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देश के बड़े अपराधियों का धनबाद बन गया है ठिकाना

 माधव की गिरफ्तारी ने इसे फिर साबित किया

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Dhanbad : बोकारो के सिटी सेंटर स्थित स्टेट बैंक आफ इंडिया के लाकर से करीब 80 करोड़ की संपत्ति गायब कर देनेवाले अपराधी धनबाद के ही थे. यहीं से लाकर तोड़ने का सारा सामान एक आटो पर लेकर धनबाद-बोकारो मुख्य मार्ग से गये थे. फिर काम करके चार घंटे बाद इधर से ही लौटे. धनबाद पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी. 25 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धनबाद आगमन से दो दिन पहले गिरिडीह पुलिस धनबाद शहर के नया बाजार में स्थित एक होटल से दो हार्डकोर नक्सली को गिरफ्तार कर अपने साथ ले गयी. इनमें चिलखारी कांड का आरोपी जीतन मरांडी था. उसपर 20 लोगों की हत्या का आरोप है.

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धनबाद राष्ट्रीय, अतर्राष्ट्रीय अपराध के नक्शे में महत्वपूर्ण

जीटी रोड और सुगम रेल नेटवर्क के साथ कोयलानगरी होने के कारण अपराध के नेटवर्क से हमेशा जुड़ा रहा है. देश के बड़े डान ब्रजेश सिंह, हाल ही मारे गये मुन्ना बजरंगी, शहाबुद्दीन, मुख्तार अब्बास अंसारी आदि का धनबाद कोलफील्ड के दबंगों से संबंध जगजाहिर है. मुंबई का पुराना डान रहा हाजी मस्तान का भी धनबाद से संबंध था. वह कई मौके पर धनबाद आए. अस्सी के दशक में धनबाद में जब वर्चस्व के लिए हत्याएं आम थी तब यहां हुई कुछ हत्याओं में चंबल के दस्युओं के शामिल होने की बात कही गयी थी.

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देशद्रोही साजिशों का भी केंद्र

धनबाद हमेशा से देशद्रोही साजिशों का भी केंद्र रहा है. चाहे 70 के दशक मे नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ. चारू मजूमदार का नक्सली आंदोलन हो या 80 के दशक में शुरू हुआ माओवादी आंदोलन दोनों का केंद्र धनबाद बना. चारू मजूमदार के समय का नक्सली आंदोलन धनबाद शहर में धमाका कर रहा था तो किसान संग्राम समिति के नाम से शुरू हुआ नक्सली आंदोलन टुंडी के जंगल में सुलगा.

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जब पकड़ा गया था नक्सली शीर्ष नेता

बिहार और झारखंड की स्पेशल टीम ने सन 2008 के 14 मई को धनबाद के बिनोद नगर से माओवादी के शीर्ष नेता प्रमोद मिश्रा उर्फ बिहारी मिश्रा को गिरफ्तार कर चौंका दिया था. संगठन में गणपति के बाद इसी का स्थान था. इससे पहले रोहतास के डाकुओं को धनबाद की कनकनी के ठिकाने से गिरफ्तार कर इनकाउंटर किया गया तो लोग चौंके थे.

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पंजाब के आतंकियों की भी गतिविधि का केंद्र रहा

धनबाद पंजाब के आतंकवादियों की गतिविधि का भी केंद्र बना था. धनबाद और इसके आसपास के इलाकों में पंजाब के आतंकियों ने कयी वारदातों को अंजाम दिया. 3 जनवरी 1991 को धनबाद में बिनोद मार्केट स्थित बैंक आफ इंडिया हीरापुर ब्रांच में हुई वारदात सबसे बड़ी थी, जिसे पंजाब के आतंकवादियों ने अंजाम दिया था. इस बैंक में डाका डालने धमके आतंकियों से मुठभेड़ में धनबाद के जांबाज एसपी रणधीर प्रसाद वर्मा शहीद हो गये. अफसोस कि इस बड़ी वारदात के बाद भी धनबाद को देश की बड़ी अपराध नगरी के रूप में विकसित होने से रोकने की कभी बड़ी रणनीति बनाकर ठोस पहल नहीं की गयी. उलटे अपराधियों और पुलिस की साठगांठ ही बढ़ती रही, इसलिए कि यह उनके लिए मुनाफे का सौदा है.

