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JBVNL में हुए 15 करोड़ के TDS घोटालेबाज को बचाने में फंसे डिप्टी एकाउंटेंट जनरल

– न्यूज विंग में खबर छपने के बाद विधायक अरुप चटर्जी ने विधानसभा में उठाया था मामला.

– सीएजी रिपोर्ट में भी हुई थी गड़बड़ी की पुष्टि, बाद में घोटाले पर पर्दा डालने के लिये रिपोर्ट से ऑडिट पारे से हटाया गया.

Ranchi: जेबीवीएनएल में हुए 15 करोड़ रुपये के टीडीएस के घोटाला पर पर्दा डालने और घोटाला करने के आरोपी तत्कालीन वित्त नियंत्रक उमेश कुमार को बचाने के मामले में डिप्टी एकाउंटेंट जनरल (उप महालेखाकार) फैजान अहमद भी फंस गये हैं.

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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने उन्हें नोटिस जारी किया है. फैजान अहमद की अनुशंसा पर ही सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति की बैठक में बिजली वितरण निगम में टीडीएस घोटाला के ऑडिट पारा को विलोपित किया गया था.

न्यूज विंग ने 25 जून 2018 को जेबीवीएनएल में 15 करोड़ रुपये के टीडीएस घोटाले का खुलासा करते हुए खबर छापी थी. शुरुआत में विभाग के अधिकारियों ने इस घोटाले पर पर्दा डालने की कोशिश की. घोटाले की बात से इनकार करते रहें.

निरसा विधायक ने न्यूज विंग की खबर के आधार पर विधानसभा में मामला उठाया. जिसके बाद सरकार ने घोटाले की बात स्वीकार कर ली. इसके साथ ही आरोपी वित्त नियंत्रक उमेश कुमार को उनके पद से हटा दिया गया.

सात सितंबर 2018 को न्यूज विंग ने इससे संबंधित एक और खबर न्यूज विंग की खबर के बाद टीडीएस घोटाले के मुख्य आरोपी उमेश कुमार को पद से हटाया, जीएम एचआर पर कार्मिक चुप को भी प्रकाशित किया था.

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जानकारी के मुताबिक विधायक अरुप चटर्जी ने जब यह मामला विधानसभा में उठाया, तब सरकार ने मामले की जांच करायी. विधानसभा की समिति में ऑडिट पारा समाप्त करा देने के कारण विधानसभा एवं एजी के स्तर से घोटाला के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मॉनिटरिंग बंद कर दी गयी. जिसके कारण मामले में आगे की कार्रवाई बंद कर दी गयी.

उल्लेखनीय है कि वित्त नियंत्रक उमेश कुमार व अन्य ने बिना टीडीएस काटे निजी कंपनियों को टीडीएस सर्टिफिकेट जारी कर दिया. आयकर विभाग ने जब इस मामले को पकड़ा, तब बोर्ड के पैसे से टीडीएस की राशि का भुगतान कर दिया गया. इससे कंपनियों को फायदा पहुंचा.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009-10 में राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के तहत कई कंपनियों को ठेका दिया गया था. कंपनियों का काम था ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुंचाना. आठ कंपनियों को काम दिया गया था. कंपनियों ने तय समय पर काम खत्म नहीं किया.

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नियम के मुताबिक, तय समय पर काम खत्म नहीं करने पर कंपनियों पर जुर्माना लगाना था. लेकिन बिजली बोर्ड के वित्त विभाग के अधिकारियों ने जुर्माना लगाने के बदले कंपनियों को लाभ ही पहुंचा दिया.

वित्त विभाग ने कंपनियों को पेमेंट करने से पहले टीडीएस नहीं काटा. और कंपनियों को टीडीएस सर्टिफिकेट जारी कर दिया. जब आयकर विभाग ने इस मामले को पकड़ा और टीडीएस जमा करने के लिये नोटिस जारी किया.

जिसके बाद बोर्ड के वित्त विभाग के अधिकारियों ने बोर्ड के पैसे से टीडीएस का भुगतान कर आयकर विभाग को जमा कर दिया. जबकि होना यह चाहिये था कि गलती पकड़े जाने पर विभाग कंपनियों से टीडीएस की राशि वसूलती और फिर उसे आयकर विभाग में जमा करा देती. पर, ऐसा नहीं किया गया.

वर्ष 2018 में विधानसभा में एजी की रिपोर्ट पेश हुई. रिपोर्ट में भी इस गड़बड़ी का उल्लेख किया गया था. बाद में अचानक 11 दिसंबर 2018 को डिप्टी एकाउंटेंट जेनरल के पत्र के आधार पर सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति की बैठक में घोटाले से संबंधित ऑडिट पारे को ही समाप्त कर दिया. और इस घोटाले के कसूरवारों को बचा लिया गया.

इसी मामले में भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार ने झारखंड उप महालेखाकार के खिलाफ जांच के आदेश दिये हैं. हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान में छपी एक खबर में झारखंड के प्रधान महालेखाकार (लेखा परीक्षक) इंदु अग्रवाल ने कहा है कि बिजली वितरण निगम में टीडीएस घोटाला से जुड़े मामले में डिप्टी एकाउंटेंड जेनरल फैजान अहमद से जवाब मांग गया है.

उन्होंने जो जवाब दिया है, उसे नियंत्रक महालेखा परीक्षक कार्यालय को भेजा गया है. सीएजी मुख्यालय के आदेश पर अगली कार्रवाई की जायेगी.

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