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गुजरात दंगों पर मोदी को लेकर अटल-आडवाणी के बीच हुए थे मतभेद

फरवरी 2002 में गोधरा कारसेवकों से जुड़ी घटना के बाद गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की थी.  इस घटना के कारण विरोधी पार्टियों ने मोदी के त्यागपत्र की मांग कर दी थी.

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NewDelhi : गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से इस्तीफा मांगने को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के बीच मतभेद हो गये थे.  आडवाणी ने अपने एक ताजा लेख में यह बात कही है. आडवाणी ने साहित्य अमृत पत्रिका के अटल स्मृति अंक में अपने लेख एक कवि हृदय राजनेता में ऐसे दो उदाहरण दिये हैं जब अटलजी और उनके बीच मतभेद उत्पन्न हुए थे.  एक विषय तब का है जब फरवरी 2002 में गोधरा कारसेवकों से जुड़ी घटना के बाद गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की थी.  इस घटना के कारण विरोधी पार्टियों ने मोदी के त्यागपत्र की मांग कर दी थी. बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी से अपनी घनिष्ठ मित्रता का जिक्र करते हुए आडवाणी ने लिखा हे कि भाजपा और   राजग में कुछ लोग सोचने लगे कि मोदी को पद छोड़ देना चाहिए, फिर भी इस विषय पर मेरा विचार बिल्कुल अलग था.  मेरी राय में मोदी अपराधी नहीं थे बल्कि वे स्वयं राजनीति के शिकार हो गये थे .  इसलिए मैंने अनुभव किया कि एक वर्ष से भी कम समय पहले मुख्यमंत्री बने मोदी को जटिल साम्प्रदायिक स्थिति का शिकार बनाना अन्यायपूर्ण होगा.

अटलजी के मन पर काफी बोझ था

आडवाणी के अनुसार इस परिस्थिति का अटलजी के मन पर काफी बोझ था.  मोदी से इस्तीफा मांगने के लिए उन पर दबाव डाला जाने लगा था.  आडवाणी ने लिखा है कि 2002 में गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में जब जसवंत सिंह ने पूछा कि अटलजी आप क्या सोचते हैं, तो अटलजी ने कहा कि कम से कम मोदी इस्तीफे का आफर तो करते.  आडवाणी ने कहा, तब मैंने कहा कि अगर नरेंद्र के पद छोड़ने से गुजरात की स्थिति में कुछ सुधार आता है तो चाहूंगा कि उन्हें इस्तीफा देने को कहा जाये, लेकिन मैं नहीं मानता कि कि इससे कुछ मदद मिल पायेगा.  अपने लेख में इस घटनाक्रम को विस्तार से बताते हुए आडवाणी ने कहा कि इस बारे में उन्होंने नरेंद्र मोदी से बात की कि उन्हें इस्तीफा देने का प्रस्ताव रखना चाहिए और वह तत्परता से मेरी बात मान गये .

सभागार में इस्तीफा मत दो के स्वर गूंज उठे

जब मोदी ने त्यागपत्र देने की बात कही तब सभागार में इस्तीफा मत दो के स्वर गूंज उठे.  इस प्रकार इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर बहस का अंत हो गया.  आडवाणी ने कहा कि एक अन्य घटना तब की है जब अयोध्या आंदोलन के समय अटलजी को भाजपा के इससे सीधे जुड़ने पर आपत्ति थी.  लेकिन धारणा और स्वभाव से लोकतांत्रिक होने के नाते हमेशा साथियों के बीच सर्वसम्मति लाने को इच्छुक होने के कारण अटलजी ने पार्टी का सामूहिक निर्णय स्वीकार किया. अपने लेख में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि अटल युग सबको शामिल करने वाले दृष्टिकोण के लिए जाना गया, जहां विचारों का अंतर हो सकता था लेकिन अाखिर में आम सहमति होती थी.

जोशी ने लिखा कि अटलजी ने देश को उस जड़ता की स्थिति से निर्णायक ढंग से बाहर निकाला जिसमें वह दशकों से जकड़ा हुआ था.  अटलजी के युग को उनकी नीतियों और कार्यक्रमों के कारण भारत के विकास को तेजी से आगे बढ़ाने वाला माना जाता है जिसके परिणामस्वरूप भारत की जीडीपी आठ प्रतिशत की स्थिर दर से बढ़ती चली गयी.

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