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कांग्रेस में अंतर्कलह: चुनाव में कई लोगों ने की पार्टी विरोधी गतिविधि, कार्रवाई सिर्फ लोहरदगा में!

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प्रदेश कांग्रेस में विरोध के स्वर, अनुपमा भगत को बाहर करने के कदम को गलत बता रहे कांग्रेसी

Ranchi :  झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अंदर एक बार फिर विरोध की आवाज उठती दिख रही है. यह विरोध प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव के लिए फैसले से उठ रही है. दरअसल पूर्व कांग्रेसी नेता सुखदेव भगत की पत्नी को पार्टी से छह साल के लिए बाहर कर दिया गया है. रामेश्वर उरांव के इस फैसले से पार्टी के अंदर भारी नाराजगी है. दरअसल सुखदेव भगत की पत्नी अनुपमा भगत, जो अभी लोहरदगा नगर परिषद की अध्य़क्ष हैं, पार्टी से उनके निष्कासन को एक तरफा कार्रवाई शीर्ष नेताओं पर सवाल खड़े कर रही है.

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वहीं प्रदेश मुख्यालय में बैठने वाले कई पार्टी नेता भी इस कदम से नाराज बताये जा रहे हैं. इनका कहना है कि चुनाव के दौरान कई नेताओं ने पार्टी के खिलाफ काम किया था, तो कार्रवाई केवल लोहरदगा जिला में ही क्यों. इन नेताओं का कहना है कि भले ही निष्कासन के आदेश पर प्रदेश अध्य़क्ष का हस्ताक्षर नहीं है.

लेकिन पार्टी छोड़ बीजेपी का दामन थामने वाले सुखदेव भगत और रामेश्वर उरांव के बीच का संबंध किसी से छिपा नहीं है. गौरतलब है कि 3 जनवरी को प्रदेश कांग्रेस अनुशासन समिति के अध्य़क्ष तिलकधारी सिंह की सहमति और प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अनुमोदन के बाद ही अनुपमा भगत सहित कई कार्यकर्ताओं को पार्टी की सदस्यता से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया है.

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सूची मांगने से पहले केवल लोहरदगा जिला में ही कार्रवाई क्यों

प्रदेश अध्य़क्ष रामेश्वर उरांव के निर्णय को गलत बताते हुए कार्यकर्ताओं का कहना है कि विधानसभा चुनाव में कई नेताओं ने पार्टी नियम से बाहर होकर चुनाव लड़ा था, या अधिकृत पार्टी प्रत्याशियों को कोई मदद नहीं की थी. ऐसे में केवल लोहरदगा जिला के नेताओं पर क्यों कार्रवाई की गयी.

विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि सभी जिलाध्यक्षों से वैसे नेताओं के नामों की सूची मांगी गयी है. जिसने चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी कदम उठाया है. तो सूची मांगने से पहले ही केवल लोहरदगा जिला में क्यों कार्रवाई की जा रही है.

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क्या गठबंधन सरकार होने के नाते सरफराज अहमद पर नहीं हो रही कार्रवाई?

नाराज कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर कार्रवाई करना ही था, तो सबसे पहले कांग्रेस की बगावत कर जेएमएम में शामिल हुए सरफराज अहमद पर करना चाहिए था. लेकिन साफ है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे अहमद पर कार्रवाई नहीं करने के पीछे गठबंधन सरकार एक प्रमुख कारण है.

दरअसल टिकट नहीं मिलने पर डॉ. सरफराज अहमद ने संकेत दिया था कि अगर उन्हें गांडेय सीट से प्रत्याशी नहीं बनाया गया, तो वे निर्दलीय चुनाव भी लड़ सकते है. गठबंधन में गांडेय सीट जेएमएम खाते में जाने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला भी कर लिया था.

लेकिन जब जेएमएम से उन्हें टिकट दे दिया गया  तो उन्होंने कांग्रेस का ही साथ छोड़ दिया. बाद में वे जेएमएम के टिकट पर गांडेय सीट से चुनाव भी जीते. लेकिन इसके बावजदू डॉ सरफराज अहमद पर अभी तक कार्रवाई नहीं की गयी है.

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दो कार्यकारी अध्यक्षों की भूमिका भी संदेह के घेरे में

नाराज नेताओं का कहना है कि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के वर्तमान दो कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका भी संदेह के घेरे में थी. एक अध्यक्ष ने तो भवनाथपुर सीट से आजसू की टिकट पर चुनाव लड़ने का मन भी बना लिया था.

लंबे समय से इस सीट पर काम करने के बाद जब उन्हें टिकट नहीं मिला, तो वे इतने नाराज हो गये कि आजसू के सिंबल पाने की कोशिश उन्होंने की. बताया जा रहा है कि उनको आजसू की तरफ से सिंबल तो मिला था, लेकिन वह नामांकन भरने के दौरान पार्टी सिंबल उनके पास पहुंच नहीं सका.

बाद में उन्होंने यह भी कहा था कि वे आजसू समर्थित प्रत्याशी हैं. ऐसे में पार्टी के अंदर सवाल उठ रहा है कि जब कांग्रेस प्रेम से अलग उन्होंने आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ने तक की पहल कर दी, तो उनपर कार्रवाई क्यों नहीं की गयी.

सूत्रों का यह भी कहना है कि उस कार्यकारी अध्यक्ष को टिकट दिलाने में कांग्रेस छोड़ आजसू में शामिल हुए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू प्रमुखता से रोल निभा रहे थे.

इसी तरह बोकारो सीट पर पार्टी प्रत्याशी के चुनाव लड़ने में उसी क्षेत्र के एक कार्यकारी अध्य़क्ष की भूमिका भी काफी संदेह के घेरे में थी. पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में वे कहीं भी नहीं दिखे.

बोकारो सीट पर ही कांग्रेसी नेता संजय सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की बात कहकर ही बगावत का संकेत दिया था. इस सीट पर पार्टी ने पहले संजय सिंह को टिकट दिया था. लेकिन जब इसका विरोध होने लगा, तो उनकी जगह श्वेता सिंह को टिकट दे दिया गया.

इससे नाराज संजय सिंह ने कह दिया कि वे बोकारो विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे और साथ ही कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य और अपने पद से इस्तीफा पत्र पार्टी को सौंपेंगे.

हटिया प्रत्याशी को क्षेत्र के तीन नेताओं का नहीं मिला समर्थन

हटिया सीट पर चुनाव लड़ रहे अजय नाथ शाहदेव ने अपने निकटमतम प्रतिद्वंदी नवीन जायसवाल को कड़ी टक्कर दी थी. लेकिन उसके बावजूद कांग्रेसी नेताओं को चुनाव हारना पड़ा. उनकी हार के पीछे का एक प्रमुख कारण क्षेत्र के तीन नेताओं का उन्हें समर्थन नहीं मिलना भी है.

इसमें एक प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह के एक विरोधी बताये जा रहे हैं, तो दो नेताओं में एक आरपीएन के निकट समर्थक है, तो दूसरे प्रदेश अध्य़क्ष रामेश्वर उरांव के.

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