का दमन करने का अधिकार नहीं है. जब तक प्रदर्शन हिंसक रूप अख्तियार न कर ले. सही मायने में वह देश आजाद है जहां अभिव्यक्ति की आजादी है और कानून का शासन है.

इन दिनों भारत का संविधान और महात्मा गांधी के साथ डा अंबेडकर सबसे ज्यादा कोट किए जा रहे हैं. महात्मा गांधी का सिविल नाफरमानी का जो मंत्र है उसे लोकतंत्र के लिए जरूरी बताने की प्रवृति न्यायविदों में भी आम है. जस्टिस गुप्ता ने भी इस पर फोकस किया है.

जस्टिस गुप्ता ने कहा कि सरकार और देश दोनों अलग-अलग हैं. सरकार का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं है. साथ ही कहा कि कोई भी संस्थान आलोचना से परे नहीं है, फिर चाहे वह न्यायपालिका हो, सशस्त्र बल हों. असहमति के अधिकार में ही आलोचना का अधिकार भी निहित है. अगर हम असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे तो ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला होगा.

उन्होंने कहा कि मैंने पाया कि बार एसोसिएशन द्वारा प्रस्ताव पारित कर कहा जाता है कि उसके सदस्य किसी खास मामले में पैरवी नहीं करेंगे. क्योंकि यह देश विरोधी है. ऐसा नहीं होना चाहिए. आप किसी को कानूनी सहायता देने से इनकार नहीं कर सकते. उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम वर्षों पुरानी परंपराओं को चुनौती नहीं देंगे तो नई सोच विकसित नहीं होगी. नई सोच तभी आयेगी जब हम पुरानी मान्यताओं व परंपराओं को चुनौती देंगे.

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