Opinion

प्रचंड जीत के बावजूद आम आदमी पार्टी वैकल्पिक परिवर्तन की राजनीति का नरेटिव नहीं गढ़ पायी है

Faisal Anurag

क्या दिल्ली के मतदाताओं ने चुनावी राजनीति के लिए कोई नया नरेटिव गढ़ा है, जिसका असर सात महीनों बाद होने वाले बिहार विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकता है? इवीएम दिल्ली के लिए फैसला सुना रहा था और चर्चा बिहार को ले कर तेज होने लगी थी.

सोशल मीडिया यूजर्स की टिप्पणियों में बिहार की चर्चा आम हो गयी. फिल्म निदेशक अनुराग कश्यप ने तो ट्विट कर कहा कि अब बिहार में हिंदू खतरे में होंगे. जहां चुनाव होने को है. दिल्ली के प्रचार में हिंदू, मुसलमान, पाकिस्तान, देशद्रोही, आतंकवादी और कथित टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे जुमले अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने खूब उछाले.

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लेकिन दिल्ली के वोटरों ने इसे न केवल खारिज कर दिया, बल्कि राजनीति में एक नये नरेटिव का संकेत भी दिया. चुनाव में भारी जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने तो इसे ही स्वर दिया. जब उन्होंने कहा कि देश में एक नये किस्म की राजनीति का जन्म हुआ है. 2015 के चुनाव परिणामों के बाद आम आदमी पार्टी की एकतरफा जीत के बाद भी देश में एक नयी तरह की राजनीति की संभावना पूरे देश ने देखी थी.

बदलाव की एक ऐसी राजनीति जो लोकतंत्र के नये अध्याय का सृजन करे. लेकिन आप की राजनीति ने भले ही लोगों के रोजमर्रे के सवालों और एक बेहतर लोक कल्याणकारी सरकार की छवि गढ़ा हो, लेकिन वह वैकल्पिक परिवर्तन की राजनीति का भरोसा फिर भी पैदा नहीं कर रहा है.

बावजूद इसके कि देश के कई राज्यों की सरकारों की तुलना में आम आदमी पार्टी की सरकार की छवि सकारात्मक है. और शिक्षा, स्वस्थ्य, बिजली व पानी के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगायी है. देश की यह इकलौती सरकार भी है जिसने लोक कल्याणकारी योजनाओं के प्रति सरकार के दायित्व का निर्वाह किया है. और आमलोगों के लिए बेहतर सुविधाएं दी हैं.

आप पार्टी ने यह उस दौर में किया है, जब केंद्र सहित अधिकतर सरकारों के लिए लोक कल्याण का दायित्व अब कागजी भर रह गया है.

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इन कामयाबियों के बावजूद विचार के स्तर पर अरविंद केजरीवाल की पार्टी को अभी अपनी प्रामाणिकता स्थापित करने की चुनौती है. केजरीवाल एक ऐसे मध्यमार्गी हैं, जो अनेक सवालों पर दृढता से कोई बात नहीं करते. जिस पतली गली से वे नागरिकता कानून को लेकर निकले हैं, उससे कई सवाल उठे हैं.

इसके साथ भारत की राजनीति में एक अजीब सा प्रतीक खड़ा हो गया है. राम को भाजपा ने तो शिव को कांग्रेस ने अपने चुनाव का मुख्य अस्त्र बना लिया है. केजरीवाल ने भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण की काट के लिए हुनमान को अपना लिया है. देश की राजनीति में देवताओं का इस तरह का खुला खेल कई आशंकाओं को भी जन्म देता है.

भारत के संविधान की आत्मा वास्तव में धर्म और राजनीति को अलग करती है. बावजूद भारत की राजनीति पिछले तीन दशकों से धर्म और राजनीति के घलमेल पर ही आधारित है.

इस बात का संकेत वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकांत ने केजरीवाल को लिखी अपनी चिट्ठी में किया है. वे लिखते हैं- सियासत की मंडी में भगवान राम की तरह बजरंग बली को लांच करने के लिए आपको बधाई! जिस देश का पहला प्रधानमंत्री मंचों से कहता था कि अगर कोई किसी पर मजहबी हमला करेगा तो उससे मैं अपनी निजी और सरकार के प्रमुख की हैसियत से उम्र भर लड़ूंगा, उसी देश में 21वीं सदी के चुनाव राम और हनुमान के सहारे जीते जा रहे हैं. उसी दिल्ली में कोई सनकी आराम से फायरिंग करने को आजाद घूम रहा है.

