Opinion

दिल्ली जानती है आतंक के मनोवैज्ञानिक राजनीतिक प्रभाव को कैसे मजबूत बनाना है

Faisal Anurag

सियासी ड्रामों की न खत्म होने वाली दास्तान के बीच इस निष्कर्ष पर पहुंचना आसान है कि विचारों की तुलना में सत्ता की भूख राजनीतिक दलों का मुख्य लक्ष्य बन चुकी है. जनसेवा के मकसद को तो वे पहले ही पीछे  छोड़ आए हैं. राजनीति के कारपोरेटाइजेशन ने उसके जनकल्याण के स्वरूप को पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिया है. ठीक उसी तरह जैसे दुनिया भर के पूंजीपति अपना साम्राज्य खड़ा करने के बाद दानवीर बन जाते हैं. और लोगों के बीच अपनी खोयी हुई साख को वापस पाने का प्रयास करते हैं. राजनीति का यह बदलाव यह भी बताता है कि जनादेश अब निर्णायक नहीं हैं. और उन्हें कभी भी बदला जा सकता है.

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यदि 60 और 70 के दशक की राजनीतिक घटनाओं को याद करें तो आज के परिदृश्य में पूंजी के प्रभाव को निर्णायक होते हुए देखा जा सकता है. यह संकट न केवल लोगों के भीतर एक तरह का अलगाव पैदा करता है बल्कि सर्वसत्तावाद की वकालत भी करता है. लोकतंत्र की प्रक्रिया को बेमानी करते हुए भी उसे ही आधार बनाए रखने का तर्क भी मुहैया कराता है. पिछले छह सालों से भारत के राजनीतिक नेताओं की प्रतिबद्धता और साख में जो पतन देखने को मिल रहा है वह अभूतपूर्व है. भविष्य की जो तस्वीर इससे उभरती दिखती है वह भी आशा पैदा नहीं करती है. राजस्थान का घटनाक्रम भी इसी की मिसाल है. दोनों पक्षों के अपने अपने तर्क भी हैं और समर्थक समूह भी. बावजूद इसके जनादेश लहूलुहान हो रहा है.

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दुनिया भर में लोकतंत्र की सबसे ज्यादा चाह उन लोगों के बीच ही है जो सामाजिक आर्थिक उत्पीड़न के शिकार हैं. लेकिन लोकंत्र की वकालत करने वालों में वे अग्रणी हैं जो अपने ही देश के भीतर हर क्षण लोकतांत्रिक मूल्यों की होती हत्या से आंख फेर लेते हैं. अमेरिका के भीतर जिस तरह के प्रतिरोध मौजूद हैं वह इस उत्पीड़न की गवाही है. ब्लैक लाइव मैटर्स आंदोलन बताता है कि अमेरिका वास्तविक लोकतंत्र के लिए किस तरह तड़प रहा है. आज दुनिया में कम ही लोकतंत्र हैं जो कह सकते हैं उन्होंने सामाजिक समानता और आर्थिक समान वितरण करने में कामयाबी हासिल कर ली है.

उन देशों की बात अलग है जो अपनी शासनप्रणाली के कारण ही एकाधिकारवादी हैं. जिनमें चीन भी शामिल है. चीन ने देश भीतर राजनीतिक विरोधियों का दमन किया है. और लोगों के अधिकारों को सीमित किया है. लोकतंत्र की बात करने वाले नेताओं का सपना भी यही है कि वे अपने देश में एकाधिकारवादी बन जाएं. चुनावों में  गड़बडी करने के आरोप तो अमेरिका में भी लगते रहे हैं. और ब्रिटेन में भी. लेकिन उन देशों में प्रतिरोध की ताकतों ने लोकतंत्र की मशाल को प्रज्वलित रखा है. और सत्ता पर प्रभाव भी.

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भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों की इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि वोटर को न केवल बेबस किया गया है. बल्कि हर पांच साल में उनके जाति, धर्म और जजबात को भड़का कर समर्थन हासिल करने की प्रक्रिया चलती रहती है. इसका नतीजा यह निकला है कि वोटरों के आदेश को ठुकरा कर बीच राह में ही दलबदल करने वाले नेताओं की सामाजिक हैसियत नहीं घटती है. वे निडर हो कर जनादेश का अपमान करने के बावजूद अपनी राजनीतिक हैसियत नहीं खोते है. इस व्यापक संदर्भ में ही राजनीतिक प्रक्रिया और प्रवृति को समझने की जरूरत है.

मोदी जब 2014 में चुनाव के बाद दिल्ली आए थे तो कहा था कि वह दिल्ली की संस्कृति से बहुत भिन्न हैं. दिल्ली की राजनीतिक संस्कृति पिछले छह सालों में जिस तरह बदली है वह उनकी बात को सही साबित करती है. दिल्ली राज्यों में सत्ता दखल के लिए आज जिस तरह आग्रही है वह पहले कम ही देखा गया है. भाजपा के लिए हर चुनाव किसी जंग से कम नहीं. भले ही वह पंचायतों का ही क्यों न हो. या उपचुनाव ही. यह बदलाव  बिल्कुल नया है. 1967 के बाद अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों और नेताओं की ताकत देखने को मिली है. अब क्षेत्रीय दल या तो भाजपा के साथ रहें या अपना अस्तित्व ही खे दें. जैसे हालात बनते जा रहे हैं.

कांग्रेस के जमाने में भी केंद्रीय एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल हुए हैं. लेकिन अब तो वे वैसे हो रहे हैं कि इसमें दिल्ली की चाह दिखने लगती है. मध्यप्रदेश में जब कमलनाथ की सरकार के पतन की तैयारी हो रही थी आईटी और इडी ने जिस तरह के छापे मारे, वह अब तक याद है. इसके पहले कर्नाटक में भी कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ छापे मारे गए. और कुमार स्वामी सरकार के पतन की कथा को अंजाम दिया गया. सचिन पायसलट दिल्ली के करीब पहुंचे और उधर राजस्थान में गहलोत के करीबियों पर छापे पड़े. महाराष्ट्र में भी ऐसा ही नजारा देखा गया है.

आतंक के मनोवैज्ञानिक राजनीति प्रभाव को इससे मजबूती देने का प्रयोग बताता है कि यह मात्र संयोग नहीं है. यह सुनियाजित है. विचारों के बगैर की राजनीति की त्रासदी यही है कि वह न तो जन असंतोष को जन्म देती और न ही मतदाताओं को झकझोरती है. यह बात दिल्ली बखूबी समझती है.

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