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अपराध की कमाई के कारण ही थानों की होती रही नीलाम

यहां एक एक थाने की कीमत निर्धारित है. यह पुलिस मैंस एसोसिएशन ने बार बार दुहराया है. तब सबसे ज्यादा कीमत मैथन ओपी की थी. अस्सी का दशक था, कांग्रेस का शासन था. तब पटना से प्रकाशित नवभारत टाइम्स के संपादक दीनानाथ मिश्र ने अखबार के प्रथम पेज पर धारावाहिक लिखा था. डीजी मात दारोगा जीता…धारावाहिक में बताया गया था कि किस तरह मैथन ओपी के प्रभारी दारोगा ने डीजी के आदेश को अपनी ऊपर के स्तर पर पहुंच और कोयले की अथाह कमाई के बल पर ठेंगा दिखा दिया था.

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कितनी कमाई जीटी रोड पर

जीटी रोड के थानों की कमाई का ही चस्का था कि हरिहरपुर के दारोगा संतोष रजक ने चमड़ा परिवहन कर रहे एक ट्रक के ड्राइवर को गोली मार दी. मामले के तूल पकड़ने पर तोपचांची थाना के मामले में शामिल आरोपी इंस्पेक्टर उमेश कच्छप की संदिग्धावस्था में मौत हो गयी. हालांकि ऊच्चस्तरीय जांच में उमेश कच्छप की मौत को आत्महत्या करार दिया गया. जांच के क्रम में पता चला कि संतोष रजक गो तस्करी करनेवाले हर ट्रक से दस हजार रुपये वसूल करता था. उसके साथ इंस्पेक्टर और थाने का सिपाही रहता था. बाघमारा डीएसपी मजरूल होदा की गाड़ी लेकर उनका ड्राइवर भी नियमित रूप से वसूली के इस दैनिक अभियान में शामिल रहता था. रातभर में सौ से अधिक जानवर लदे ट्रक से वसूली होती थी. चमड़ा लदे ट्रक से भी संतोष दस हजार रुपये की मांग कर रहा था पर ट्रक का ड्राइवर मो नाजिम रकम देने को तैयार नहीं था. उसे संतोष रजक ने धमकाया तो अड़ गया. इसी क्रम में संतोष ने उस पर गोली चला दी.

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गांजा की तस्करी का रूट जीटी रोड

एक-एक दिन में 50-50 लाख रुपये मूल्य का गांजा जीटी रोड पर पकड़ा गया. फरवरी 2016 के आसपास लगातार गांजा पकड़ा गया. इसके बाद फिर नहीं. क्या जीटी रोड से गांजा तस्करी बंद हो गयी कि पुलिस से सेटिंग हो गयी? ऐसे सवाल का जवाब ढूंढ़ने की जरूरत है.

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बंगाल से चोरी का कोयला टपाया जाता है

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पश्चिम बंगाल के रानीगंज, आसनसोल के आसपास कई जगह कोयले का अवैध खनन चल रहा है. चोरी का कोयला धनबाद के बहुत से हार्ड कोक भट्ठों में पहुंचता है और वहां से कोयले को कागजात के आधार पर बाहर भेजा जाता है. धनबाद में भी कई जगह कोयला चोरी नियमित तौर पर चल रही है. रोज सैकड़ों ट्रक कोयले की हेराफेरी हो रही है. केंद्र और राज्य सरकार के दबाव पर यदा-कदा हार्ड क़ोक भट्ठे और अवैध कोल डंप में हुई छापामारी में खानापूर्ति के तौर पर कुछ कोयला पकड़ा जाता है. मामला ठंडा पड़ते ही फिर से नाजायज कारोबार अपनी रौ में चल पड़ता है.

