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शासन की औकात बताता है एक रुपये का सिक्का

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Dhanbad : धनबाद में एक रुपया का छोटा सिक्का नहीं चलता है. कई लोग यह सिक्का देने पर सामने ही फेंक देते हैं. कई लोग लेते ही नहीं. कई लेते हैं तो उनसे कोई सिक्का लेता ही नहीं. क्यों नहीं लोगे ?  नहीं लेंगे. मैंने तो लिया है. आप लीजिए, मैं नहीं लूंगा. आप भले पैसे मत दीजिए, मैं नहीं लूंगा. दूसरा देना है तो दीजिए, नहीं तो रखिए. एक रुपया नहीं देना है तो मत दीजिए, पर बहाना नहीं कीजिए. आटोवाले आपे से बाहर हो जाते हैं. साहब, हम क्या करें. छोटा सिक्का कोई लेता ही नहीं. घर पर सैकड़ों एक रुपया के सिक्के पड़े हैं.

इस देश में किसका सिक्का चल रहा है

कुछ ही साल पहले की बात है लोग एक-दो के सिक्के और नोट और छुट्टे के अभाव में टाफी देते थे. ग्राहक कहते थे-क्यों लें. दुकानदार कहते थे कि छुट्टे हैं नहीं, हम क्या करें? फटे नोट पाउच में डालकर चलाये जाते थे. लोग उसे लेते थे. सरकार का सिक्का है, जैसा भी है चलेगा? सरकार का हुक्म है सिक्का. जब सरकार ने सिक्काबंदी नहीं की है तो इसे लेने से कोई इनकार कैसे कर सकता है.

लेकिन, सरकार को इससे क्या मतलब कि उसका सिक्का चल रहा है या नहीं. सरकार का सिक्का नहीं चलने का मतलब क्या है? सरकार सिर्फ नाम की रह गयी है. इसका सिक्का यानी हुक्म नहीं चल रहा है.ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. पहले भी सरकार के सिक्के के बदले वस्तु विनिमय की प्रणाली के तहत टाफी चलती थी. दुकानदार चीट पर लिखकर देते थे. टोकन चलाते थे. यह सब सरकार की मुद्रा व्यवस्था के समानांतर दशकों से चलता रहा है.

सरकार ने इस समानांतर मुद्रा व्यवस्था यानी सरकार की हुकूमत को चुनौती देनेवाली व्यवस्था को खत्म करने के लिए सिक्कों की हर तरफ बौछार कर दी. इतने सिक्के कि अब छुट्टे की समस्या ही नहीं हो. पर समानांतर व्यवस्था या कहें कि सरकारी सल्तनत को चुनौती देनेवालों का हुक्म सिक्कों की भरमार में भी चलता ही रहा.

ऐसे लोगों ने कुछ दिन पहले दस रुपये के सिक्के को खारिज कर दिया था. इस कारण हर जगह मारामारी की स्थिति थी. मीडिया में इस संबंध में लगातार खबरें छपने के बाद स्थिति सामान्य हुई. अब बात एक रुपये के छोटे सिक्के की है. एक रुपया का बड़ा सिक्का चलेगा तो छोटा सिक्का क्यों नहीं चलेगा? इसलिए कि धनबाद में शासन कमजोर है. शासन कमजोर होने से ही सरकार का सिक्का नहीं चल रहा है. यहां प्रशासन ने इस बात को महत्व दिया ही नहीं कि सरकार का सिक्का नहीं चल रहा है.

प्रशासन ने इसे गंभीर मामला माना ही नहीं. प्रशासन ने जानना चाहा ही नहीं कि कौन सरकार के सिक्का को खारिज कर रहा है? वह कौन है जो सरकार का हुक्म मानने से इनकार कर रहा है? उसे क्यों नहीं मालूम कि सरकार का सिक्का लेने से इनकार करना गंभीर अपराध है. यह देश की व्यवस्था को नकारना है? जबकि, प्रशासन के लोग इस मामले को तनिक भी गंभीर नहीं मानते.

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कोई ऐसा नहीं जो खड़ा हो सरकार का सिक्का चलाने में लगा हो. व्यवहारिक तौर पर बात हो रही है कि एक का छोटा सिक्का कोई नहीं ले रहा है तो बड़ा सिक्का दे दो. क्या एक रुपये के लिए झंझट करना?

वरीय अधिवक्ता देवीशरण सिन्हा कहते हैं कि छोटी-छोटी अवहेलना पर ध्यान नहीं देने से बड़ा कानून-व्यवस्था का संकट पैदा लेता है. सरकारी व्यवस्था के लोगों की लापरवाही है एक रुपये का छोटा सिक्का लेने से लोगों का इनकार करना. सरकार की संप्रभुता को चुनौती है. यह लोगों को सरकार की व्यवस्था की अवहेलना के प्रति उत्साहित करना है.

शिक्षाविद प्रमोद कुमार झा का कहना है कि जब सरकार ने एक रुपया का सिक्का चलन से बाहर नहीं किया है तो कोई कैसे इसे लेने से इनकार कर सकता है. ऐसा धनबाद की हर गली और सड़क पर हो रहा है और इस तरह के मामले की प्रशासन नोटिस नहीं ले रहा है. तो कैसे उम्मीद की जाय कि शासन लोगों के संवैधानिक अधिकार और संप्रभुता की रक्षा के प्रति संवेदनशील है.

एक आटो चालक- मैं क्या करूं. कोई हमसे एक रुपये का छोटा सिक्का लेता ही नहीं है. आपको एक रुपया नहीं देना है तो मत दीजिए. साहब, हम लक्ष्मी लेकर फेकेंगे कैसे.

ए दोड्डे, डीसी, धनबाद : 14 दिसंबर को डीसी के आफिसियल ई-मेल एड्रेस पर बताया गया कि एक रुपया का छोटा सिक्का कोई लेता नहीं है. क्या यह कमजोर शासन का प्रमाण है. उपायुक्त ने इसका जवाब नहीं दिया.

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