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विकास किसका और किस कीमत पर, झारखंडी अस्तित्व खात्मे की ओर

‘जान देंगे-जमीन नहीं देंगे, आदिवासियों- मूलवासियों का नारा

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Ranchi : झारखंड की स्थापना को 18 वर्ष पूरे होने वाले हैं. एक अलग राज्य की मनोकामना यहां के मूलनिवासियों तथा अन्य खनन मजदूरों ने मिलकर लड़ी थीं. झारखंड के आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई 200 साल पहले से करते चले आ रहे हैं. इसकी शुरूआत पहाड़िया बाबा तिलका मांझी ने अंग्रेजों द्वारा लगाए गए लगान के विरूद्ध शुरू किया था. इस संघर्ष के बाद कोल विद्रोह, संथाल हुल और भगवान बिरसा मुण्डा, सिद्धो-कान्हू ने आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की.

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झारखण्ड राज्य की स्थापना को 18 वर्ष पूरे होने वाले हैं।

मूल निवासियों की समस्याओं का नहीं निकल सका कोई स्थाई समाधान

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इन सारे संघर्षों के बावजूद झारखंड के मूलनिवासियों की समस्याओं का कोई स्थाई समाधान नहीं निकल सका है. यहां के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई कानून बने हैं. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी)-1908 और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी) 1949 को एक मानक कहा जा सकता है. यह कानून आदिवासियों के संघर्ष का परिणाम है. मगर अफसोस, झारखण्ड राज्य की स्थापना के 17 साल से ज्यादा पूरे होने पर भी यहां के मूलनिवासी अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाये हैं. यहां के लोगों ने अलग झारखंड राज्य की मांग और उसके संघर्ष के लिए अपना खून बहा दिया था.
साल 2000 की तत्कालीन केन्द्र सरकार ने मांग के अनुकूल ग्रेटर झारखंड की स्थापना नहीं की.  लेकिन यहां के मूलनिवासियों के लिए सरकार ने अलग राज्य प्रदान कर दिया. अलग राज्य की स्थापना के साथ-साथ विकास के अनेक सपने दिखाए गए, जिसको यहां के लोगों ने खुशी-खुशी स्वीकार भी किया और इस आशा के साथ कि राज्य का विकास अब सुनिश्चित है. अब स्थानीय लोगों का विकास भी सम्भव हो पायेगा. लेकिन सरकार की मंशा ही कुछ और थी.
सरकार पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर झारखंडियों को विस्थापित करके यहां विकास का प्रारूप तैयार कर रही है. गौरतलब है कि झारखंडियों और सरकार के बीच जो लड़ाई थी, उसमें अब उद्योगपति भी कूद पड़े हैं. झारखंडी अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं, दूसरी तरफ काॅरपोरेट और सरकार मिलकर झारखंडियों को दबाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. सर्वविदित है सरकार झारखंडियों पर शोषण-अत्याचार करके पूंजीपतियों के निवेश को बढ़ावा देने और उन्हें खुश करने के लिए कई मौलिक कानूनों में भी बदलाव कर रही है.

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झारखण्ड राज्य की स्थापना को 18 वर्ष पूरे होने वाले हैं।

झारखंडियों का नारा जान देंगे -जमीन नहीं देंगे

जान देंगे-जमीन नहीं देंगे आदिवासियों- मूलवासियों का यह नारा विश्वास, परम्परा तथा संस्कृति को दर्शाता है कि जो राजनीतिक दल विपक्ष में रहने पर झारखंडियों का राग अलापते थे. वही जब सत्ता में आते हैं, तो काॅरपोरेट के लिए रेड कारपेट बिछाते दिखाई देते हैं. आदिवासियों को सरकार ने अलग-थलग ही रखा है. दूसरी तरफ मुख्यधारा में केवल काॅरपोरेट को ही बढ़ाया और बसाया है. इसीलिए यहां के आदिवासी-मूलवासी संगठन बार-बार अपने हक के लिए आवाज उठाते रहे हैं. मगर सरकार मूलवासियों को विकास विरोधी तथा अादिवासियों को नक्सली बताकर उनका शोषण करती आ रही है.
आज भी विकास के कई मुद्दे मात्र सपने ही दिखाई पड़ते हैं. विकास की परिभाषा वर्तमान राज्य सरकार के लिए केवल उद्योग, कारखाना तथा बड़ी-बड़ी कम्पनियों को न्योता और उन्हें जमीन उपलब्ध कराना है. हाल ही में आयोजित मोमेंटम झारखंड इसका एक स्पष्ट उदाहरण है. वहीं दूसरी ओर राज्य के खनिज सम्पदा को निचोड़ना ही विकास का सबसे बेहतरीन तरीका समझा जा रहा है.
झारखंड राज्य को संविधान की पांचवीं अनुसूची में रखा गया है. इस अनुसूची के अन्तर्गत ऐसे राज्यों को रखा जाता है, जो आदिवासी बहुल राज्य होते हैं. लेकिन यहां आदिवासियों के विकास की जगह विस्थापन हो रहा है. इस राज्य को आगे बढ़ाने का मानक उद्योगपतियों का राज्य में निवेश करना माना जा रहा है. इसका साफ असर राज्य की जमीन पर पड़ता है, क्योंकि किसी भी कारखाने के लिए जमीन की आवश्यकता होती है. वर्तमान भाजपा सरकार ने गत 2-3 वर्षों में काफी निजी कम्पनियों को निवेश के लिए आकर्षित करने में सफलता पाई है.

