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सियासी गलियारे में चर्चा : क्या महाराष्ट्र के बाद है झारखंड की बारी ?

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Ranchi: झारखंड के सियासी गलियारे में इन दिनों इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या महाराष्ट्र के बाद झारखंड की बारी है? इस चर्चा के पीछे पिछले कई दिनों से सूबे में चल रही राजनीतिक घटनाक्रम है. घटनाक्रम राज्यसभा चुनाव के समय से ही शुरू हो गया था. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर झारखंड की सत्ता पर काबिज दलों खासकर झामुमो और कांग्रेस के बीच जिस तरह से दूरियां बढ़ रही है वह किसी नए गुल के खिलने का संकेत दे रही है. यही वजह है कि सचिवालय, विधानसभा से लेकर पार्टी दफ्तरों में इस बात की चर्चा गरम है कि क्या अगला टारगेट झारखंड है.

झामुमो-कांग्रेस गठबंधन पर संकट के बादल

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राज्यसभा चुनाव के समय से ही कांग्रेस पार्टी झामुमो के रवैये से असहज महसूस कर रही है. कांग्रेस के विधायकों ने इस बाबत दिल्ली तक अपना दुखड़ा रोया था. राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के लाख कोशिश के बाद भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी चलायी. दिल्ली में सोनिया गांधी से मिलकर आने के बाद कांग्रेस की मांग को ख़ारिज करते हुए झामुमो ने राज्यसभा में अपना प्रत्याशी दिया और कांग्रेस मुंह ताकते रह गयी. झारखंड में जब से झामुमो, कांग्रेस और राजद गठबंधन की सरकार बनी है लगातार कांग्रेस के विधायक यह आरोप लगा रहे हैं कि अपनी ही सरकार में उनका काम नहीं हो रहा है. लेकिन कांग्रेस बार-बार अपने विधायकों को मना ले रही है.

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हर बार सरकार से आश्वासन मिलता है कि विधायकों की मांग पर काम होगा, नतीजा हमेशा सिफर रहता है. पिछले दिनों विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री के कक्ष में कांग्रेस विधायक दल की बैठक हुई थी. सूत्रों के अनुसार बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि झामुमो का रुख कांग्रेस के प्रति अच्छा नहीं है. कई विधायकों ने यह भी कहा था कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर जिस तरह से भाजपा और झामुमो में नजदीकियां बढ़ रही है वह कोई नया गुल न खिला दे. सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी फिलहाल इस तरह की आशंकाओं को खारिज करते हुए सबकुछ ठीक-ठाक होने का दावा कर रहे हैं. हालांकि, रांची और दिल्ली के सियासी गलियारों में झारखंड की ढाई साल पुरानी सरकार को लेकर कई तरह की अटकलें लग रही हैं. राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी की ओर से चला गया आदिवासी दांव इसकी एक बड़ी वजह है. एनडीए ने राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर द्रौपदी मुर्मू को उतारकर झारखंड में गठबंधन सहयोगियों में दरार पैदा कर दी है.

असल में झारखंड में आदिवासियों की बड़ी आबादी है और मुर्मू के नाम के ऐलान से पहले विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा का समर्थन करने वाली झामुमो आदिवासियों के नाम पर ही राजनीति करती रही है. ऐसे में उसके लिए झारखंड की राज्यपाल रह चुकीं मुर्मू के खिलाफ जाकर यशवंत सिन्हा के लिए वोट करना मुश्किल हो गया है. वहीं, कांग्रेस चाहती है कि सोरेन 2012 की तरह इस नैरेटिव को दरकिनार करके यशवंत का साथ दें. बता दें, उस समय झारखंड में बीजेपी और झामुमो की सरकार थी. बीजेपी ने राष्ट्रपति चुनाव में आदिवासी नेता पीए संगमा को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन झामुमो ने यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को वोट दिया था. सवाल किया जा रहा है कि यदि झामुमो ने 2012 में संगमा को दरकिनार किया था तो इस बार मुर्मू के खिलाफ क्यों नहीं जा सकती है? राजनीतिक जानकारों की मानें तो झामुमो के लिए मुर्मू के खिलाफ जाना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि सिबू सोरेन परिवार के साथ उनका रिश्ता पहले से काफी मधुर है.

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2012 में बदल गई थी सत्ता

2012 के राष्ट्रपति चुनाव के कुछ महीनों बाद ही झामुमो ने बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ लिया था और कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन के बाद शिबू सोरेन की पार्टी ने कांग्रेस के साथ सरकार बनाई थी. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर झारखंड में जो सिन बन रहा है उसको लेकर अटकलें लग रही हैं कि क्या एक बार फिर झारखंड में 10 साल पुराना इतिहास दोहराया जाएगा? 18 जुलाई को राष्ट्रपति का चुनाव है. अब देखना दिलचस्प होगा कि झामुमो इस चुनाव में कौन सा करवट लेता है. अभी तक झामुमो ने यह घोषणा नहीं की है कि उसका समर्थन द्रौपदी मुर्मू को रहेगा या यशवंत सिन्हा को लेकिन अंदरखाने यह तय है कि झामुमो राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के साथ जाएगा.

बिहार में भी पांच साल पहले हुआ था बदलाव

झारखंड के पड़ोसी राज्य बिहार में भी 5 साल पहले राष्ट्रपति चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन देखा गया था. 2017 में आरजेडी के साथ सरकार चला रहे नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को यह कहकर समर्थन दिया कि बिहार के राज्यपाल सर्वोच्च संवैधानिक पद पर जाएंगे. कुछ समय बाद ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन को छोड़कर दोबारा बीजेपी के साथ सरकार बना ली थी.

देवघर में झामुमो के पोस्टरों में मोदी का होना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी झारखण्ड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद पहली बार मंगलवार को झारखंड दौरे पर हैं. देवघर में वह एम्स और अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट का उद्घाटन किये. इस दौरान पहली बार यह देखने को मिला कि देवघर में झामुमो के पोस्टरों में सबसे बड़ी तस्वीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की है. राज्य सरकार द्वारा यदि प्रधानमंत्री की तस्वीर पोस्टरों पर लगाई जाती तो अलग बात थी लेकिन झामुमो के पोस्टरों में प्रधानमंत्री की तस्वीर से कांग्रेस बेचैन है.

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