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झारखंड के युवा लेखक नीलोत्पल मृणाल के नोवल औघड़ पर वेब सीरीज बनायेंगे डायरेक्टर प्रेम मोदी

साहित्य अकेडमी युवा पुरस्कार से सम्मानित हैं मृणाल, निर्देशक प्रेम मोदी भी दुमका के हैं रहनेवाले

Naveen Sharma

Ranchi: झारखंड के नीलोत्पल मृणाल युवाओं के पसंदीदा उपन्यासकार हैं. उनके प्रथम उपन्यास ‘डार्क हॉर्स’ के लिए उन्हें सन 2016 के साहित्य अकेडमी युवा पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

उनके नये नोवेल औघड़ भी फिक्शन कैटेगरी में हिंदी के बेस्ट सेलर में शामिल रहा है. इसकी लोकप्रियता को देखते हुए फिल्म डायरेक्टर प्रेम मोदी ने इस उपन्यास पर वेब सीरीज बनाने का निर्णय लिया है.

वेब सीरीज का निर्माण Banner Funtime Entertainment और Epitome Production मिल कर कर रहे हैं. “औघड़” उपन्यास का प्रथम संस्करण जनवरी 2019 में हिंदी युग्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था. फिल्म डायरेक्टर प्रेम मोदी ने इस पर वेब सीरीज बनाने के लिए हिंदी युग्म से अधिकार खरीदने का कांट्रेक्ट किया है.

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ग्रामीण परिवेश को दिखानेवाला विशुद्ध यथार्थवादी उपन्यास

यह उपन्यास आदर्शवादी ना होकर विशुद्ध यथार्थवादी उपन्यास है जो पूर्णतः ग्रामीण परिवेश को लेकर रचा गया है. इस उपन्यास के माध्यम से निलोत्पल मृणाल ने एक आम ग्रामीण के विसंगतियों और विषमताओं से भरे जीवन की एक-एक परत को उधेड़ कर पाठकों के सम्मुख रखा है.

उपन्यास का केंद्र मलखानपुर और सिकंदरपुर गांव हैं. इन गांवों में ग्रामीणों की सामाजिक, राजनीतिक विसंगतियां, धार्मिक पाखंड, जाति-पाति, छुआछूत, महिलाओं की स्थिति, राजनीतिक अपराध, पुलिस और प्रशासन तथा सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था की नग्न तस्वीर प्रस्तुत करना उपन्यासकार का मूल उद्देश्य रहा है. भारतीय समाज में मुख्यत: उच्च, मध्यम और निम्न यही तीन वर्ग है.

इन तीनों वर्गों की मानसिक चेतना और उलझनों का लेखा-जोखा उपन्यास के प्रति कथाकार की निष्पक्षता को दर्शाता है. समय बदला, परिस्थितियां बदलीं और समाज में जागरूकता भी आई है. परंतु ग्रामीण समाज का एक वर्ग अभी भी उपेक्षित है.

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अपने अधिकारों के लिए लड़ता है मुख्य पात्र बिरंची

‘औघड़’ उपन्यास का मुख्य पात्र बिरंची है. जो शिक्षित दलित है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है. वह जीवनपर्यंत समाज में दलितों को उनका सम्मानीय स्थान दिलाने के लिए संघर्ष करता है.

उसका यह संघर्ष पूंजीपति सवर्णों, पुलिस,और प्रशासन की तिकड़ी से होता है. वह लड़ता है, गिरता है, उठता है और पूरे दलित समाज को दिशा तथा दृष्टि देने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है.

सार रूप में हम कह सकते हैं कि अगर उपन्यास में एक ओर दलितों की सामाजिक स्थिति का वर्णन किया गया है तो दूसरी ओर बिहार और झारखंड के चुनावों में बाहुबलियों के प्रभुत्व को भी दर्शाया गया है. इसमें प्रेमचंद का यथार्थवाद है तो फनीश्वर नाथ रेणु के उपन्यासों की आंचलिकता भी है.

जानकारी हो कि फिल्म निर्देशक प्रेम मोदी इससे पहले फनीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास पर पंचलैट फिल्म बना चुके हैं. यह फिल्म दूरदर्शन पर भी दिखायी जा चुकी है.

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