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वन विभागः खैर वृक्षों के भुगतान में देरी होने पर विक्रेता ने ब्याज सहित मांगी राशि

वास्तविक रैयतों के लिखित आवेदन पर रोका गया भुगतान :   अधिकारी

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Palamu: पलामू प्रखंड में बिक्री किये खैर वृक्षों की राशि भुगतान नहीं होने से परेशान पीड़ित किशोर तिवारी ने राज्य वन विकास निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक को पत्र लिखा है. पत्र में उन्होंने इसके लिए गढ़वा के प्रमंडलीय प्रबंधक और हजारीबाग के महाप्रबंधक को दोषी बताया है. कहा है कि सक्षम पदाधिकारियों की अनावश्यक कागजी प्रक्रिया अपनाने से ही उन्हें राशि भुगतान में विलम्ब हुआ है. पत्र में दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही करने की मांग करते हुए उन्होंने ब्याज के साथ राशि भुगतान करने की बात कही है.

 आधे वृक्षों का हुआ भुगतान,  आधे का नहीं 

पत्र के मार्फत किशोर तिवारी ने कहा है कि वर्ष 2002 को चैनपुर प्रखंड के गांव हरिनामाड़ में उन्होंने नगद भुगतान कर रैयती प्लॉट से 3400 खैर वृक्ष खरीदा था. हाईकोर्ट के आदेश, वन विभाग से कानूनी प्रक्रिया पूरी करने और रैयतों से सहमति मिलने के बाद उन्होंने वर्ष 2005 में 2000 खैर वृक्षों को काटकर चैनपुर वनागार में भंडारित किया, जिसकी बिक्री गढ़वा के प्रमंडलीय प्रबंधक द्वारा की गयी थी. बिक्री से मिली राशि का उन्हें भुगतान कर दिया गया था. पुनः सभी कानूनी प्रक्रिया अपनाने के बाद उन्होंने शेष बचे वृक्षों को भी काटकर वनागार में भंडारित किया, जिसकी राशि का भुगतान उन्हें अबतक नहीं किया गया है.

वन विभाग को मिले 39 लाख रुपये 

उन्होंने कहा कि भंडारित किये गये शेष खैर वृक्षों के बिक्री से वन विभाग को 39,03,251 रूपये राशि मिली. लेकिन इस राशि उन्हें उनके हिस्से का भुगतान अबतक नहीं हुआ है. गढ़वा के प्रमंडलीय प्रबंधक और हजारीबाग के महाप्रबंधक को दोषी बताते हुए कहा है कि उन्होंने जिस तरह से अनावश्यक कागजी प्रक्रिया अपनायी है, उसके कारण ही भुगतान में विलम्ब हो रहा है.

 हाईकोर्ट में है मामला, कुछ कहना अभी ठीक नहीं :  प्रमंडलीय प्रबंधक, गढ़वा 

पूरे मामले पर गढ़वा के प्रमंडलीय प्रबंधक एसके सुमन का कहना है कि वन विभाग के रेगुलेशन ऑफ फॉरेस्ट प्रोड्यूस एक्ट 1984 के तहत वास्तविक रैयतों को ही वृक्षों की बिक्री से प्राप्त राशि के भुगतान करने का प्रावधान है. दूसरी और किशोर तिवारी वास्तविक रैयत होने का दावा करते हैं, जो कि सही नहीं है. चूंकि मामला अब हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इसलिए इसपर कुछ कहना अभी ठीक नहीं है. जहां तक 2005 में पीडित को राशि भुगतान करने की बात है, तो उस समय वे गढ़वा प्रमंडलीय प्रबंधक के पद पर नहीं थे. इस कारण वे कुछ नहीं कह सकते हैं.

वास्तविक रैयत ने आपत्ति जतायी

हजारीबाग महाप्रबंधक मधुकर का कहना है कि वर्ष 2005 में हुई राशि भुगतान के बाद वास्तविक रैयतों ने विभाग को लिखित आवेदन कर आपत्ति जतायी थी. उसके बाद ही दूसरे चरण में हुई बिक्री से मिली राशि का भुगतान रोका गया है. मामला अभी हाईकोर्ट में है,  इसलिए निर्णय के बाद ही कुछ कहा जा सकता है.

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