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सिर्फ सेटिंगबाज बदलते हैं

जीटी रोड पर या जिले में चलनेवाला नाजायज कारोबार कभी बंद नहीं हुआ. इसलिए कि जिले के नाजायज कारोबार की नब्ज थामने वाले बड़े और छोटे पुलिस के पदाधिकारियों ने धनबाद और आसपास के इलाके में पोस्टिंग कराकर कभी गोयले को मदद की, कभी सांवरमल को कभी चोरा की. चाहे भाजपा का शासन हो, राजद का लालू काल हो, मधु कोड़ा हो या झामुमो का शासन, गौर करेंगे तो हर शासन में कुछ खास पुलिस पदाधिकारी मालदार इलाके में पोस्टिंग कराकर मालामाल होते रहे. अफसरों के साथ शासक दल के नेताओं ने भी खूब मजे किए. कुछ नाजायज धंधेबाज सत्तारूढ़ दलों का झंडा लेकर हर समय खड़े हुए. कुछ विधायक, कुछ क्षेत्र के नेताओं का नाम लोग नाजायज धंधा करनेवाले के रूप में खुलेआम लेते हैं.

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कोयला तस्करी में शामिल अफसरों के खिलाफ जांच का क्या हुआ

धनबाद में ऐसे कौन एसपी आए जिनके कार्यकाल में कोयले का नाजायज कारोबार पूरी तरह ठप पड़ गया. यह करोड़ रुपये का सवाल है. ऐसे में लोग सिर्फ एक ही एसपी का नाम दावे से ले सकते है. वैसे इस बात की कोई गारंटी नहीं हो सकती कि कौन तमाम कड़ाई के बाद भी कोयले का नाजायज कारोबार चलाने की हिम्मत रखता है. एसपी राजेश चंद्रा के कार्यकाल में कोयले के नाजायज कारोबार की छूट कौन दे सकता था, जब मोटी रकम देकर जीटी रोड के थाने में पोस्टिंग करानेवाले नौकरी बचाने के लिए पैरवी लगाकर यहां से भाग रहे थे. पता नहीं कौन कहां अवैध कारोबार करे और वह लपेटे में आ जाएं.

कहां आए कमाने और कहां नौकरी बचाना भी मुश्किल. इतना कड़ा रुख किसी एसपी ने कोयले और अन्य अवैध कारोबार को लेकर नहीं अपनाया था. कड़े एसपी भी इसे वेजिटेरियन क्राइम मानकर चुप हो जाते थे. यह तर्क देकर कि गरीबों की रोजी रोटी बंद करेंगे तो वह चोरी डकैती ही करेगा. बहरहाल, भाजपा की वर्तमान सरकार बनी तो घोषणा की गयी कि कोयला चोरी में संलिप्त पुलिस पदाधिकारियों की पहचान सीआइडी जांच से की जाएगी. जांच के बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. हास्यास्पद है कि कोयला चोरी का हिस्सा खानेवाले आइजी, डीआइजी और उससे ऊपर के अधिकारी के खिलाफ सीआइडी का इंस्पेक्टर, डीएसपी जैसे अधिकारी कैसे जांच करेंगे? लिहाजा, जांच का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

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लोग तरसते रहे हैं कोलफील्ड की पोस्टिंग के लिए

बड़ी बड़ी पैरवी के बल पर कोयलांचल में पोस्टिंग होती रही है. यहां कई एसपी आए जिसने थाने की वैल्यू के हिसाब से एक लाख से पांच लाख रुपये लेकर थाना इंचार्ज की पोस्टिंग की. तब इतनी महंगाई का जमाना नहीं था. तब जीटी रोड के थाने में कयी सिपाहियों ने मुख्यमंत्री से पैरवी करवा कर पोस्टिंग करायी. आज भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे सफेदपोश के करीबी बड़े पुलिस पदाधिकारी धनबाद में सारी गोटी सेट करते हैं.

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धनबाद में रोज कितनी वसूली होती है

अलग अलग थाना में लाेडिंग प्वाइंट, कोल डंप आदि में रंगदारी और पुलिस की सीधी वसूली कितने की है? कतरास ब्लाक टू के एक लोडिंग प्वाइंट पर प्रति ट्रक 600 से लेकर 700 रुपये तक की वसूली हो रही है. धनबाद इंडस्ट्रीज एंड कामर्स एसोसिएशन के एक पदाधिकारी के मुताबिक यहां रोज डेढ़ सौ से दो सौ ट्रक कोयला लोड होता है. करीब इतनी ही वसूली हर लोडिंग प्वाइंट पर होती है. एक लोडिंग प्वाइंट की वसूली से अनुमान लगाया जा सकता है कि रोज धनबाद में कितनी वसूली होती है.

हर वसूली में पुलिस और सीआइएसएफ का हिस्सा निर्धारित है. हिस्सा सत्ता के गलियारे में ऊपर तक जाता है. यह बात खुद जिले के बड़े पुलिस पदाधिकारी व्यक्तिगत बातचीत में करते हुए इसे पूरी तरह रोकने में असमर्थता जाहिर करते हैं. इंडस्ट्रीज एंड कामर्स एसोसिएशन की 85वीं वार्षिक बैठक में वरीय उपाध्यक्ष एसके सिन्हा ने कहा कि हार्ड कोक उद्योग बहुत ही खराब दौर से गुजर रहा है. इसलिए कि कोयला पर उन्हें प्रति टन 11 फीसदी टैक्स और 11 फीसदी रंगदारी टैक्स देना पड़ रहा है. उनके संबोधन से अलग यह भी सच्चाई है कि कुछ भट्ठा वाले बीसीसीएल, ईसीएल से एक नंबर कोयला कुछ मात्रा में लेकर उसमें कम कीमत में प्राप्त चोरी का कोयला मिलाकर बेचते हैं. इसके लिए भी पुलिस को निर्धारित रकम देनी पड़ती है.

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गेसिंग, सट्टा, जुआ नकली शराब का कारोबार और पुलिस की कमाई के अनगिनत स्रोत

हर थाना क्षेत्र में कुछ न कुछ नाजायज कारोबार चल रहा है. नाजायज कारोबार को संचालित करनेवाले अपराधी और दबंग हैं. इनकी संख्या लाखों में हैं. इनके नाजायज कारोबार को पुलिस का संरक्षण प्राप्त होता है. इसके सैकड़ों प्रमाण पुलिस फाइल में मौजूद हैं. किसी सिपाही, दारोगा, डीएसपी के खिलाफ विभागीय और कोर्ट की कार्रवाई के रूप में इसका प्रमाण मिलेगा. इस तरह देखें तो धनबाद में अपराध की अलार्मिंग स्थिति है. स्थिति सुधर नहीं रही है. इसलिए कि पुलिस क्रिमिनल पार्टनरशिप घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है. लोग अपराधियों की मर्जी पर निर्भर हैं. वे जैसा चाहें. फोर्स की भी कमी है. कुल मिलाकर आमलोगों की जान सासत में हैं.

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….और यह है ताजा मामला

मंगलवार दो अक्टूबर को स्थानीय अखबार की सुर्खियां बनी यह खबर धनबाद पुलिस की सक्रियता पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है. 40 से अधिक बैंक डकैतियों का सरगना धनबाद शहर में बड़े अधिकारियों के घर के पास स्वामी सहजानंद नगर में रह रहा था. इसका नाम है माधव उर्फ सुजीत कुमार मित्तल. बिहार की एसटीएफ और जामताड़ा पुलिस ने इसे धर दबोचा. माधव गया जिला के परैया थाना क्षेत्र के पहरा का रहनेवाला है.

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