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धनबाद : निजी आउटसोर्सिंग कंपनियां वरदान या अभिशाप?

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Kameshwar

Dhanbad : खनन उद्योग को इस राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जा सकता है. लेकिन, इस खनन उद्योग को उचित तरीके से नियंत्रित करने, अनुश्रवण करने एवं दिशा दर्शाने के लिए राज्य के पास कोई दिशा-निर्देश नहीं है. यह खनन उद्योग राज्य के लिए एक अभिशाप बनकर उभर रहा है. खनन अत्यधिक लाभकारी कार्य है, पर गलत खनन नीतियों और नियमों की अनदेखी करने का परिणाम यह है कि निजी आउटसोर्सिंग कंपनियां एक ओर सरकारी राजस्व में वृद्धि कर रही हैं, तो दूसरी तरफ हमारे आस-पास के वातावरण में जहर  भी घोल रही हैं.

कोयला नगरी धनबाद में कैसे दस्तक दी निजी आउटसोर्सिंग कंपनियों ने

झरिया में कोयला खदान आग की लौ से धधक रही है. जलते कोयले की परत एकदम लाल है. एक तरफ आग की लपटें आसमान को छूने को बेताब हैं, तो दूसरी तरफ जलते कोयले के धुएं ने एक बड़े इलाके को अपनी आगोश में ले रखा है. झरिया फायर प्रोजेक्ट के सबसे अधिक फायर वाले राजापुर प्रोजेक्ट का हर नजारा शरीर में सिहरन पैदा कर देता है. फायर प्रोजेक्ट की गहराती रात में मशीनें शोर मचा रही हैं. 80 से 200 डिग्री सेल्सियस से अधिक के तापमान में कोयला मजदूर जलते कोयले की दीवारों को चीर रहे हैं. चेहरा लाल है और शरीर पसीने से लथपथ. कुछ कदमों की दूरी पर कभी राख गिर रही है, तो कभी कोयले के अंगारे. रूह कंपा देनेवाले इस नजारे के बीच दिन-रात खनन जारी है. धधकते 1864 मिलियन टन कोयले को बचाने के लिए  दिन-रात निजी कंपनियों द्वारा खनन जारी है.

धनबाद : निजी आउटसोर्सिंग कंपनियां वरदान या अभिशाप?

1916 में गलत माइनिंग से लगी आग

गलत माइनिंग से साल 1916 में आग लगी. सुरंग बनाकर खनन की प्रक्रिया अवैज्ञानिक थी, जिसे आजादी के बाद निजी कोल मालिकों ने जारी रखा. कोयले का गुण है जलना. अगर एक तय समय में कोयले को नहीं निकाला जाये तो वह स्वतः जल उठेगा. झरिया व आस-पास की खदानों में 45 प्रतिशत कोयला जमीन के अंदर ही रह गया. अंदर के तापमान ने इन्हें जलने का मौका दिया. कोयला धधक उठा. साल 1916 में भौरा कोलियरी में आग लगने का पहला प्रमाण मिला था, जिसके बाद से अग्नि प्रभावित क्षेत्रों से कोयला उत्खनन करने के लिए निजी आउटसोर्सिंग कंपनियों को बढ़ावा दिया जाने लगा. उस समय से निजी आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा अग्नि प्रभवित क्षेत्रों से कोयला उत्खनन की होड़ ने वातावरण में जहर उगलना शुरू कर दिया.

धनबाद : निजी आउटसोर्सिंग कंपनियां वरदान या अभिशाप?

कोयला उद्योग के निजीकरण के बाद साल 1986 में पहली बार आग का सर्वे कराया गया. सर्वे में 17 वर्ग किमी क्षेत्र जमीनी आग से जलता हुआ मिला. हुआ कुछ यूं कि तय समय पर नहीं निकाले गये 45 प्रतिशत कोयले की अलग-अलग सीम में आग लगी. माइंस की सुरंग के रास्ते हवा मिली. कंबाइंड सीम (एक-दूसरे से जुड़ी सीम) होने के नाते आग धीरे-धीरे फैलती गयी. आग से बचाव के लिए बालू भराई की गयी, पर वह सफल नहीं रही. पर, जिस तरह कोयला उत्खनन कर रहीं कंपनियां एक ओर भूमिगत आग से प्रभावित कोयले का उत्खनन कर रही हैं, तो दूसरी ओर कोयला उत्खनन के दौरान होनेवाले प्रदूषण से पूरे झरिया क्षेत्र को देश का सबसे प्रदूषित शहर घोषित कर दिया गया है.

धनबाद : निजी आउटसोर्सिंग कंपनियां वरदान या अभिशाप?

झरिया के देश के सबसे प्रदूषित शहर बनने के लिए आउटसोर्सिंग कंपनियां जिम्मेदार

ग्रीनपीस इंडिया की वार्षिक रिपोर्ट में जो तथ्य आये हैं, वे बेहद ही चौंकनेवाले हैं. इस संस्था के तीसरे संस्करण में झरिया को वायु प्रदूषण के मामले में देश का सबसे प्रदूषित शहर घोषित किया गया है. संस्था द्वारा देश के 319 शहरों में वायु प्रदूषण का सर्वेक्षण किया गया था. इस सूची में धनबाद नौवें स्थान पर है. सूची में साल 2017 में शहरों का औसत पॉर्टिकल मैटर (पीएम) 10 दर्ज किया गया. झरिया का औसत पीएम 10 स्तर 295 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा. यह देश भर में सबसे अधिक है. वहीं, धनबाद का पीएम 10 स्तर 238 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया. रिपोर्ट में रांची का पीएम 10 स्तर 142 माइक्रोग्राम, सिंदरी 158 माइक्रोग्राम, सरायकेला व जमशेदपुर 131 माइक्रोग्राम और पश्चिमी सिंहभूम 77 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रिकॉर्ड किया गया. संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) शहरों का प्रदूषण स्तर 30 प्रतिशत भी कम करने में सफल होता है, तब भी झरिया, धनबाद, रांची, सिंदरी जैसे शहर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता के मानकों को पूरा ही नहीं करेंगे. 2024 तक इन शहरों का प्रदूषण 30 प्रतिशत कम होने पर भी झारखंड के ज्यादातर शहर राष्ट्रीय मानक से अधिक प्रदूषित हवा की चपेट में होंगे. उन्होंने कहा कि एनसीएपी में 2015 के डाटा के आधार पर शहरों को शामिल किया गया है. पर्यावरण मंत्रालय 2017 के डाटा के आधार पर रांची, धनबाद सहित कई शहरों को वायु प्रदूषण की दृष्टि से देश के अयोग्य शहरों की सूची में शामिल कर एनसीएपी के तहत काम किया जाना चाहिए. अगर इस रिपोर्ट को आधार मानकर आंतरिक मंथन किया जाये, तो कहीं न कहीं झरिया को देश का सबसे प्रदूषित शहर बनाने में निजी आउटसोर्सिंग कंपनियां जिम्मेदार हैं. आज झरियावासी अपने शहर के ऊपर लगे देश के सबसे प्रदूषित शहर का दाग मिटाने के लिए लगातार आंदोलनरत है, जबकि इस मामले पर जनप्रतिनिधि चुप्पी साधे हुए हैं.

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