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धर्मकोड के लिए आ रहे अलग-अलग नाम, डॉ मिंज ने बताया ये सरल समाधान

सरना धर्मकोड के आंदोलन पर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर से खास बातचीत

Ranchi : देश के आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपने लिए अलग कोड की मांग को लेकर आंदोलनरत है. झारखंड में इसे लेकर ज्यादा उबाल है. अभी अलग-अलग नामों को लेकर धर्मकोड की मांग हो रही है. डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अभय सागर मिंज ने कहा कि इसका एक सरल समाधान है. जिस प्रकार भारत के 732 से भी अधिक जनजातियां स्वयं को पहले अनुसूचित जनजाति के अन्तर्गत रखती हैं और बाद में अपनी उपजाति के स्थान पर उरांव, मुंडा, हो, गोंड, भील, संथाल, नागा इत्यादि का प्रयोग करती हैं ठीक उसी प्रकार भारत के सारे प्राकृतिक (आदिवासी) धर्म को मानने वाले आदिवासी अपने उप धर्म सरना, जाहेर, गोंडी, भीली, कोया पुनेम इत्यादि लिख सकते हैं.

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एक नाम पर बनानी होगी सहमति

जहां तक कोड के लिए मुख्य धर्म की शब्दावली की बात है, तो सभी आदिवासी समाज को एकजुट होकर एक नाम पर सहमति बनानी होगी. चाहे वह आदि धर्म हो या कोया पुनेम या फिर सरना धर्म या आदिवासी धर्म. आदिवासियों को धार्मिक पहचान के संघर्ष में एकजुट होना होगा. अभी जो समय की मांग है, वह एक वृहद् सामाजिक आंदोलन की है. कुछ समय के लिए राजनैतिक आंदोलन को दरकिनार करना होगा.
डॉ अभय सागर मिंज ने कहा कि निश्चित ही सामाजिक आंदोलन को राजनैतिक आंदोलन का संपूरक बन के साथ चलना चाहिए. वर्षों से सामाजिक आंदोलन और राजनैतिक आंदोलन साथ-साथ चले किंतु बहुत सार्थक परिणाम देखने को नहीं मिला. इस विषय पर मंथन आवश्यक है.

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सामाजिक आंदोलन से बनेगी बात

डॉ मिंज ने कहा कि अनेक अध्ययनों में देखा गया है कि जहां राजनैतिक उद्देश्य की बात होती है वहां समाज विभाजित हो जाता है, चाहे वह कोई भी समाज हो और कोई भी राजनैतिक दल हो. इसलिए मैंने ज़ोर दिया है कि अभी भारत के सभी आदिवासियों को सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है और सामाजिक प्रतिनिधि करने वालों को भी एक नि:स्वार्थ प्रयास करना होगा.
सामाजिक हित में व्यक्तिगत आकांक्षाओं को त्यागना होगा. तभी कुछ सार्थक परिणाम होंगे अन्यथा ये संघर्ष आपके बाद भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहेंगे जब तक आदिवासी पूरी तरह मिट नहीं जाते.

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