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लोकसभा चुनाव में हार : क्या विपक्ष अपना अस्तित्व बचा सकेगा?

विपक्षी दलों के भीतर जिस तरह की बेचैनी दिख रही है, उससे अनेक दलों में देर सबेर बिखराव की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

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Faisal Anurag

क्या विपक्ष अपना अस्तित्व बचा सकेगा?भारत के चुनावों के बाद नतीजों को लेकर जिस तरह के विश्लेषण आये हैं उसने इस सवाल को प्रासंगिक बनाया है. विपक्षी दलों के भीतर जिस तरह की बेचैनी दिख रही है, उससे अनेक दलों में देर सबेर बिखराव की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. भाजपा इस तरह के बिखराव के लिए न केवल इंतजार कर रही है बल्कि उसकी मशनरी इसके लिए सक्रिय भी है. बंगाल में टीएमसी के नेताओं की खरीद फरोख्त तेज कर दी गयी है.

भाजपा के नेता कह रहे हैं कि विधान सभा चुनाव तक वे सात चरणों में ममता बनर्जी को आघात देंगे. चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा था कि ममता बनर्जी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं और लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद वे बंगाल की सरकार को गिरा देंगे.

देश के प्रधानमंत्री पद पर किसी भी व्यक्ति ने इस तरह की बात कर दलबदल को बढावा देने का संकेत दिया था. यदि 2014 के बाद से देखा जाये तो विपक्ष के अनेक दलों के बेहद महत्वपूर्ण नेताओं को भाजपा ने अपने पक्ष में किया है. उस पर धनबल ओर सत्ताबल का इस्तेमाल कर पार्टियों को तोडने और खरीदफरोख्त का आरोप आम है.

सरकारों को गिराने के लिए भी भाजपा की मशीनरी सक्रिय

बंगाल के दलबदल के साथ बिहार, झारखंड में भी विपक्ष पर इस तरह का खतरा मंडरा रहा है. वहीं कर्नाटक, मध्यप्रदेश और राजस्थान की सरकारों को गिराने के लिए भी भाजपा की मशीनरी सक्रिय है. इसका इशारा भी इन राज्यों के विपक्षी दल कर चुके हैं. माना जा रहा है कि देरसबेर भाजपा छत्तीसगढ सरकार भी गिराने का प्रयास करेगी. तो क्या भाजपा विपक्ष के असित्व को ही स्वीकार नहीं करेगी.

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. किसी चुनी हुई सरकार के निरंकुश निर्णयों को रोकने और बदलने के नजरिए से भी विपक्ष की भूमिका बढ़ी मानी जाती है. भारत के लोकतंत्र ने इमरजेंसी की निरंकुशता को झेला है. इस इमरजेंसी को एक बडी बहुमत की सरकार ने ही थोपा था. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में जिस तरह के ध्रवीकृत राष्ट्वाद को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है. उससे निरंकुश शासन भी विकसित हो सकता है.

विपक्षी दलों में बेचैनी का माहौल

चुनाव के बाद उत्तर भारत के सभी विपक्षी दलों में न केवल बेचैनी का माहौल दिख रहा है बल्कि पस्तहिम्मती भी है. ऐसे हालात में इन तमाम राज्यों में जिस तरह के गठबंधन बने थे उनके भविष्य भी अंधकार में है. विपक्ष के नेतृत्व के करिश्मे को ले कर कार्यकर्ता और नेताओं में संदेह के हालात हैं. राजनीतिक दल निराशा में हार के वास्तविक कारणों में देख भी नहीं पा रहे हैं. सामाजिक न्याय की राजनीति से उभरे दलों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन सा सूत्र है जिसने उनके वोट आधार में बिखराव हुए और गठबंधन के बावजूद वे सफल नहीं हो पाये.

पिछडों, दलितों में भाजपा का आधार निर्णायक

चुनाव के बाद जातिगत वोट अध्ययन बताता है कि पिछडो, दलितों में भाजपा का आधार निर्णायक हो रहा है. चुनावों में गठबंधन राजनीति की एक सीमा यह भी उभर का सामने आयी है कि दलों ओर नेताओं के स्तर पर तो गठबंधन दिखा लेकिन कार्यकर्ता और वोट आधार पर उनका असर बिखरा बिखरा रहा. गठबंधनों के राजनीतिक दल एक दूसरे को वोट दिलाने की अपनी क्षमता को चूकते दिखे.

इसके साथ ही जातियों के बीच भी भारी बदलाव आया है और उनके वोट देने की प्रवृति बदली ह. यह स्थायी रूझान है या नहीं इसे बताना तो अभी जल्दबाजी होगी. लेकिन जाति पर वह ध्रुवीकरण पहली बार प्रभावित दिखा है जिसे राष्ट्वाद के सहारे मजबूती देने का प्रयास भाजपा ने किया है.

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उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ओर समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को लेकर पहली बार सवाल खडे किये गये हैं. सपा को खास कर उसके समर्थक और सहयोगी ही सवालों के दायरे से घेर रहे हैं. अखिलेश यादव 2014, 2015 और अब 2019 के चुनाव में सफल नेतृत्व देने में कामयाब नहीं हुए हैं. उनकी पार्टी में चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही कई सहयोगी दलबदल किये. अब तो और भी दलबदल के बादल मंडरा रहे हैं. समाजवादी पार्टी पिछडों के बीच कमजोर हुई है और पहली बार उसे कोर आधार में भी भारी दरार दिखी है.

