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दिल्ली विधानसभा : आप की जीत से ज्यादा अहम है सांप्रदायिकता के मुद्दों को हाशिये पर धकेला जाना

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Faisal  Anurag

अरविंद केजरीवाल को दिल्ली का ताज तीसरी बार लगभग एकतरफा जीत के साथ मिला है. केजरीवाल भारतीय राजनीति में एक ताजा हवा की तरह आये थे. लेकिन दूसरी बार की सत्ता के दौर में इस हवा को ले कर कई सवाल उठे.

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बावजूद शिक्षा और सेहत के क्षेत्र में उन्होंने एक उम्मीद पैदा की थी. जिस पर दिल्ली के वोटरों ने भरोसा किया. यह भरोसा तब और अहम हो जाता है, जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी थी.

और अपने तरकश के तमाम तीर छोड़ दिये थे. यह चुनाव न केवल भाषा की बदजुबानी के लिए बल्कि सांप्रदायिकता के खुले प्रदर्शन के तौर पर याद किया जाएगा. भाजपा के सांप्रदायिक प्रचार के खिलाफ यह जनादेश बेहद महत्वपूर्ण है.

हालांकि भारत की राजनीति फिलवक्त सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से मुक्त होती तो नहीं दिखती. आने वाले दिनों में दिल्ली से भी ज्यादा बिहार और बंगाल में माहौल के खराब होने का अंदेशा गहरा रहा है.

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भारतीय राजनीति की त्रासदी यह है कि चुनाव परिणाम से भाजपा जैसे दल कोई सबक नहीं लेते. क्योंकि उनके पास एक ऐसा वोट आधार का समर्थन है, जो टूटता नहीं है. दिल्ली में भी भाजपा के वोट प्रतिशत में कोई  ज्यादा फर्क नहीं दिखता है.

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लेकिन दिल्ली की जनता ने भाजपा के सांप्रदायिक रुझान को खारिज कर दिया है. दिल्ली के वोटरों ने राममंदिर, 370 और नागरिकता कानून के प्रभाव से बाहर निकल कर सकारात्मक मतदान किया है. देश में जिस तरह के आर्थिक हालात हैं, और शिक्षा और हेल्थ के निजीकरण की प्रक्रिया तेज की गयी है, उसका नकार एक बड़ा संदेश है.

अमित शाह और नरेंद्र मोदी के लिए यह निजी झटका भी है. क्योंकि दोनों ने इसे निजी सवाल बना रखा था. मोदी ने जहां कुल मिलकार पांच रैलियों कीं, वहीं अमित शाह ने तो घर-घर, गली-गली पैदल यात्रा कर वोट की गुहार लगायी. भाजपा ने अपने तमाम सांसदो पूर्व मुख्यमंत्रियों और वर्तमान मंत्रियों के साथ सभी मुख्यमंत्रियों को अधियान में झोंक दिया था.

भाजपा ने प्रचार को एक कारपेट बौंमिग की तरह इस्तेमाल किया. और रिकार्ड सभाएं कीं. अमित शाह ने शाहीनबाग के बहाने सांप्रदायिक प्रचार का नेतृत्व किया. उन्होंने कहा कि इवीएम का बटन इतना जोर से लगाना की करंट शाहीनबाग तक पहुंचे. यानी उनके लिए पाकिस्तान को लगे करंट तो अब उन्हें ही महसूस हो रहा होगा.

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चुनाव के बाद भी पूरे आत्मविश्वास के साथ 45 सीट जीत लेने का दावा उनके खास चर्चों में रहा. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का चुनाव प्रचार तो सारी सीमाओं को तोड़ गया. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर ने तो अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी बता दिया. तो सांसद प्रवेश वर्मा ने शाहीनबाग के लोगों पर बलात्कार जैसे आरोप लगा कर सारी सीमा को ही तोड़ दिया.

प्रवेश वर्मा ने कहा था कि शाहीनबाग में जो लोग धरने पर हैं, वे कल दूसरों के घरों में घुस कर बलात्कार करेंगे. शाहीनबाग तो गांधी के रास्ते संविधान के वास्ते नारे के साथ बैठा रहा. लेकिन भाजपा का नारा लगाते हुए गार्गी कालेज में घुस कर जो कुछ किया गया, वह बेहद शर्मनाक है. लेकिन गृहमंत्री की खामोशी तो कहीं ज्यादा गहरी है.

गार्गी कालेज तो कोई टुकड़े-टुकड़े गैंग का हिस्सा भी नहीं है, जो प्रतिरोध करने वालों के लिए भाजपा इस्तेमाल करती है. यहां तक कि गार्गी कालेज दिल्ली यूनिवर्सिटी छा़त्र संघ का हिस्स भी नहीं है. गार्गी कालेज की घटना दिल्ली पर वह काला धब्बा है, जो किसी भी लड़की के पढ़ने के अधिकार के खिलाफ है. बेटी बचाने का नारा देते हुए भी बेटियों के बचाव में केंद्रीय सत्ता नहीं दिख रही है.

गार्गी कालेज की वीभत्स घटना छह को घटी. लेकिन चुनाव के बाद 9 फरवरी को उस पर चर्चा शुरू हुई. भुक्तभोगी लड़कियों की शिकायत के बाद भी इस सूचना को जिस तरह छुपा कर रखा गया, वह दिल्ली की मीडिया की असलियत का भी पर्दाफाश है.

आम आदमी पार्टी के कुछ विधायकों को एंटी इंकैबनेसी का सामना करना पड़ा है. लेकिन उससे कहीं ज्यादा भाजपा के सांप्रदायिक दुष्प्रचार का नुकसान भी उन्हें झेलना पड़ा है. इस चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी के लिए भी यह सबक है कि वह आत्म मूल्यांकन करे कि उसके भरेसेमंद साथी उसका साथ क्यों छोड़ते जा रहे हैं.

एक वैकल्पिक राजनीति के लिए आम आदमी पार्टी को अभी लंबी यात्रा करनी है. अरविंद केजरीवाल को भी एक व्यक्ति आधारित पार्टी की छवि को तोड़ने का संदेश इस चुनाव में छुपा हुआ है.

वहीं कांग्रेस का खाता भी नहीं खुलना, अलग से चर्चा की मांग तो करता है. लेकिन यह भी देखा जाना चाहिये कि कांग्रेस ने चुनाव जीतने के मूड से दिल्ली विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा. कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने सिर्फ दो सभाएं कीं.

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