न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

आग के नीचे सोते हैं, सुबह भगवान को शुक्रिया अदा करते हैं झरिया की आग से प्रभावित लोग

कहां पति-पत्नी रहें, कहां अपने मां-बाप को कोई रखे और कहां अपने जवान होते बच्चे को

61

Dhanbad : काला हिरा अर्थात कोयला, जिसके बलबूते  हमारे देश की उद्योग -व्‍यवस्था फल-फुल रही है. लेकिन आज यही काला हीरा झरिया के लोगों के लिए वरदान नहीं, अभिशाप बनता जा रहा है. आग के ऊपर बसे  लोगों की जिंदगी हरेक रात के बाद एक नयी सवेरा लेकर आती है. आग पर बसे लोग रात  गुजारने के बाद सुबह उठते हैं, तो भगवान को धन्यवाद देते  हैं कि फिर से आज नयी जिंदगी मिली है. क्योंकि भूमिगत आग ने कई लोगों काे जिंदा निगल गयी, तो कई बसी बसायी बस्तियों को उजाड़ दी है. जिनमें झरिया का भगतडीह,बोका पहाड़ी,बागडिगी, लालटेनगंज जैसे इलाके आज नक्शे से गायब हो चुके हैं. लेकिन धनबाद के जनप्रतिनधि भूमिगत आग के ऊपर  गुजार रहे लोगों को सिर्फ अपना वोट बैंक समझते हैं. सिर्फ चुनाव के समय ही उन्हें इनकी याद आती है.

मिले आवास इंसान के रहने लायक नहीं 

कभी कोयला राजधानी के नाम से गुलजार रहने वाली झरिया नगरी आज भूमिगत आग के लिए  पूरे एशिया में  मशहूर है.  पिछले 100 वर्षों से  धधकती आग ने  झरिया और उसके आस-पास के क्षेत्रों को पूरी तरह तबाह कर दिया है. फिलहाल अभी जो लोग आग के पास रह रहे हैं, यह उनकी जिद ही है. वे जानते हैं कि जब तक उनका घर आग में घिर न जाए, तब तक वे अपनी जगह नहीं छोड़ सकते, क्योंकि अपनी जगह को पूरी तरह से छोड़ देने का मतलब है, दो वक्त की रोटी पर भी आफत है. लोगों की यह राय  यूं ही नहीं की अब तक भूमिगत आग का हवाला  देकर जिनलोगों को विस्थापित किया गया है, उनके सामने बेरोजगारी मुंह बाए  तैयार  है. विस्थापन  को लेकर अग्नि प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जो राय है वो बेहद ही चौकाने वाले है.

एशिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना फेल

लोग वर्तमान विस्थापन नीति से खासे नराज हैं. इस नीति के तहत जिन लोगों का विस्थापित किया जाता है. उन्हें धनबाद के  बलियापुर प्रखंड के सदूरवर्ती क्षेत्र  बेलगाड़िया में बने नौ बाई दस का एक कमरा और 10 बाई छह का मकान आवंटित किया जाता है. वो इंसानों के रहने लायक नहीं. जिन लोगों को यह आवास आवंटित किया गया उनके अनुसार उनकी पूरी दुनिया इसी में सिमट कर रह गयी है. कहां पति-पत्नी रहें, कहां अपने मां-बाप को कोई रखे और कहां अपने जवान होते बच्चे को. वहींं विस्थापन को लेकर जो सरकारी दावे किये जा रहे कि धनबाद के अग्नि प्रभवित लोगों के लिए जिस विस्थापन नीति के तहत पुनर्वासित किया जा रहा  है, वो एशिया की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना  है. लेकिन इस योजना का जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी ब्यां करती है.

10 सालों में मात्र 3,200 लोगों को बसाया गया

बेलगढ़िया में  आनन-फानन में लोगों को बसाए जाने की भी अपनी कहानी है. झरिया में आग का खेल 100 वर्षों से जारी है. इस पर गंभीरता से पहली बार बात 1997 में शुरू हो सकी थी. वह भी स्वेच्छा से नहीं बल्कि, तत्कालीन सांसद हराधन राय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पीआइएल दायर करने के बाद उसी पीआइएल की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने झरिया की आग को ‘राष्ट्रीय त्रासदी’ घोषित किया और आदेश दिया गया कि लोगों को बसाने के लिए योजना बने और कोर्ट को प्रगति रिपोर्ट भी दी जाये. उस आदेश के बाद ही योजना बन सकी. नतीजा, आनन-फानन में कोरम पूरा करने के लिए बेलगढ़िया बनाया और बसाया जा सका. अभी तक 10 सालों में मात्र 3,200 लोगों को बसाया गया है. अभी बहुत ऐसे लोग हैं जिनका सर्वे तो हो गया है, लेकिन पुनर्वासित नहीं किया गया है. जिसके कारण मजबूरन धधकते आग के ऊपर लोग रहने को बेवस हैं.

इसे भी पढ़ें : #Dumka: दो बार हार चुके सुनील सोरेन पर बीजेपी जतायेगी भरोसा या लुईस मरांडी होंगी नया चेहरा!

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Comments are closed.

%d bloggers like this: