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धनबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष बेचारे ब्रजेंद्र बाबू

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Ranjan Jha

Dhanbad : समय का ही चक्कर है कि पूर्व आईपीएस डॉ अजय कुमार झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बन गये और ब्रजेंद्र बाबू बेचारे हो गये हैं. ब्रजेंद्र बाबू, यानी धनबाद जिला कांग्रेस के जिलाध्यक्ष ब्रजेंद्र प्रसाद सिंह. स्थिति ऐसी कि इनको इनके ही फेसबुक पेज पर ढूंढना मुश्किल है. खोजते हैं, तो भीड़ में एक बुझी हुई मशाल लिये ब्रजेंद्र बाबू मिलते हैं. इस तस्वीर के अलावा इनकी कोई तस्वीर हाल के कई महीनों में पोस्ट नहीं की गयी है. इनकी वॉल पर धनबाद जिला कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रवींद्र वर्मा छाये हैं. इनके नाना प्रकार के पोस्ट हैं. उनमें उनके मनयीटांड़ स्थित निवास स्थान पर होनेवाली बैठकों की सूचना, उनके लोकहित के कार्य का ही लेखा-जोखा मिलता है. धनबाद जिला कांग्रेस के फेसबुक पेज को देखकर पता करना भी कठिन है कि ब्रजेंद्र बाबू धनबाद कांग्रेस के जिलाध्यक्ष हैं. किसी भी पार्टी की मुख्यधारा में उसके जिलाध्यक्ष का अस्तित्व संकट बड़ी ही हैरान करने की बात है. पर, जो सच्चाई है, उससे कोई इनकार नहीं कर सकता. खुद ब्रजेंद्र बाबू को भी इसका मलाल है, पर बेचारे आखिर कब तक खामोश रहें.

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बैठक में जुबां पर आ ही गया दिल का दर्द

हाल ही में जियलगोड़ा में हुई पार्टी की बैठक में ब्रजेंद्र बाबू के दिल का दर्द उनकी जुबां पर आ ही गया. उन्हें कहना ही पड़ा कि पार्टी की बहुत सारी गतिविधियों की जानकारी उन्हें नहीं मिल पाती. दूसरी अहम बात है कि इधर लगातार पार्टी के पदों पर जिले में धड़ाधड़ ऊपर से मनोनयन हो रहा है. पार्टी के जिलाध्यक्ष को इसकी जानकारी ‘कॉपी टू’ से मिलती है. वैसे प्रदेश स्तर के संगठन में भी कम खींचतान नहीं है. माना कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ अजय कुमार हैं, पर पूर्व मंत्री सुबोधकांत सहाय, आरपीएन सिंह और कई ऐसे नाम और ऊपर तक की लॉबी में पकड़ रखनेवाले ददई दुबे, राजेंद्र प्रसाद सिंह जैसे हेवी वेट को संतुलित कर पाना भी संभव नहीं. इस स्थिति में गुटों में बंटी कांग्रेस में बीजेपी को पछाड़ देने का उत्साह तो परवान चढ़ा है, पर असली विचार का प्रश्न है कि लोकसभा चुनाव का कौन बनेगा टिकटपति. कांग्रेस के अब तक आसन्न लोकसभा चुनाव में धनबाद से टिकट के कम से कम 22 दावेदारों के भावी एमपी के रुतबे से पार्टी के लोग परेशान हैं. एक ही जाति से विभिन्न गुटों से कई नाम. कई ऑप्शन. भला इन पहुंचवाले भावी सांसदों के सामने जिला कांग्रेस अध्यक्ष की क्या बिसात. सूत्र बताते हैं कि भावी सांसदों की अघोषित सूची में उनका कहीं नाम भी नहीं है. हालांकि सूची में रोज नये नाम जुड़ रहे हैं. कई उत्साहित लोगों ने चुनाव की तैयारी भी छेड़ दी है. दीवार लेखन भी करवा रहे हैं- आ रही है कांग्रेस. कांग्रेस के नेता मयूर शेखर झा और अभिजीत राज साड़ियां बांट रहे हैं.

