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‘अपराधियों का बचाव भारतीय लोकतंत्र के लिए त्रासदी’

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Faisal Anurag

सिख जनसंहार मानवता के खिलाफ किए गए जघन्यतम अपराधों में है. दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों ने सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा देते हुए राजनीतिक और सरकारी मशीनरी के द्वारा किए गए अपराधियों के बचाव को भारत के लोकतंत्र के लिए भयानक त्रासदी बताया है. जस्टिस एस मुरलीधरन और जस्टिस विनोद गोयल ने ऐतिहासिक फैसला दिया है.

यह फैसला एक ऐसा दस्तावेज है जो कि भारतीय लांकतंत्र में बढ़ते बहुसंख्यकवाद की हिंसा के खिलाफ कड़ी बातें कहता है. अमृता प्रीतम की एक कविता से दानों जजों ने अपने फैसले का आगाज किया है. विभाजन के बाद के संहारों का दर्द और त्रासदी इस कविता के माध्यम से गहरे तक किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोरती है.

अमृता प्रीतम और उनका परिवार विभाजन की त्रासदी का शिकार था. सज्जन कुमार के खिलाफ लगातार विपरीत स्थितियों का सामना करते हुए जिस 80 साल की महिला ने मामले को जीवित रखा और अंत तक इंसाफ के लिए लड़ती रहीं, उनका परिवार भी विभाजन के समय पाकिस्तान के मुल्तान से भारत आया था. और 1984 में उनके परिवार को विभाजन के दौर की हिंसा से भी ज्यादा भयानक दौर देखना पडा. जगजीत कौर के पति के साथ तीन बेटों को 84 के जनसंहार में मार डाला गया था और उन्हें इनके शवों का अंतिम संस्कार अकेले ही घर के भीतर ही कीवडों की लकड़ियों से करना पडा था. ऐसी अनेक वारदातें देश के विभिन्न हिस्सों में हुई थी और अभी भी सभी मामलों में इंसाफ नहीं मिला है.

1984 का संहार सिखों के खिलाफ बहुसंख्कों की उन्मादित हिंसा का परिणाम था. जजों ने कहा है कि यह त्रासदी कोई पहली या अंतिम घटना नहीं है. 1947 की भयानकता से सबक नहीं सिखा गया और इस कारण देश को अनेक संहारों के दौर से गुजरना पडा. 1984 का संहार भी अंतिम साबित नहीं हुआ.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इतने लोगों की सामुहिक हत्या की न तो यह पहली वारदात थी और दुर्भाग्यपूर्ण व दुखद है कि यह अंतिम भी साबित नहीं हुई. बंटवारे के समय पंजाब, दिल्ली समेत देश के अनेक हिस्सों में बेगुनाह सिखों की हत्याएं हुई थी. 84 उस त्रासदी की याद ताजा कर देता है. कोर्ट यह भी कहता है कि ठीक इसी पैटर्न पर 1993 में मुंबई ,2002 में गुजरात, 2008 में कंधमाल, और 2013 में मुजफ्फरनगर में जनंसहार हुए.

कोर्ट के इस तथ्य ने भारत के उस जख्म पर नजर रखा है जिससे बचने की अक्सर कोशिश की जाती है. मानवता के खिलाफ हुए इन संहारों के पीड़तों को अब भी इंसाफ का इंतजार है. यह भी विदित है कि इस जनसंहारों के पीछे कुछ राजनीतिक दलों और समूहों को हाथ है. कोर्ट ने यह भी कहा है कि हमारे कानून में ऐसे प्रावधानों की जरूरत है जिससे मानवता के खिलाफ किए गए इन संहारों के दोषियों को कठोरतम सजा मिल सके. कोर्ट की यह टिप्पणी काननू व्यवस्था की इंसाफपूरक भूमिका में नहीं होने की ओर गंभीर इशारा है.

कोर्ट ने लिखा है कि तमाम जनसंहारों में एक समानता है कि इसमें अल्पसंख्यक समूहों को निशाना बनाया गया है. सज्जन कुमार को सजा हो गयी, लेकिन अनेक अपराधी अब भी बचे हुए है. साथ ही इस फैसले के साथ यह तथ्य भी सामने आया है कि देश भर में जनसंहारों के खिलाफ इंसाफ की डोर कमजोर की गयी है.

जगजीत कौर की तरह ही 80 साल की एक और महिला जनसंहार के खिलाफ इंसाफ के लिए लड़ रहीं हैं. उनका मामला थकहार कर अब सुप्रीम कोर्ट की शरण में है. इस पर दो बार सुनवाई हो चुकी है और अगली सुनवाई जनवरी 2019 में होने को है. इस महिला का नाम जाकिया जाफरी है और वे गुजरात के जनसंहार में राजनीतिक नेताओं को सजा दिलाने के लिए लड़ रही हैं. उनके पति जो कि लोकसभा के सदस्य रह चुके थे कि अहमदाबाद के गुलमर्ग सोसइटी में हत्या कर दी गयी थी. जाकिया जाफरी इसमें नरेंद्र मोदी को दोषी मानती हैं. उनका कहना है कि उनके पति को जब सोसाइटी भीड़ ने घेरा तो तत्काली मुख्यमंत्री को कई बार फोन किया उन्हें बचाने के लिए कोई पुलिस बल नहीं भेजा गया.

गुजरात जनसंहार को लेकर कई बार आयोग बने और उनकी साख हमेशा ही संदेह के घेरे में रही है. ठीक उसी तरह जैसे कि 1984 के जनसंहार में आयोगो और अन्य जांच एजेंसियों का खेल किया गया. अनेक दस्तावेजों में गैर सरकारी स्तर पर सभी जनसंहारों के दोषियों और अपराधियों की ओर इशारा किया गया है. लेकिन जांच एजंसियों में शामिल रहे उसके ही कई सदस्यों ने अनेक बार उजागर किया है कि उनकी जांच को कैसे प्रभावित किया गया है और इस कारण पीडितों को इंसाफ नहीं मिल पाया है.

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि जनसंहारों के पीछे राजनीतिक समूहो का संरक्षण है. दूसरी गैर सरकारी जांच रिपोटों में वास्तविक दोषियों के नाम भी उजागर किए जा चुके है. दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक हो कांग्रेस पर हमला किया है.

लेकिन दूसरे दलों ने भारतीय जनता पार्टी पर जो हमले किए हैं तथा जिन तथ्यों को उजागर किए हैं, वे भी कम संवेदनशील नहीं है. राजनीति के वर्तमान दौर में यह शायद ही संभव हो कि जनसंहारों के लिए वास्तविक दोषियों को पकड़ा जाए और उन्हें राजनीतिक तौर पर खारिज कर दिया जाए. भारत की राजनीति उस मुहाने पर है जहां सत्ता पाने के लिए जनसंहारों का परोक्ष और प्रत्यक्ष समर्थन देने वाले राजनेता सफल होते हैं और उनके अपराध को विभिन्न समूहों में स्वीकृति भी मिलती है. यह अत्यंत त्रासद पहलू है. इतिहास से सबक नहीं सीखने की पुरान आदत अब भी बरकार है. जिसकी भारी कीमत मासूम और निर्दोषों को चुकानी पड़ती है.

लेखक वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं

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