 

झारखण्ड राज्य की स्थापना को 18 वर्ष पूरे होने वाले हैं।
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कमजोरों को शोषण करके विकास करना सही नहीं 

किसी भी राज्य के विकास में काॅरपोरेट एक अहम स्तम्भ होता है, लेकिन विकास सिर्फ एक ही तबके के लिए. क्या कमजोरों को और कमजोर करके विकास करना सही है ? यहां यह भी देखना दिलचस्प है कि राज्य के खनिज सम्पदा जहां-जहां भी कम होते जा रहे हैं, अब दूसरे इलाकों को विकल्प के तौर पर खंगाला जा रहा है. यह खोज भी आखिर किसके लिए ? यहां के मूलनिवासियों के लिए या सिर्फ पूंजीपतियों के लिए ? ध्यान देने वाली बात यह है कि जो जमीन आदिवासियों के लिए एक संसाधन तथा आजीविका का एक प्रमुख जरिया है, वही जमीन पूंजीपतियों के लिए धन उत्पत्ति का स्रोत है.
संथाल परगना झारखण्ड का वह क्षेत्र है, जो पूरी तरह से ऊंची पहाड़ियों, जंगल और खनिज सम्पदा से भरा हुआ है. यह पूरा इलाका दूसरे इलाके के मुकाबले अब तक पूंजीपतियों के रडार में नहीं आया था. लेकिन यहां अब भी सम्पदाओं की नीलामी तेजी पकड़ रही है. सरकार काॅरपोरेट घरानों के लिए अत्याधुनिक निवास की व्यवस्था में लगी हुई है. इन दोनों बातों को यदि ध्यान से देखें, तो एक निष्कर्ष साफ निकलता है, दरअसल सम्पदाओं की नीलामी काॅरपोरेट के लिए है और उससे प्राप्त धन का लाभ सिर्फ पूंजीपतियों को ही मिलेगा.

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झारखण्ड राज्य की स्थापना को 18 वर्ष पूरे होने वाले हैं।

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आदिवासियों के लिए जहर है स्मार्ट शहर बनना

हाल ही में भारत सरकार ने 100 स्मार्ट शहर बनाने की घोषणा की है. इसमें कहीं भी संदेह नहीं है कि इससे देश-विदेश से काफी निवेशक आकर्षित होंगे. कोयला ब्लाॅक की नीलामी तथा उन पर प्राईवेट कम्पनियों का काबिज होने से यहां काफी प्रोफेशनल और टेक्निकल स्टाफ का आना शुरू हो जाएगा. जाहिर है कि सबों की व्यवस्था करने के लिए मौजूदा शहरों को और भी बड़ा तथा अत्याधुनिक बनाने की जरूरत है. कौशल युक्त तथा प्रोफेशनल स्टाफ आज के विकसित तथा माॅर्डन दुनिया को अधिक पसन्द करते हैं. शहरों को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने का यह एक मुख्य कारण दिखता है.
दुमका उन 18 जगहों में से एक है, जहां ‘जोनल डेवलपमेन्ट परियोजना’ को धरातल पर लागू करना है. इन शहरों के मास्टर प्लान के लिए सरकार ने बहुत-सी कम्पनियों से सम्पर्क भी किया है. इसी सन्दर्भ में दुमका शहर का ‘मास्टर प्लान’ का पूरा लेखा-जोखा कोलकाता की एक कम्पनी ने तैयार की. इससे शहरीकरण और अत्याधुनिक विकास की रफ्तार तेज हो जाएगी. इसमें भी कोई संदेह नहीं कि नया शहर संसाधनों, सुरक्षा, आधुनिक सड़कों, यातायात और ऊंची-ऊंची वातानुकूलित भवनों से चमक-दमक उठेगा.
राज्य सरकार के पास इस शहर की बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने का क्या कोई हिसाब है ? मास्टर प्लान को लागू करने से ‘सस्टेनेबल हैबिटेड’ का निर्माण होगा, किन्तु रिंग रोड से जुड़े भवनों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है. इस पूरे मास्टर प्लान का मुख्य उद्देश्य केवल शहरी रहन-सहन और अच्छी जीवनशैली पर केन्द्रित है. इसलिए इसका मोटा-मोटी केन्द्र केवल शहरों का विकास है.
मुख्य भूमि इस्तेमाल 67.09 प्रतिशत से घटकर मात्र 9.04 प्रतिशत रह जाएगा. शहरों में पार्क, माॅल करीब 8.4 प्रतिशत जमीन पर होंगे. ध्यान देने वाली बात यह है कि रहने के लिए मात्र 19 प्रतिशत से बढ़कर 49 प्रतिशत हो जाएगी. यदि यह सच निकला तो यहां ज्यादा ऊंचे-ऊंचे भवनों की जरूरत होगी, जिसमें ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को रहने की जगह मुहैय्या हो सकेगा.