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यह है कांग्रेस दफ्तर का हाल

हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनी का एलआईजी-एक. ढूंढने पर कांग्रेस का जिला कार्यालय मिलता है, पर यहां ढूंढने से कोई कांग्रेसी बहुत संयोग से मिलता है. एक बड़ा साइनबोर्ड यहां लगा है. यहां एलआईजी मॉडल की तरह बने कमरे के अतिरिक्त दो कमरे नये बनाये गये हैं. यह क्या हाउसिंग बोर्ड से स्वीकृत है? क्या इस तरह नक्शा से बेनक्शा निर्माण किया जा सकता है? इन सवालों को फिलवक्त किनारे कर यह बता दें कि लुबी सर्कुलर रोड पर कांग्रेस का लंबे-चौड़े क्षेत्र में दफ्तर है. यह खंडहर बनता जा रहा है. इसलिए कि धनबाद जिला परिषद की जमीन से अतिक्रमण हटाने का कोर्ट का आदेश कई साल पहले लागू हुआ और यह उसी के लपेटे में आ गया. काफी दिनों तक दफ्तर विहीन कांग्रेस को यूनियन क्लब की दुकान में खोला गया. उस दुकान में एक कार्यालय प्रभारी थे रामजी तिवारी. वह जब-तब मिल जाते थे. जब से कार्यालय हाउसिंग कॉलोनी गया है, वह बेरोजगार हो गये. तिवारी जी ने बताया कि किसी को अभी ट्रेनिंग पर रखा गया है. हाउसिंग कॉलोनी का कांग्रेस का घर शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी पूंजी निवेश करनेवाले रवि चौधरी की मेहरबानी बतायी जाती है. रवि चौधरी कौन हैं और क्यों कांग्रेस पर मेहरबान हैं, यह अलग किस्सा है.

धनबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष बेचारे ब्रजेंद्र बाबू

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यहां सब नेता हैं, कार्यकर्ता कोई नहीं : ब्रजेंद्र

पेशे से वकील ब्रजेंद्र प्रसाद सिंह अपने सिरिस्ता में अकेले ही बैठे मिल गये. जियलगोड़ा की मीटिंग का प्रसंग छेड़ते ही कहा- कांग्रेस में सब नेता हैं. कार्यकर्ता तो हैं ही नहीं. धनबाद विधानसभा क्षेत्र से सिर्फ आठ सौ वोट से जीते थे. बीते चुनाव में भाजपा करीब 50 हजार वोटों के अंतर से जीती. झरिया में करीब तीन हजार मतों के अंतर से कांग्रेस हारी थी. बीते चुनाव में भाजपा की जीत का अंतर 30 हजार हो गया. धनबाद जिला अध्यक्ष ब्रजेंद्र प्रसाद सिंह के रहते शहरी जिलाध्यक्ष रवींद्र प्रसाद वर्मा और ग्रामीण जिलाध्यक्ष शंकर प्रजापति बना दिये गये. इधर, विधानसभा प्रभारी भी मनोनीत किये गये. ब्रजेंद्र बाबू ने पूछा इससे क्या होगा, नियमित रूप से क्षेत्र में जायें, तो कोई बात हो. महीना-दो महीना पर जाकर भाषण दे आये, एक ही बात बार-बार बोलने से क्या पार्टी का जनाधार बढ़ेगा?

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स्थिति बेहद चिंताजनक है : जीतेंद्र मोदक

सन 1977 से कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता रहे जीतेंद्र मोदक को कांग्रेस की स्थानीय राजनीति अब रास नहीं आ रही. हालांकि, वह हाल तक कांग्रेस की जिला कमिटी में उपाध्यक्ष थे. कहते हैं सिर्फ फोटो चमकाना ही कांग्रेस की राजनीति हो गयी है. नये-नये ऐसे लोग पार्टी में आ गये हैं, जो उनके जैसे पुराने कार्यकर्ता को पहचानना भी नहीं चाहते. पार्टी-संगठन के बारे में सोचनेवाले दिखते ही नहीं. कुल मिलाकर पार्टी के पुराने कार्यकर्ता पहचान संकट से त्रस्त हैं.

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संगठन है कहां : अनिल पांडेय

करीब चार दशक तक कांग्रेस से वास्ता रखनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता अनिल पांडेय कांग्रेस की वर्तमान राजनीति पर कोई टीका-टिप्पणी करने से परहेज करते हैं, पर संगठन में क्या चल रहा है या संगठन नाम की कोई चीज है या नहीं, इस पर गौर करने की बात करते हैं. संगठन से अब उनका अनजाना सा रिश्ता है. यह रिश्ता क्या कहलाता है, पूछने पर जवाब में एक अर्थपूर्ण मुस्कान बिखेर देते हैं. लगता है कि वह बहुत कुछ कहना चाहते हैं, पर बोलें क्यों?

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