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धनबाद नगर निगम की दो करोड़ रुपये की जमीन पर दबंगों का कब्जा.. इसे खाली कौन कराएगा?

क्या फिर आएगा कोई रमेश घोलप

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Dhanbad: धनबाद नगर निगम में आए अबतक के सबसे कड़ियल नगर आयुक्त रमेश घोलप ने जब सिटी सेंटर की जमीन नाप दी तो मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल तिलमिला गये. उनको फौरन धनबाद से चलता किया. वह रहते तो निगम आज जनता की गाढ़ी कमाई से उगाहे जानेवाले टैक्स के पैसों की महज कमीशन के लिए होनेवाले अनाप-शनाप काम के नाम पर लूट का अखाड़ा नहीं बनता.

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रमेश घोलप ने सिटी सेंटर की नापी कर लूट-खसोट में लगे लोगों के लिए खतरे की घंटी बजा दी थी. उन्होंने अपनी इस कार्रवाई से अपनी कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल पेश की जिसका शायद ही दूसरा उदाहरण मिले.

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सिटी सेंटर और मेयर के रिश्ते से सभी वाकिफ

अखबार में छपा विज्ञापन

धनबाद के लोगों को अच्छी तरह से मालूम है कि धनबाद नगर निगम के मेयर से सिटी सेंटर का क्या संबंध है. लोग जानते हैं कि मेयर का सिटी सेंटर से व्यापारिक ताल्लुकात है. इस रिश्ते पर प्रकाश डालता है, बिजली विभाग का अखबारों में छपा ताजा इश्तेहार. जिसमें चंद्रशेखर अग्रवाल की पत्नी, पता: सिटी सेंटर के नाम से 90 हजार रुपये सेअधिक बिजली बिल बकाया होने का उल्लेख है.

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मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल को पता है कि नगर पालिका के समय से ही इसके ट्रेंचिंग ग्राउंड की करीब 20 एकड़ जमीन पर दबंगों ने कब्जा जमा रखा है. मगर अपने ऊपर तक प्रभाव के लिए पहचाने जानेवाले मेयर ने इस सिलसिले में कभी कोई पहल नहीं की.

कहां कितनी जमीन पर है कब्जा

हीरापुर ट्रेचिंग ग्राउंडः 5.275 एकड़ जमीन

धनबाद ट्रेचिंग ग्राउंडः 4.07 एकड़ जमीन

मनयीटांड़ ट्रेचिंग ग्राउंडः 7.36 एकड़ जमीन

रिफ्यूजी मार्केट स्थित डंपिंग ग्राउंडः 2.99 एकड़ जमीन

सभी जमीन जिन इलाकों में है वहां जमीन का न्यूनतम पांच से पंद्रह लाख रुपये तक प्रति कट्ठा रेट चल रहा है. निगम की इन सभी जमीन पर दबंगों का अवैध कब्जा है. इन जमीनों पर बड़े बंगले, अपार्टमेंट से लेकर अन्य तरह के अवैध निर्माण हैं.

मामले का दिलचस्प पहलू, यह है कि इन जमीनों पर अवैध कब्जा करनेवालों को निगम हर तरह की सुविधा मुहैया करा रहा है. सड़क, स्ट्रीट लाइट, नाली, पानी आदि की सुविधाएं अवैध कब्जाधारियों को हासिल है. इनको होल्डिंग नंबर भी मिला हुआ है.

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1990 में निकला था नोटिस

धनबाद नगर निगम की बेशकीमती जमीन पर अवैध कब्जा जमाये कई लोग नगरपालिका के समय में इसके वॉर्ड कमिशनर, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष तक बने. ऐसे में इन दबंग लोगों का कब्जा हटाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता है. एक बार सन 1990 में स्थानीय अखबार में नगरपालिका ने इन अवैध कब्जावाली जमीन का विवरण एक विज्ञापन के माध्यम से देकर स्वामित्व का दावा किया था. अवैध कब्जा हटा लेने को कहा था. नहीं तो समुचित कार्रवाई और बल प्रयोग की बात कही थी.

मगर, बाद में यह नोटिस कागजी खानापूर्ति भर ही साबित हुआ. नगरपालिका नगर निगम बन गया तो जमीन पर अवैध कब्जे का कभी किसी ने जिक्र तक नहीं किया. बात किसी एक की नहीं है. निगम की संपत्ति की लूट में सभी हिस्सेदार हैं. इसलिए कोई जुबान नहीं खोलता. यह निगम और इसके प्रतिनिधि जनता का भला करेंगे? यह सोचने की बात है.

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