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राजनीतिक हलकों में चर्चा,  बहन मायावती क्या 23 मई के बाद भाजपा के साथ गठबंधन कर लेंगी?

 बसपा सुप्रीमो मायावती क्या 23 मई के बाद भाजपा के साथ गठबंधन कर लेंगी? यह राजनीतिक हलकों में चर्चा बन गया है.

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NewDelhi :  बसपा सुप्रीमो मायावती क्या 23 मई के बाद भाजपा के साथ गठबंधन कर लेंगी? यह राजनीतिक हलकों में चर्चा बन गया है.  इसका प्रमाण पिछले दिनों सहारनपुर में देखने को मिला. बता दें कि वरिष्ठ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने एनडीटीवी के लिए लिखे ब्लॉग में दावा किया कि इस बात की चर्चा है कि मायावती भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ ही नही रही हैं.  मायावती ने सहारनपुर में आयेाजित रैली में मंच से मुस्लिमों से कांग्रेस के खिलाफ और महागठबंधन के पक्ष में वोट डालने की अपील कर डाली. लोगों का कहना है कि मायावती की इस अपील से मुस्लिमों का बंटवारा हो सकता है जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है. दूसरी ओर हिंदू वोटरों का बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण हो सकता है.

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2014 के लोकसभा चुनाव में जमकर ध्रुवीकरण हुआ था

बता दें कि लोकसभा चुनाव में पहले चरण की वोटिंग में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठअहम सीटों पर गुरुवार को वोट डाले गये.  2014 के लोकसभा चुनाव में इन सीटों पर जमकर ध्रुवीकरण हुआ था. नतीजतन भाजपा ने पूरे यूपी में विपक्ष को मटियामेट कर दिया था. यही हाल  2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी रहा.  लेकिन बाद में अंकगणित के एक फॉर्मूले ने धुर विरोधी सपा और बसपा को एक साथ आने पर विवश कर दिया. दोनों ने गठबंधन कर गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा का उपचुनाव जीत लिया. इसके बाद कैराना में सपा-बसपा-आरएलडी ने भी दोनों ने जीत दर्ज की.  इस लोकसभा चुनाव  में सपा-बसपा ने आपस में गठबंधन कर लिया और तीन सीटें आरएलडी के लिए छोड़ दीं. लेकिन न मायावती और न अखिलेश ने कांग्रेस को ज्यादा भाव दिया. मायावती का रुख कांग्रेस को लेकर कुछ ज्यादा ही सख्त है.

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मायावती को समझना इतना आसान नहीं है

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उधर कांग्रेस ने भी प्रियंका गांधी की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में सभी 80 सीटों पर प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया. लेकिन बात सिर्फ यहीं आकर खत्म नहीं हुई. जानकारों के अनुसार चार बार प्रदेश की सीएम रहीं मायावती को समझना इतना आसान नहीं है.  सपा-बसपा और आरएलडी के महागठबंधन के नेताओं की संयुक्त रैली सिर्फ सहारनपुर में हुई है और उसमें  मायावती ने मंच से मुस्लिमों से कांग्रेस के खिलाफ और महागठबंधन के पक्ष में वोट डालने की अपील कर डाली. जिसने विपक्ष के नेताओं को माथे पर पसीना ला दिया .    पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के अनुसार इस बात की भी चर्चा है कि जिस तरह की राजनीति आज तक बहन जी करती रही हैं, वह किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के साथ जा सकती हैं, जो 23 मई को आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा.

अखिलेश का कांग्रेस के प्रति रुख नरम है

वहीं जिस तरह से अखिलेश का कांग्रेस के प्रति रुख नरम है उस पर भी मायावती ने कहा है कि वह पूरी ताकत के साथ कांग्रेस पर हमला बोलें. मायावती कांग्रेस से क्यों इतना नाराज हैं इसकी कई बड़ी वजहें हैं. पहली बड़ी वजह है कि टीम प्रियंका इस समय उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों पर पूरी तरह से फोकस कर रही है. इस पर अभी मायावती का पूरा राज है जबकि इंदिरा गांधी के समय यह कांग्रेस का कोर वोट बैंक हुआ करता था. कांग्रेस का मानना है कि इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में जितनी ही सीटें मिल जायें वही बहुत हैं. पार्टी दलित और सवर्णों को अपने पाले में कर राज्य के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है. इसमें प्रियंका चेहरा बन जायें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी.

दूसरी ओर प्रियंका गांधी इसी कोशिश में भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद से भी मिल चुकी हैं. यह मायावती को नागवार गुजरा है. मायावती नहीं चाहती कि दलितों में उनके टक्कर का कोई नेता खड़ा हो जाए. तीसरा कभी उनके सबसे नजदीक रहे नसीमुद्दीन सिद्दकी को कांग्रेस ने चुनाव लड़ा दिया है. कुल मिलाकर जो समीकरण बन रहे हैं उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि अभी बहुत कुछ होना बाकी है. दूसरी कांग्रेस भी उनकी मांगे मानने को तैयार नहीं है.  माना जाता है कि मायावती कई नेताओं से कांग्रेस से रवैये की शिकायत कर चुकी हैं. स्वाति चतुर्वेदी के अनुसार  मायावती ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस नेता कमलनाथ से कहा, आप लोग हाथी पर सवार होकर आराम से दिल्ली पहुंच जाना चाहते हैं… मैं ऐसा नहीं होने दूंगी.

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