एक चुनाव विश्लेषक ने कहा है कि सत्ता के दावेदार सभी पार्टियों के बीच हिंदू वोटों पर कब्जा जमाने की होड़ लोकतंत्र के भविष्य के लिए तकलीफदेह संकेत है. भारत की राजनीति से, खासतौर पर मुसलमान वोटरों की सार्वजनिक चिंता करने से जिस तरह राजनीतिक दल परहेज करते हैं, वह 2014 के बाद की राजनीति का नया मुहावारा जैसा है.

भारतीय जनता पार्टी जनसंघ के जमाने से हिंदू वोटारों के एकीकरण की आकांक्षा पाले हुए है. और इस पर काबिज होने के लिए तमाम हथकंडे अपनाती है. दिल्ली चुनाव परिणाम के बाद भाजपा के कई प्रवक्ताओं ने यह संकेत दिया कि वह साटों को ले कर निराश नहीं हैं. लेकिन वोट शेयर में बढ़ोतरी उनके तीखे सांपद्रायिक प्रचार के कारण ही संभव हुआ है.

संकेत साफ है. बिहार में भी इसी तरह के ध्रुवीकरण को भाजपा अपनी रणनीति बनायेगी. इसका संकेत तो अभी कन्हैया कुमार की बिहार जनगणमन यात्रा में ही दिखने लगा है. जहां भाजपा के विभिन्न आनुषंगिक संगठन सांपदायिकता के आधार पर यात्रा पर हमले कर रहे हैं.

नीतीश कुमार के लिए राहत की बात सिर्फ इतनी है कि दिल्ली के चुनाव परिणाम के बाद वे अधिक संख्या में अधिक सीटों से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा से बारगेन कर सकते हैं. लेकिन भाजपा के एजेंडे के खिलाफ उनकी खामोशी भी कई राजनीतिक संदेश दे रही है. बिहार में जिस तरह आरक्षण का सवाल एक बार फिर गरमा रहा है, उससे नीतीश परेशान जरूर हैं.

और नागरिकता कानून में भाजपा के साथ खड़े होने के कारण जदयू के वोट आधार के एक बड़े समूह के खिसकने से भी परेशान हैं. इस सवाल पर वे एकतरफ यह छवि बनाने की कोशि कर रहे हैं कि वे अल्पसंख्यक हितों को प्रभावित नहीं होने देंगे. लेकिन भाजपा के साथ पूरी मुस्तैदी भी दिखा रहे हैं. उनकी यह छवि उनके वोट आधारों के लिए कोई भरोसा नहीं पैदा करने वाली है. उनके सुशासन और विकास की छवि को ले कर भी माहौल पहले जैसा नहीं है.

इसके साथ भाजपा की भी अपनी राजनीति है. जिसमें उसके उपयोग की सीमा है. ऐसे हालात में भाजपा के लिए वोटरों को एक बार फिर उन्हीं सवालों के इर्दगिर्द किये जाने का अंदेशा है, जिसके आधार पर उनका वोट तो दिल्ली में बढ़ा है. चूंकि दिल्ली में पूर्वाचंली वोटरों का एक हिस्सा वे अपनी तरफ करने में कामयाब हुए हैं.

तो उसे बिहार की जमीन अपनी उग्र सांप्रदायिक प्रचार के लिए यह मुफीद लग रहा है. नीतीश इस पर किस तरह अंकुश लगा सकेंगे, यह उनके समीकरण और हुनर की सीमा है.

लेकिन बिहार की राजनीति 2015 की तुलना में बदल चुकी है. राजद की चुनौती पहले से कहीं ज्यादा बड़ी है. और उसका गठबंधन भी प्रभावी है. बिहार में जिस तरह लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, यह भी भाजपा और उसकी रणनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

बिहार की राजनीति के कई जानकार मानते हैं कि दिल्ली की तुलना में बिहार का चुनाव अलग होगा. लेकिन वह झारखंड की तरह राजनीतिक नरेटिव की संभावना का इंतजार भी कर रहा है. दिल्ली ने जिस तरह झारखंड के बाद निर्णायक फैसला दिया है, उसकी अहमियत को बिहार के चुनावी संदर्भ में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

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