कनौज और बदायूं की उसकी हार सामान्य नहीं है जहां डिंपल यादव और धर्मेद्र यादव चुनाव हार गए. पार्टी के यादव आधार को तो शिवपालसिंह यादव के अलग होने  के बाद ही संकट पैदा हुआ था. अब शिवपाल को समाजवादी पार्टी में फिर से लाने का प्रयास तेज हुआ है. लेकिन पिछडे वोट की प्रवृति परिवर्तन को अपने पक्ष में करने के लिए सपा क्या कदम उठाती है इसी से उसके भविष्य की दिशा तय होगी. बसपा में भी मायावती का नेतृत्व अजेय नहीं रहा.

बसपा को 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद कई नेताओं के दलबदल के कारण भारी धक्का लगा था. लेकिन इस दलबदल के लिए मायावती पर भी कई तरह के आरोप लगे थे. बसपा गैर जाटव आधार के बडे सेक्शन के बीच पहले की तरह वोट बटोरू नहीं रह गयी है. हालांकि उसे इस बार कुछ सीटों पर जीत तो मिली है लेकिव वोट शेयर चिंता की लकीरों को गहरा करता है.

बिहार जहां अगले साल विधान सभा के चुनाव होने को हैं, राजद की करारी हार बेहद चिंताजनक है. बिहार में एनडीए ने पचास प्रतिशत से ज्यादा वोट प्राप्त कर राजद के गठबंधन को बेहद संकटग्रसत बना दिया है. लालू यादव की अनुपस्थिति में राजद के संकट को टालना आसान नहीं होगा क्योंकि वह उन तमाम दलों में अपने ही कोर समर्थक आधार का विश्वास हासिल नहीं कर सकी है. झारखंड में भी गठबंधन के दलों और गठबंधन के बीच अविश्वास की खाई चौडी हो गयी है और नेतृत्व इस चुनौती में नया नरैटिव प्रसतुत कर सकेगा या नहीं इस पर संदेह है.

आक्सफोर्ड यूनिवसर्टी के इतिहास के प्रोफेसर फैसल देव जी का एक आलेख वायर ने छापा है जो भारत के वोटर प्रवृति के बदलाव को गहराई से विश्लेषित करता है. विपक्ष किन कारणो से कमजोर हुआ उसे इस विश्लेषण में रेखांकित किया गया है. इस आलेख में कहा गया है:

भाजपा की अधिक सत्ता केंद्रित और वैचारिक शैली पूर्व में बदलाव का संकेत है. यह सामाजिक समूहों को बांटकर ही बहुमत हासिल कर सकती है. यह अपनी जाति और क्षेत्रीय साझेदारों के समर्थकों तक का साथ छोड़ देती है. यहां तक कि मध्यम वर्ग और उच्चवर्गीय परिवार जो कभी एक ही पार्टी को वोट देते थे, अब भाजपा ने इन्हें भी बांट दिया है. भले ही भाजपा ने समस्त सामाजिक समूहों को अभी तक नहीं बांटा है, लेकिन उसने बहुमत के मायने बदल दिये हैं. इसलिए भाजपा की भाषा में अल्पसंख्यक अब केवल राजनीतिक रूप से अस्थिर पहचान वाले देश विरोधी हो गए हैं.

इसका मतलब है कि विरोधी खेमे अब राष्ट्रवादी विमर्श के मुताबिक दो सबसे धोखा देने वाली पहचानों में बंट गये  हैं मुसलमान और माओवादी. जबकि कांग्रेस जैसी पार्टियों को मुस्लिमों का समर्थन करने वाली और वामपंथियों को देश को बांटने वाले माओवादियों का समर्थन करने वाला समझा जाता है.

संविधान और दृष्टिकोण में असमानता के अलावा मुस्लिमों और माओवादियों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि माओवादी राजनीतिक पहचान और दबाव वाला गुट है, जबकि मुस्लिमों में राजनीति का अभाव दिखाई देता है. देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग होने की वजह से मुस्लिम न सिर्फ खुद का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि उन सभी समूहों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जो उनकी पहचान बन गये हैं. उनका अराजनीतिकरण भारत के सभी वंशानुगत समूहों की सूचना देती है.

यह अराजनीतिकरण केवल मुसलमानों का ही नहीं, उन सब समूहों का हुआ है,  जो पारंपरिक चुनावी गणित में पारंपरिक मतदाताओं के तौर पर आंके जाते हैं. मुसलमान पहचान उन सभी पहचानों का प्रतिनिधित्व करने वाली पहचान बना दी गयी है, जो केवल अपनी पहचान वाले प्रतिनिधि को मिलकर वोट देते हैं. ताकि उन्हें उसका सीधा फायदा प्राप्त हो सके. भाजपा का बहुमत बंटवारे और वंशानुगत राजनीति के अराजनीतिकरण पर आधारित है, भले ही यह समूह सामाजिक रूप से सक्रिय रहे. इनके सदस्य भाजपा की एकाकीवादी राजनीति और पहचान से जुड़ते रहे.

इसके विपरीत मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को पारंपरिक राजनीति और उसके लगाव से उत्पन्न पिछडे़पन का प्रतीक साबित कर दिया गया है. जब तक पारंपरिक सामाजिक ढांचा बना रहेगा, हिंदुत्व का राष्ट्रीय बहुमत और आधुनिकता के उनके आदर्श अधूरे रहेंगे. विपक्ष के दलों और गठबंधनों को इन चुनौतियों का मुकाबला किये बगैर अपने को  फिर से खडा करना बेहद कठिन चुनौती है. झारखंड के आदिवासियों के भीतर भी इस प्रवृति को देखा जा सकता है. झारखंड के दलों को अपनी झारखंड की विरासत और संघर्ष को नया तर्क और नरैटिव देना ही होगा. साथ ही चुनाव की तकनीक में   भाजपा के संगठित और केंद्रित ताकत और तकनीक के मुकावले राह  बनानी होगी.

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