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आखिर इतना हाय-तौबा क्यों ?

यह नया शहर आस-पास के 39 गांवों को अपने में मिलाएगा और करीब 12 कि.मी. तक फैलेगा. ज्यादातर इनमें से आदिवासी गांव हैं. इन 39 गांवों के लोग अपनी आजीविका के लिए मुख्यतः जमीन पर ही निर्भर हैं. शिक्षा, रोजगार और खेती के मामलों में भी इन गांवों में काफी पिछड़ापन है.
39 गांवों के कुछ मुख्य तथ्य :

1. शिक्षा 78.7 प्रतिशत
2. लिंग 960 प्रतिशत
3. अनुसूचित जाति 9  प्रतिशत
4. अनुसूचित जनजाति 32  प्रतिशत
5. खेती कार्य 37.1 प्रतिशत
6. घरेलू कार्य 6.4  प्रतिशत
8. अन्य कार्य 56.4  प्रतिशत

स्रोत: 2011 सेन्सस के अनुसार
1. क्या मास्टर प्लान लागू होने पर गांव वालों की जिन्दगी में बदलाव आएगा ?
2. पूरे दुमका में आदिवासी जनसंख्या करीब 42 प्रतिशत है, पर पूरे मास्टर प्लान में कहीं भी यहां
के आदिवासियों का जिक्र नहीं किया गया है.
3. खेती और अन्य जमीन की खरीद-बिक्री आसान हो जाएग. इससे भू-माफियाओं का प्रभाव और
भी बढ़ेगा.
4. जमीन जाने के कारण खेती वाली जमीन में खेती करना सम्भव नहीं हो पायेगा. इसका
ताजा उदाहरण सेज के नाम पर ली गई जमीन है. स्थानीय लोग जमीन को अपनी रक्षित
सम्पत्ति मानते हैं, अगर उनको इसके एवज में कुछ भी दिया जाता है, तो उससे जीवन निर्वाह
करने में काफी बाधा आएगी, परिणामतः समाज में अराजकता की स्थिति उत्पन्न होगी.
5. आज ‘संथाल परगना एक्ट’, जो कि महान सिद्धू-कान्हू के संघर्ष का परिणाम है, वह पूरी
तरह ध्वस्त हो जाएगा. आज जो जमीन बिक नहीं सकती, वह कल बिकने योग्य हो जाएगी
तथा अनुसूचित लक्षण खत्म होकर सामान्य क्षेत्र हो जाएंगे। टैक्स लोगों की जिन्दगी में
अतिरिक्त बोझ बनकर आएगा.
6. खेती छोड़कर झुग्गी बस्ती में बसना एक बहुत ही कठिन और कष्टकारी प्रक्रिया बन जाएगा.
7. मांझी परगना व्यवस्था खत्म हो जाएगी और शहरी प्रणाली लागू हो जाएगी.
8. आदिवासी अस्तित्व खात्मे की ओर है। इसके अलावे भी कई और नकारात्मक प्रभाव होंगे, जो
कुछ समय बाद स्पष्ट लगने लगेंगे.

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एक ही तबके को फायदा पहुंचाना गलत 

विकास अत्यन्त जरूरी है, पर यह सिर्फ एक तबके के लिए ही नहीं होना चाहिए. शहरों को उनके अपने स्तर प्रगति करने के अवसर और संसाधन देना चाहिए. साथ ही, ठीक इसी तरह गांवों को भी उनके अपने तरीके से. मगर सरकार को यह बिलकुल साफ करना होगा कि विकास किसका और किस कीमत पर. यह स्पष्ट है कि यह लड़ाई सत्तासीन सरकार से कतई नहीं, बल्कि आदिवासियों के मानवाधिकार हनन के विरूद्ध और उनके जल, जंगल और जमीन के स्वामित्वको लेकर है. यह सिर्फ एक ही तबके को फायदा पहुंचाने की प्रक्रिया के बिल्कुल खिलाफ है.

सृजन किशोर

समाज कार्य के शोधार्थी

 

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